पुनर्बलन कौशल – परिभाषा, पुनर्बलन के प्रकार, घटक

Punarbalan Kaushal

पुनर्बलन कौशल (Reinforcement Skill)

पुनर्बलन का अर्थ है शिक्षक का वह व्यवहार जिससे छात्रों को पाठ के विकास में भाग लेने हेतु एवं प्रश्नों का सही उत्तर देने हेतु प्रोत्साहन प्राप्त हो।

अतः “पुनर्बलन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रतिक्रिया के तुरन्त बाद किसी उद्दीपक को यदि उपस्थित किया जाये तो वाणी की प्रतिक्रिया शक्ति बढ़ती है।” पुनर्बलन शब्द अधिगम के मनोविज्ञान से लिया गया है।

शिक्षक कक्षा में शिक्षण देने के साथ-साथ अनेक क्रियाएँ करता है; जैसे बालक किसी इच्छित व्यवहार का प्रदर्शन करता है तो शिक्षक उसे शाब्दिक या अशाब्दिक स्वीकृति प्रदान करके पुनर्बलित करता है। इससे बालक की प्रतिक्रिया शक्ति को बढ़ावा मिलता है।

स्किनर का मानना है कि शिक्षक द्वारा छात्र की प्रशंसा करने, उत्तर को स्वीकार करने अथवा सिर हिलाने मात्र से ही पुनर्बलन सम्भव है। यह शिक्षक के व्यवहार पर निर्भर करता है कि वह किस व्यवहार को किस समय व किस प्रकार से पुनर्बलित करता है।

पुनर्बलन कौशल की परिभाषाएं

  1. स्किनर के अनुसार- “पुनर्बलन वह स्थिति है जो छात्र की प्रतिक्रिया में वृद्धि करती है।”
  2. C.E.R.T. (1976) के एक दल ने अध्ययन किया और पाया कि शिक्षक अथवा सहपाठी द्वारा यदि शिक्षण के मध्य पुनर्बलित किया जाये तो दोनों ही लगभग समान रूप से प्रभावशाली होते हैं।
  3. ओलीवर (1964) के अनुसार-“वीडियो पुनर्बलन पर्यवेक्षक द्वारा दिये गये मौखिक पुनर्बलन से अधिक प्रभावशाली होता है।”
  4. पलवर्ग (1970) एवं मॉरिस (1972) के अनुसार-“वीडियो पुनर्वलन ओडियो पुनर्बलन से अधिक प्रभावशाली है।”

किसी कक्षा में पढ़ाते समय जो स्थितियाँ शिक्षक के समक्ष उत्पन्न होती हैं, उन पर यदि ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट दिखायी देगा कि शिक्षक द्वारा प्रश्न पूछने पर जो विद्यार्थी उत्तर देने हेतु हाथ उठाते हैं- उनमें सभी की स्थिति एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न होती है। कोई पूरा हाथ उठा देता है तो कोई हाथ उठाने के साथ-साथ उचकता भी है। वह चाहता है कि उस प्रश्न का उत्तर शिक्षक उसी से पूछे। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनका हाथ कभी ऊपर उठता है तो कभी नीचे गिर जाता है और कुछ ऐसे भी होते हैं कि भयवश सिर नीचे झुका लेते हैं कि शिक्षक कहीं उनसे ही उस प्रश्न का उत्तर न पूछ बैठे?

ये तथा इसी प्रकार की अन्य स्थितियों का सम्बन्ध विद्यार्थियों की आन्तरिक भावनाओं से है। जो उचक रहा है, उसे उसकी दृष्टि से प्रश्न का उत्तर जितना अच्छा आता है, उतना अच्छा शायद ही किसी को आता हो। इसके ठीक विपरीत जिसका सिर जमीन में धँसा जा रहा है, उसे या तो प्रश्न का उत्तर आता ही नहीं या फिर आता है तो वह निश्चित रूप से संकोची वृत्ति का है। इस प्रकार सबकी अलग-अलग मानसिकता उनके द्वारा हाथ उठाये जाने की क्रियाओं में साफ-साफ झलकती है।

ऐसी स्थिति में शिक्षक और कुछ न करके केवल इतना ही करे कि पहले ऐसे विद्यार्थियों को पहचाने और फिर उन विद्यार्थियों में से किसी को उत्तर देने हेतु कहे जो उत्तर देने में हिचकिचा रहे हैं। वे खड़े होकर भी उत्तर न दें तो उनसे पुन: कहे कि कोशिश करके उत्तर दें। वे सही या गलत जैसा भी उत्तर दें उसे स्वीकार कर लें किन्तु ‘गलत’ को गलत न कहकर यही कहें- “बहुत अच्छा उत्तर दिया किन्तु इसे इस प्रकार कहते तो और अच्छा होता।” इतना कहकर सही उत्तर से उन्हें अवगत करा दें।

