मध्यकालीन आर्य भाषा – विशेषता, वर्गीकरण – इतिहास

मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा

मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा को हिंदी भाषा (Bhasha) में अध्ययन की दृष्टि से तीन भागों में विभाजित/वर्गीकरण किया गया है- पालि (500 ई.पू. से 1 ई. तक), प्राकृत (1 ई. से 500 ई. तक), अपभ्रंश (500 ई. से 1000 ई. तक)।

मध्यकालीन आर्यभाषा
Madhyakalin Bhartiya Arya Bhasha

पालि (प्रथम प्राकृत)

‘पालि’ का अर्थ ‘बुद्ध वचन’ (पा रक्खतीति बुद्धवचनं इति पालि) होने से यह शब्द केवल मूल त्रिपिटक ग्रन्थों के लिए प्रयुक्त हुआ। पालि में ही त्रिपिटक ग्रन्थों की रचना हुई । त्रिपिटकों की संख्या तीन है- (1) सुत्त पिटक (2) विनय पिटक एवं (3) अभिधम्म पिटक

बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से सम्राट अशोक के पुत्र कुमार महेन्द्र त्रिपिटकों के साथ लंका गए। वहाँ लंका नरेश ‘वट्टगामनी’ (ई. पू. 291) के संरक्षण में थेरवाद का त्रिपिटक (बुद्ध के उपदेशों का संग्रह) लिपिबद्ध हुआ। ‘पालि’ भारत की प्रथम ‘देश भाषा’ है।

सुत्त पिटक

‘सुत्त पिटक’ साधारण बातचीत के ढंग पर दिये गये बुद्ध के उपदेशों का संग्रह है। इस पिटक के अन्तर्गत पाँच निकाय आते हैं जो निम्न हैं- (1) दीर्घ निकाय, (2) कज्झिम निकाय, (3) संयुक्त निकाय, (4) अंगुत्तर निकाय और (5) खुद्दक निकाय ।

खुद्दक निकाय: खुद्दक निकाय में पन्द्रह ग्रन्थ हैं-(1) खुद्दक पाठ, (2) धम्म पद, (3) उदान, (4) इतिवुत्तक, (5) सुत्तनिपात, (6) विमानवत्थु, (7) पेतवत्थु, (8) थेरगाथा, (9) थेरीगाथा, (10) जातक, (11) निद्देस, (12) पटिसम्भिदामग्ग, (13) अपदान, (14) बुद्धदवंस एवं (15) चरियापिटक।

विनय पिटक

‘विनय पिटक’ में बुद्ध की उन शिक्षाओं का संकलन है जो उन्होंने समय समय पर संघ-संचालन को नियमित करने के लिए दी थी। ‘विनय-पिटक’ में निम्नलिखित ग्रंथ हैं-(1) महावग्ग, (2) चुल्लवग्ग, (3) पाचित्तिय, (4) पाराजिक, (5) परिवार।

अभिधम्म-पिटक

‘अभिधम्म-पिटक’ में चित्त, चैतसिक आदि धर्मों का विशद् विश्लेषण किया गया है। ‘सुत्तपिटक’ के उपदिष्ट सिद्धान्तों के आधार पर ही वस्तुतः ‘अभिधम्म पिटक’ का विकास हुआ है। ‘अभिधम्म पिटक’ में सात ग्रन्थ हैं-(1) धम्म संगणी, (2) विभंग, (3) धातुकथा, (4) पुग्गल पञ्चत्ति, (5) कथावत्थु, (6) यमक, (7) पट्टान।

पाली‘ में त्रिपिटक साहित्य के अलावा ‘अट्ठकथा साहित्य, ‘मिलिन्दपबुहो’, ‘दीपवंश‘, ‘महावंश‘ आदि ग्रन्थ भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन ग्रन्थों के अनुशीलन से पता चलता है कि पालि का प्रचार न केवल उत्तरी भारत में था अपितु बर्मा, लंका, तिब्बत, चीन आदि देशों तक विस्तारित था।