बस, शिक्षक द्वारा इतना कहने मात्र से विद्यार्थी की वह भावना जो उसे उत्तर देने के लिये अन्दर उकसा रही थी, बलवती हो जाती है। भावनाओं के इस प्रकार दूसरों द्वारा प्रशंसा करने, पुरस्कृत करने अथवा किसी अन्य रूप में उसे मान्यता प्रदान करने तथा बढ़ावा देने को ही पुनर्बलन (Reinforcement) कहते हैं।

कभी-कभी शिक्षक कुछ कहता नहीं फिर भी उसकी भाव-भंगिमाओं का विद्यार्थियों की उपलब्धि पर सकारात्मक (Positive) अथवा नकारात्मक (Negative) प्रभाव पड़ सकता है। उसका हँसना, मुस्कराना, स्वीकारात्मक, सिर हिलाना आदि उसके उत्साह को पुनर्बलित करते हैं तो उसका आँख दिखाना, हाथ उठाना नकारात्मक रूप में सिर हिलाना आदि उनको आशा को निराशा में और उत्साह को हताशा में बदल देते हैं।

पुनर्बलन (Reinforcement) के प्रकार

पुनर्बलन, मूलत: दो प्रकार का हो सकता है-

  1. धनात्मक या सकारात्मक (Positive)।
  2. ऋणात्मक या नकारात्मक (Negative)।

इन दोनों ही प्रकार के पुनर्बलन के, दो-दो रूप हो सकते हैं।

  1. शाब्दिक (Verbal) ।
  2. अशाब्दिक या सांकेतिक (Non-verbal)।

स्पष्ट है कि ‘धनात्मक पुनर्बलन‘ चाहे वह शब्दों के रूप में हो अथवा संकेतों के रूप में उपलब्धि को बढ़ावा देना है तो नकारात्मक पुनर्बलन उपलब्धियों में बाधक सिद्ध होता है।

ऐसा केवल शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, अपितु सभी कार्य क्षेत्रों में सम्भव है। शिक्षा के क्षेत्र में भी यह केवल विद्यार्थियों तक सीमित हो ऐसा भी नहीं है। ईमानदार, निष्पक्ष और कुशल शिक्षकों को भी अलग-अलग रूपों में प्रोत्साहित और हतोत्साहित किया जा सकता है।

लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सकारात्मक उद्दीपन चाहे वह शाब्दिक हो अथवा अशाब्दिक नकारात्मक रूप धारण कर लेता है तो नकारात्मक उद्दीपन सकारात्मक पुनर्बलन में परिवर्तित हो जाता है।

कैसे? हमें एक संस्मरण याद आता है। एक विद्यार्थी बौद्धिक दृष्टि से प्रखर तथा पढ़ने में बड़ा होशियार था; लेकिन पढ़ता नहीं था छोटी सी आयु में ही कई प्रकार के ‘अंह‘ अनावश्यक रूप से पाले हुए था। बार-बार समझाने पर भी कोई सुधार नहीं हुआ। पुरुषार्थ चतुष्ट्य के साम, दाम, दण्ड, भेद– में से जब ‘साम‘ भी प्रभावहीन हो गया तो ‘दण्ड‘ के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं रहा। उसे उसकी एक ऐसी ही भूल के लिये जिसे क्षमा करना सम्भव नहीं था दण्डित करते हुए पाठशाला से निकाल दिया गया।

पुनर्प्रवेश के प्रयत्न होने लगे। अन्त में उसे सशर्त पुनर्प्रवेश मिल भी गया और वह बदल भी गया, वर्षों बीत गये। एक दिन उसके वही गुरुजी जिन्होंने उसे काफी समझाया भी था और न समझने पर उसे दण्डित भी किया था; पैदल-पैदल सड़क पर चले जा रहे थे। इतने में किसी ने उनके चरण पकड़ लिये, और रोने लगा। गुरुजी ने देखा तो और कोई नहीं अपितु उनका वही रामचरण था, जिसे उन्होंने दण्डित किया था। वह अपने गुरु राम के चरणों को पकड़कर अपने नाम को सार्थक कर रहा था। गुरुजी ने उसे उठाया और उसकी कुशलक्षेम पूछी तो पता लगा कि उनका वह प्रिय शिष्य उप-जिलाधीश (Dy. collector) बन चुका था। गुरुजी ने सुना तो उसे गले लगाया। दोनों की आखों में आँसू थे। एक की आँखों में पश्चाताप के तो दूसरे की आँखों में हर्षातिरक के। नकारात्मक पुनर्बलन सकारात्मक बन चुका था।

यही नहीं इसके ठीक विपरीत भी हो सकता है; अर्थात् यदि सकारात्मक पुनर्बलन पक्षपातपूर्ण बन जाय अथवा उसकी अति होकर अनावश्यक लगने लगे तो वह भी नकारात्मक बन जाता है।