  • अट्ठकथा-साहित्य के प्रणेता आचार्य बुद्धघोष बतलाये जाते हैं, जिनका समय ईसा की पाँचवीं शताब्दी निश्चित है।
  • बुद्धघोष कृत ‘विसुद्धि मग्ग’ (विशुद्धमार्ग) को बौद्ध सिद्धान्तों का कोश भी कहा जाता है।
  • पालि भाषा के तीन व्याकरण ग्रन्थ उपलब्ध हैं जो निम्नलिखित हैं-(1) कच्चान व्याकरण, (2) मोग्गलान व्याकरण तथा (3) सद्देनीति।
  • कच्चान व्याकरण‘ को ‘कच्चान गन्ध‘ या ‘सुसन्धिकप्प‘ भी कहा जाता है।
  • ‘कच्चान व्याकरण’ में चार कप्प (सन्धि कप्प, नाम कप्प, आख्यात कप्प तथा किब्बिधानकप्प), 23 परिच्छेद तथा 675 सूत्र है।
  • मोग्लान व्याकरण‘ के रचयिता मोग्गलान है। इन्होंने ही इस पर वृत्ति और पंचिका लिखी है।
  • मोगलान श्रीलंका के अनुराधपुर के थूपाराम बिहार में रहते थे तथा वे अपने समय के संघराज थे।
  • ‘मोग्गलान व्याकरण’, पालि व्याकरण में पूर्णता तथा गम्भीरता में सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है। इस व्याकरण में 817 सूत्र हैं।
  • ‘सद्दनीति व्याकरण’ (1154 ई.) के रचयिता बर्मी भिक्षु अग्गवंश थे, ‘अग्गपण्डित तृतीय’ भी कहलाते थे।
  • ‘सद्दनीति व्याकरण’ तीन (पदमाला, धातुमाला और सूत्तमाला) 27 अध्याय तथा 1391 सूत्रों में निबद्ध है।

 विभिन्न विद्वानों द्वारा ‘पालि’ शब्द की व्युत्पत्ति निम्नलिखित ढंग से बताई गई है –

विद्वान् व्युत्पत्ति
आचार्य विधुशेखर पन्ति > पत्ति > पट्टि > पल्लि > पालि
मैक्स वालेसर पाटलि पुत्र या पाऽलि।
भिक्ष जगदीश कश्यप परियाय > पलियाय > पालियाय > पालि ।
भण्डारकर व वाकर नागल प्राकृत > पाकट > पाअड > पाउल > पालि
भिक्षु सिद्धार्थ पाठ > पाळ> पाळि > पालि
कोसाम्बी पाल् > पालि ।
उदयनारायण तिवारी पा + णिज् + लि = पालि।

पालि भाषा के प्रदेश को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद हैं। विभिन्न विद्वानों द्वारा वर्णित पालि भाषा का प्रदेश निम्नांकित है-

विद्वान पालि भाषा प्रदेश
श्रीलंकाई बौद्ध तथा चाइल्डर्स मगध
वेस्टरगार्ड तथा स्टेनकोनो उज्जयिनी या विन्ध्य प्रदेश
ग्रियर्सन व राहुल मगध
ओलडेन वर्ग कलिंग
रीज डेविड्स कोसल
सुनीतिकुमार चटर्जी मध्यदेश की बोली
देवेन्द्रनाथ शर्मा मथुरा के आसपास का भू भाग
उदयनारायण तिवारी मध्यदेश की बोली
  • सर्वसम्मति से विद्वानों ने पालि भाषा का प्रदेश, मध्य प्रदेश की बोली को स्वीकार किया है।

पालि की वर्ण संघटना या ध्वनियाँ-

  • पालि के प्रसिद्ध वैयाकरण कच्चायन के अनुसार पालि में 41 ध्वनियाँ होती है तथा मोग्गलान के अनुसार पालि में कुल 43 ध्वनियाँ होती है।
  • कच्चायन के अनुसार पालि में 8 स्वर तथा 33 व्यंजन होते हैं तथा मोग्गलान के अनुसार 10 स्वर तथा 33 व्यंजन होते हैं।