इसलिये पुनर्बलन के सम्बन्ध में कुछ बातों का ध्यान विशेष रूप से रखा जाय-

  1. पुनर्बलन का प्रयोग तभी किया जाय जब किसी छात्र द्वारा किसी प्रश्न का उत्तर अथवा समस्या का समाधान अप्रत्याशित हो।
  2. सामान्य उत्तरों के लिये पुनर्बलन का प्रयोग कभी नहीं किया जाय; यथा-माता-पिता का नाम बताने पर भी, कहना- “शाबाश!” बहुत अच्छा उत्तर दिया। आदि।
  3. पुनर्बलन, चाहे शाब्दिक हो अथवा अशाब्दिक, वह सहज रूप में होना चाहिये कृत्रिमता लिये हुए नहीं।
  4. पुनर्बलन की अति भी नकारात्मक रूप धारण कर लेती है; अत: उसका अत्यधिक प्रयोग न करके आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जाय।
  5. नकारात्मक पुनर्बलन की दृष्टि से कभी भी जाति, सम्प्रदाय क्षेत्र अथवा वर्गगत टिप्पणी न की जाय; अन्यथा घातक सिद्ध हो सकती है।
  6. नकारात्मक पुनर्बलन केवल नियम विरुद्ध अथवा निन्दनीय कार्यों के लिये ही दिया जाना चाहिये सामान्य रूप में नहीं।
  7. पुनर्बलन, चाहे वह सकारात्मक हो अथवा नकारात्मक निष्पक्षता लिये हुए होना चाहिये। पक्षपातपूर्ण ढंग से सही और सकारात्मक पुनर्बलन भी नकारात्मक बन जाता है।
  8. पुनर्बलन शिक्षक-छात्र अन्तःक्रिया के आधार पर तत्क्षण ही दिया जाना चाहिये; अन्यथा वह प्रभावहीन हो जाता है।
  9. हाँ, एक बात अवश्य है कि किसी के निन्दनीय कार्यों के लिये उसकी भर्त्सना (Blame) करना सबके सामने न की जाकर अकेले में कुछ कहना और समझाना अधिक प्रभावी सिद्ध होता है।
  10. अन्त में, पुनर्बलन हेतु ‘शाबाश’ बगैरह जैसे शाब्दिक अथवा अशाब्दिक किसी एक ही रूप का प्रयोग न कर यथा स्थिति एवं यथावश्यकता अलग-अलग रूपों का प्रयोग ठीक रहता है।

पुनर्बलन कौशल के घटक

  1. प्रशंसात्मक शब्दों का प्रयोग (Use of praise words)।
  2. छात्र के उत्तर की पुनरावृत्ति या संशोधित करना (Repeating and amending student’s responses)।
  3. सकारात्मक या धनात्मक अशाब्दिक पुनर्बलनों का प्रयोग (Use of positive nonverbal reinforcement)।
  4. छात्र के उत्तर को श्यामपट्ट पर लिखना (Writing pupils response on blackboards)।
  5. हतोत्साहित करने वाले शब्दों का प्रयोग न करना (Don’t use dicouraging words)।
  6. नकारात्मक अशाब्दिक पुनर्बलनों का प्रयोग (Use of negative nonverbal reinforcement)।
  7. पुनर्बलनों का अनुचित प्रयोग (Inappropriate use of reinforcement)।
  8. नकारात्मक शाब्दिक पुनर्बलनों का प्रयोग (Use of negative verbal reinforcement)।

1. प्रशंसात्मक शब्दों का प्रयोग– शिक्षक अपने कार्य को अच्छा करवाने के लिये या शिक्षण कार्य को अधिक ग्रहण कराने के लिये प्रशंसात्मक शब्दों का प्रयोग करते हैं। जैसे– अच्छा, शाबास, हाँ-हाँ, ठीक है, सही उत्तर होने पर मुस्कराना, सिर हिलाना या हाथ के संकेत आदि। इनका छात्रों पर अधिक प्रभाव पड़ता है जिससे वे प्रोत्साहित होते हैं।

2. छात्र के उत्तर की पुनरावृत्ति– सही उत्तर को दुहराना तथा गलत उत्तर को संशोधित करना।

3. सकारात्मक/धनात्मक अशाब्दिक पुनर्बलनों का प्रयोग– शिक्षक के हावभाव; जैसे- छात्रों को आशाभरी दृष्टि से देखना, शिक्षक की प्रसन्न भाव-अभिव्यक्ति द्वारा कक्षा में प्रवेश करना अर्थात् शिक्षक बिना बोले या बिना शब्दों का उपयोग किये सिर या हाथ के संकेतों से अथवा चलकर पास आने आदि से छात्रों को प्रोत्साहित करता है।