पालि में वर्णों का वर्गीकरण निम्न ढंग से किया जा सकता है-

स्वर –

  • ह्रस्व-अ, इ, उ, एँ, ओं
  • दीर्घ-आ, ई, ऊ, ए, ओ

व्यंजन-

  • क वर्ग – क, ख, ग, घ, ङ
  • च वर्ग – च, छ, ज, झ, ञ
  • ट वर्ग – ट, ठ, ड, ढ, ण ।
  • त वर्ग – त, थ, द, ध, न ।
  • प वर्ग – प, फ, ब, भ, म ।
  • य, र, ल, व, स, ह, ळ, अं।

पालि भाषा की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ

  • अनुस्वार (अं) पालि में स्वतन्त्र ध्वनि है जिसे पालि वैयाकरण में निग्गहीत नाम से अभिहित किया है। (बिन्दु निग्गहीत)।
  • टर्नर के अनुसार पालि में वैदिकी की भाँति ही संगीतात्मक एवं बलात्मक, दोनों स्वराघात थी। ग्रियर्सन तथा भोलानाथ तिवारी पालि में बलात्मक स्वराघात मानते हैं। जबकि जूल ब्लाक किसी भी स्वराघात को नहीं स्वीकार करते हैं।
  • पालि में तीन लिंग, तीन वाच्य तथा दो वचन (एक वचन और बहुवचन) का प्रयोग मिलता है। पालि में द्विवचन नहीं होता है।
  • पालि हलन्त रहित, छह कारक, आठ लकार (चार काल, चार भाव) तथा आठगण युक्त भाषा है।

प्रथम प्राकृत (पालि)

पालि के अन्तर्गत ही अभिलेखी प्राकृत तथा शिलालेखी प्राकृत भी आता है। इसके अधिकांश लेख शिला पर अमित होने के कारण इसकी संज्ञा शिलालेखी प्राकृत‘ हुई।

प्राकृत (द्वितीय प्राकृत)

मध्यकालीन आर्यभाषा को ‘प्राकृत’ भी कहा गया है।

प्राकृत की व्युत्पत्ति

‘प्राकृत’ की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में दो मत प्रचलित हैं जो निम्न हैं-

प्राकृत प्राचीनतम् जनभाषा है-

  • प्राकृत प्राचीनतम प्रचलित जनभाषा है। नमि साधु ने इसका निर्वचन करते हुए लिखा है-

‘प्राक् पूर्व कृतं प्राकृत’

अर्थात् प्राक् कृत शब्द से इसका निर्माण हुआ है जिसका अर्थ है पहले की बनी हुई। जो भाषा मूल से चली आ रही है उसका नाम ‘प्राकृत’ है (नाम प्रकृतेः आगतं प्राकृतम्) ।

  • नामि साधु ने ‘काव्यालंकार‘ की टीका में लिखा है-

  प्राकृतेति सकल-जगज्जन्तूनां व्याकरणादि मिरनाहत संस्कार: सहजो वचन व्यापारः प्रकृति: प्रकृति तत्र भवः सेव वा प्राकृतम्’

अर्थात सकल जगत् के जन्तुओं (प्राणियों) के व्याकरण आदि संस्कारों से रहित सहजवचन व्यापार को प्रकृति कहते हैं। उससे उत्पन्न अथवा वही प्राकृत है।

  • वाक्पतिराज ने ‘गउडबहो‘ में लिखा है-

सयलाओ इमं वाया विसंति एत्तो यणेति वायाओ।।
एंति समुद्धं चिह णेति सायराओ च्चिय जलाई ।।”

अर्थात्– जिस प्रकार जल सागर में प्रवेश करता है और वही से निकलता है, उसी प्रकार समस्त भाषाएँ प्राकृत में ही प्रवेश करती हैं और प्राकृत से ही निकलती हैं।

प्राकृत की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है-

इस मत की पुष्टि करने वाले विद्वान् निम्नलिखित है-

  • ‘प्रकृति: संस्कृतं तत्र भवं तत आगतवां प्राकृतम्’ अर्थात् प्रकृति या मूल संस्कृत है और जो संस्कृत से आगत है, वह प्राकृत है। (हेमचन्द्र)।
  • ‘प्रकृति: संस्कृतं तत्र भवं प्राकृतमुच्यते” अर्थात् प्रकृति या मूल संस्कृत है, उससे उत्पन्न भाषा को प्राकृत कहते हैं। (प्राकृत सर्वस्य-मार्कण्डेय)।
  • ‘प्रकृतस्य सर्वमेव संस्कृत योनिः’ अर्थात् प्राकृत की जननी संस्कृत है। (प्राकृत-संजीवनी-वासुदेव)।
  • ‘कृतेः संस्कृतायास्तु विकृतिः प्राकृती मता’ अर्थात् संस्कृत की विकृति प्राकृत है। (षड् भाषाचन्द्रिका-लक्ष्मीधर)।
  • ‘प्रकृते: संस्कृतात् आगतं प्राकृतम्’ अर्थात् प्रकृति संस्कृत से आगत प्राकृत है। (सिंह देवमणि) ।
  • अब प्रायः सभी विद्वानों ने इस बात को स्वीकार लिया है कि प्राकृत की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है।
  • द्वितीय प्राकृत को साहित्यिक प्राकृत‘ भी कहते हैं। प्राकृत भाषाओं के विषय
    में सर्वप्रथम भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में विचार किया।

भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में 7 मुख्य प्राकृत तथा 7 गौण विभाषा की चर्चा की, जो अग्रांकित है-

मुख्य प्राकृत गौण विभाषा
मागधी शाबरी
अवन्तिजा आभीरी
प्राच्या चाण्डाली
सूरसेनी (शौरसेनी) सचरी
अर्धमागधी द्राविड़ी
बाहलीक उद्रजा
दाक्षिणात्य (महाराष्ट्री) वनेचरी

प्राकृत-वैयाकरन

प्राकृत-वैयाकरणों में सर्वप्रथम नाम वररुचि (7वीं शताब्दी) का आता है। इनके व्याकरण का नाम ‘प्राकृत प्रकाश‘ है। इसमें 12 परिच्छेद हैं।

वररुचि ने ‘प्राकृत प्रकाश’ ग्रन्थ में प्राकृत भाषा के चार भेद बताए हैं, जो निम्नांकित हैं-

  1. महाराष्ट्री,
  2. पैशाची,
  3. मागधी,
  4. शौरसेनी।

हेमचन्द्र ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्ध ‘प्राकृत-व्याकरण‘ में प्राकृत भाषा के तीन और भेदों की चर्चा की, जो निम्न हैं-

  1. आर्षी (अर्धमागधी),
  2. चूलिका पैशाची,
  3. अपभ्रंश।

हेमचन्द्र को प्राकृत का पाणिनी माना जाता है। अपने व्याकरण के उदाहरणों के लिए हेमचन्द्र ने भट्टी के समान एक ‘द्वयाश्रय काव्य’ की भी रचना की है। हेमचन्द्र की ‘चूलिका-पैशाची‘ को ही आचार्य दण्डी ने ‘भूत भाषा‘ कहा है।

महाराष्ट्री

  • महाराष्ट्री को प्राकृत वैयाकरणों ने आदर्श, परिनिष्ठित तथा मानक प्राकृत माना है। इस प्राकृत का मूल स्थान महाराष्ट्र है।
  • डॉ. हार्नले के अनुसार महाराष्ट्री का अर्थ ‘महान् राष्ट्र’ की भाषा है। महान् राष्ट्र के अन्तर्गत राजपुताना तथा मध्यप्रदेश आदि आते हैं।
  • जॉर्ज ग्रियर्सन एवं जूल ब्लाक ने महाराष्ट्री प्राकृत से ही मराठी की उत्पत्ति मानी है।
  • भरतमुनि ने ‘दाक्षिणात्य प्राकृत भाषा का भेद महाराष्ट्री के लिए ही किया है।
  • अवन्ती और वाह्लीक, ये दोनों भाषाएँ महाराष्ट्री भाषा में अन्तर्भूत है।
  • डॉ. मनमोहन घोष और डॉ. सकुमार सेन का अभिमत है कि महाराष्ट्री प्राकृत शौरसेनी का ही विकसित रूप है।
  • आचार्य दण्डी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘काव्यादर्श’ में महाराष्ट्री को सर्वोत्कृष्ट प्राकृत भाषा बतलाया है- महाराष्ट्राश्रयां भाषां प्रकृष्टं प्राकृतं विदु :। सागरः सूक्तिरत्नानां सेतुबन्धादि यन्मयाम्।।

महाराष्ट्री प्राकृत में लिखी गई प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ निम्नालिखित हैं-

  1. राजा हाल कृत ‘गाहा सतसई’ (गाथा-सप्तशती),
  2. प्रवरसेन कृत ‘रावण वहो’ (सेतुबन्धः),
  3. वाक्पति कृत ‘गउडवहो’ (गौडवधः),
  4. जयवल्लभ कृत ‘वज्जालग्ग’,
  5. हेमचन्द्र कृत ‘कुमार पाल चरित’।

शौरसेनी प्राकृत

शौरसेनी प्राकृत मूलतः शूरसेन या मथुरा के आसपास की बोली थी। मध्यदेश की भाषा होने के कारण शौरसेनी का बहुत आदर था। (यो मध्ये मध्यदेशं विवसति स कविः सर्वभाषा निषण्णा:)। डॉ. पिशेल के अनुसार इसका विकास दक्षिण में हुआ। शौरसेनी मूलतः नाटकों के गद्य की भाषा थी। आचार्य भरतमुनि ने लिखा भी है – “शोरसैनम् समाश्रित्य भाषा कार्य तु नाटके।

विद्वानों ने शौरसेनी प्राकृत का आधार भिन्न-भिन्न बताया है, जो निम्नलिखित है –

विद्वान् शौरसेनी का आधार
वररुचि संस्कृत (प्रकृतिः संस्कृतम)
रामशर्मन महाराष्ट्री (विरच्यते सम्प्रति शौरसेनी पूर्वेवभाषा प्रकृतिः किलास्याः)
पुरुषोत्तम संस्कृत तथा महाराष्ट्री (‘संस्कृतानुगमनाद् बहुलम’; तथा ‘शेषे महाराष्ट्री’)
  • वररुचि ने शौरसेनी प्राकृत को ही प्राकृत-भाषा का मूल जाना है (प्रकृतिः शौरसेनी-प्राकृत प्रकाश-10-2)।

पैशाची प्राकृत

  • पैशाची प्राकृत को पैशाचिकी, पैशाचिका, ग्राम्य भाषा, भूतभाषा, भूतवचन, भूतभाषित आदि नामों से भी पुकारा जाता है।
  • जॉर्ज ग्रियर्सन ने पैशाची भाषा-भाषी लोगों का आदि-वास-स्थान उत्तर-पश्चिम पंजाब अथवा अफगानिस्तान को माना है तथा इसे ‘दरद‘ से प्रभावित बताया।
  • लक्ष्मीधर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘षड् भाषा चंन्द्रिका’ में राक्षस, पिचाश तथा नीच पात्रों के लिए पैशाची भाषा का प्रयोग बतलाया है (रक्ष पिशाचनीचेषु पैशाची द्वितयं भवेत)।
  • मार्कण्डेय ने ‘प्राकृत सर्वस्व’ में कैकय पैशाची, शौरसेन पैशाची और पाचाल पैशाची, इन तीन प्रकार की पैशाची भाषाओं का तीन देशों के आधार पर नामकरण किया है।

मागधी प्राकृत

  • मागधी प्राकृत मगध देश की भाषा रही है। मार्कण्डेय ने शौरसेनी से मागधी की व्युत्पत्ति बतायी है। (मागधी शौरसेनीत:)।
  • मागधी के शाकारी, चाण्डाली और शाबरी, ये तीन प्रकार मिलते हैं। मागधी प्राकृत का प्राचीनतम रूप अश्वघोष के नाटकों में मिलता है।
  • भरतमुनि के अनुसार मागधी अन्त:पुर के नौकरों, अश्वपालों आदि की भाषा थी।

अर्धमागधी प्राकृत

  • अर्धमागधी प्राकृत के सम्बन्ध में जॉर्ज ग्रियर्सन ने बताया कि यह मध्य देश (शूरसेन) और मगध के मध्यवर्ती देश (अयोध्या या कोसल) की भाषा थी।
  • श्रीजिनदा सगणिमहत्तर (7वीं शताब्दी) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘निशीथचुर्णि’ में अर्धमागधी को मगधदेश के अर्ध प्रदेश की भाषा में निबद्ध होने के कारण अर्धमागध कहा है (मगहद्ध विसयभाषा निबद्धं अद्धभागहं)।
  • अर्धमागधी का प्रयोग मुख्यत: जैन-साहित्य में हुआ है। भगवान् महावीर का सम्पूर्ण धर्मोपदेश इसी भाषा में निबद्ध है।
  • जैनियों ने अर्धमागधी को ‘आर्ष’, ‘आर्षी’, ‘ऋषिभाषा’ या ‘आदिभाषा’ नाम से भी अभिहित किया है।
  • डॉ. जैकोबी ने प्राचीन जैन-सूत्रों की भाषा को प्राचीन महाराष्ट्री कहकर जैन महाराष्ट्री’ नाम दिया है।
  • आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्य दर्पण’ में अर्धमागधी को चेट, राजपूत एवं सेठों की भाषा बताया है।

अपभ्रंश (तृतीय प्राकृत)

‘अप्रभ्रंश’ मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बीच की कड़ी है। इसीलिए विद्वानों ने अपभ्रंश’ को एक सन्धिकालीन भाषा कहा है।

भर्तृहरि के ‘वाक्यपदीयम्’ के अनुसार सर्वप्रथम व्याडि ने संस्कृत के मानक शब्दों से भिन्न संस्कारच्युत, भ्रष्ट और अशुद्ध शब्दों को ‘अपभ्रंश’ की संज्ञा दी। भर्तृहरि ने लिखा है-

“शब्दसंस्कारहीनो यो गौरिति प्रयुयुक्षते।
तमपभ्रंश मिच्छन्ति विशिष्टार्थ निवेशिनम्॥”

व्याडि की पुस्तक का नाम ‘लक्षश्लोकात्मक-संग्रह‘ था जो दुर्भाग्य-वश अनुपलब्ध है।

अपभ्रंश‘ शब्द का सर्वप्रथम प्रामाणिक प्रयोग पतंजलि के ‘महाभाष्य‘ में मिलता है। महाभाष्यकार ने ‘अपभ्रंश’ का प्रयोग अपशब्द’ के समानार्थक रूप में किया है-

“भयां सोऽपशब्दाः अल्पीयांसाः शब्दा: इति।
एकैकस्य हि शब्दस्य बहवोऽप्रभंशाः ।।”

अपभ्रंश‘ के सबसे प्राचीन उदाहरण भरतमुनि के नाट्य-शास्त्र’ में मिलते हैं, जिसमें ‘अपभ्रंश’ को ‘विभ्रष्ट’ कहा गया है।

डॉ. भोलानाथ तिवारी और डॉ. उदयनारायण तिवारी के अनुसार, भाषा के अर्थ में ‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रथम प्रयोग-चण्ड (6वीं शताब्दी) ने अपने प्राक्रत-लक्षण’ ग्रन्थ में किया है। (न लोपोऽभंशेऽधो रेफस्य)।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, ‘अपभ्रंश’ नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन (वि. सं. 650 के पहले) को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है।

भामह ने ‘काव्यालंकार‘ में अपभ्रंश को संस्कृत और प्राकृत के साथ एक काव्योपयोगी भाषा के रूप में वर्णित किया है-

“संस्कृतं प्राकृतं चान्यदपभ्रंश इति त्रिधा।”

  • आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ने अपभ्रंश को ‘ण–ण भाषा’ कहा है।

आचार्य दण्डी ने ‘काव्यादर्श’ में समस्त वाङ्मय को संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र, इन चार भागों में विभक्त किया है-

“तदेतद् वाङ्मयं भूयः संस्कृत प्राकृतं तथा।।
अपभ्रंशश्च मिश्रञ्चेत्याहुशर्याश्चतुर्विधम्।।”

आचार्य दण्डी ने ‘काव्यादर्श’ में अपभ्रंश को ‘आभीर‘ भी कहा है-

“आभीरादि गिरथः काव्येष्वपभ्रंशः इति स्मृताः।”

अपभ्रंश को विद्वानों ने विभ्रष्ट, आभीर, अवहंस, अवहट्ट, पटमंजरी, अवहत्थ, औहट, अवहट, आदि नाम से भी पुकारा है।

विभिन्न विद्वानों ने अपभ्रंश के निम्नलिखित भेद बताए हैं-

विद्वान अपभ्रंश के भेद
नमि साधु (1) उपनागर, (2) आभीर, (3) ग्राम्य ।
मार्कण्डेय (1) नागर, (2) उपनागर, (3) व्राचड।।
याकोबी (1) पूर्वी, (2) पश्चिमी, (3) दक्षिणी, (4) उत्तरी।।
तागरे (1) पूर्वी, (2) पश्चिमी, (3) दक्षिणी।
नामवर सिंह (1) पूर्वी और (2) पश्चिमी ।।

डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी ने अपभ्रंश को भारतीय आर्यभाषा के विकास की एक ‘स्थिति’ माना है। इनके अनुसार 6वीं से 11वीं शती तक प्रत्येक प्राकृत का अपना अपभ्रंश रूप रहा होगा-जैसे मागधी प्राकत के बाद मागधी अपभ्रंश, अर्धमागधी प्राकृत के बाद अर्धमागधी अपभ्रंश, शौरसेनी प्राकृत के बाद शौरसैनी अपभ्रंश एवं महाराष्ट्री प्राकृत के बाद महाराष्ट्री अपभ्रंश आदि।

अपभ्रंश की ध्वनियाँ-डॉ. उदयनारायण तिवारी ने अपभ्रंश की ध्वनियों का वर्गीकरण निम्न ढंग से किया है-

स्वर-(10 स्वर)

  • ह्रस्व- अ, इ, उ, एँ, ओं
  • दीर्घ- आ, ई, ऊ, ए, ओ

व्यंजन-(व्यंजन = 30)

  • कण्ठ्य – क, ख, ग, घ > 4
  • तालव्य – च, छ, ज, झ > 4
  • मूर्धन्य – ट, ठ, ड, ढ, ण > 5
  • दन्त्य – त, थ, द, ध, (न-पूर्वी अप.) > 5
  • ओष्ट्य प, फ, ब, भ, म > 5
  • अन्तस्थ – य, र, ल, व (श-पूर्वी अपभ्रंश) > 5
  • ऊष्म – स, ह  > 2

अपभ्रंश भाषा की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ

  • अपभ्रंश को उकार बहुला भाषा कहा गया है।
  • अपभ्रंश वियोगात्मक हो रही थी अर्थात् अपभ्रंश में विभक्तियों के स्थान पर स्वतन्त्र परसर्गों का प्रयोग होने लगा था।
  • अपभ्रंश में दो वचन (एकवचन और बहुवचन) और दो ही लिंग (पुलिंग और स्त्रीलिंग) मिलते हैं।

अवहट्ट, अपभ्रंश का ही परवर्ती या परिवर्तित रूप है। डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के बीच की कड़ी को ‘अवहट्ट’ कहा है। ‘अवहट्ट‘ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग-ज्योतिश्वर ठाकुर ने अपने ‘वर्णरत्नाकर’ ग्रन्थ में किया है।

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