4. छात्र के उत्तर को श्यामपट्ट पर लिखना– छात्र के उत्तर को श्यामपट्ट पर लिखना चाहिये जिससे छात्रों में उत्साह आता है एवं सीखने की प्रेरणा मिलती है।

5. हतोत्साहित करने वाले शब्दों का प्रयोग न करना– इसमें शिक्षक “नहीं गलत है, सोचकर बोलिये, जरा ठहरो” आदि कहता है। इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग शिक्षक को नहीं करना चाहिये।

6. नकारात्मक अशाब्दिक पुनर्बलनों का प्रयोग– छात्र द्वारा गलत उत्तर देने पर या अनुचित वात करने पर शिक्षक अपनी अस्वीकृति का प्रदर्शन करता है; जैसे- शिक्षक द्वारा नाराजगी से छात्र की ओर देखना, नकारात्मक सिर हिलाना, घूर कर देखना, पैर से जमीन थपथपाना, तेज चलना आदि। इस प्रकार का व्यवहार शिक्षक को कम करना चाहिये।

7. पुनर्बलनों का अनुचित प्रयोग– पुनर्बलनों का आवश्यकता से अधिक प्रयोग करना इसके महत्त्व को कम कर देता है।

8. नकारात्मक शाब्दिक पुनर्बलनों का प्रयोग– शिक्षक मौखिक या शाब्दिक रूप से छात्रों में अनुचित या गलत व्यवहार या उत्तर के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है, जिससे छात्र पुन: ऐसा व्यवहार न करे। इसमें अध्यापक “नहीं, ऊँहूँ, गलत, बिल्कुल गलत, नो, रुको, सोचकर बोलो” आदि शब्द कहता है। “बेवकूफ, गधा, तुम तो गोबर- गणेश हो, तुम्हारे दादा ने पढ़ा है” आदि शब्दों का प्रयोग अध्यापक को नहीं करना चाहिये।

इस कौशल में मुख्यत: पहले चार घटकों का प्रयोग अधिक होता है। बाद के घटकों का प्रयोग कम करना चाहिये।

पाठ-योजना : सूक्ष्म-शिक्षण

कौशल – पुनर्बलन

प्रशिक्षणार्थी का नाम- . . . . . . . . . . . . . . . दिनांक- . . . . . . . . . .

विषय- इतिहास                                       कक्षा- . . . . . . . . . .

प्रकरण- अकबर की महानता                  समयावधि- 10 मिनट

निर्देश– पाठ का विकास प्रश्नोत्तर विधि से किया जायेगा। शिक्षक प्रश्न पूछेगा, छात्र उत्तर देंगे। यदि छात्र किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेंगे तो शिक्षक, पूरक प्रश्नों द्वारा उत्तर निकलवाने का भरसक प्रयास करेगा तथा सही और अप्रत्याशित उत्तर के लिये उनकी प्रशंसा भी करेगा-

शिक्षक– अंग्रेजों से पूर्व भारत पर किन-किन वंशों ने राज्य किया ?

शिक्षार्थी– मौर्य वंश, गुलामवंश, मुगल-वंश आदि वंशों ने।

शिक्षक– बहुत अच्छा ! अब यह बताइये कि मुगल वंश में कौन से बादशाह हुए?

शिक्षार्थी– अकबर, बाबर, हुमायूँ, शाहजहाँ, जहाँगीर, औरंगजेब आदि।

शिक्षक– इन नामों को क्रम से बताइये।

शिक्षार्थी– प्रयास करने पर सही क्रम नहीं बता पाने के कारण कक्षा में मौन की स्थिति।

शिक्षक– कोई बात नहीं है ! यदि तुम नहीं बता पा रहे हो तो हम बताये देते हैं- बाबर, हुमायूँ… आदि।

अब यह बताइये कि इनमें से तुम्हें सबसे अच्छा कौन लगता है?

शिक्षार्थी– अपनी-अपनी जगह सभी ठीक थे। गुण-दोष तो सभी में होते हैं। बाबर साहसी था तो शाहजहाँ कलाप्रेमी तथा औरंगजेब कट्टर हिन्दू विरोधी होते हुए भी राज्य का एक भी पैसा अपने ऊपर खर्च नहीं करता था।

शिक्षक– तुम ठीक कहते हो! गुण-दोष तो सभी में होते हैं फिर भी कोई अधिक अच्छा होता है तो कोई कम। इसी दृष्टि से बताइये – इन सबमें सर्वाधिक लोकप्रिय कौन हुआ?

शिक्षार्थी– ‘अकबर’ इसीलिये उसे महान् कहते हैं।

शिक्षक– तुमने बहुत सही कहा! लगता है तुमने इतिहास की हर बात को गहराई से समझा है। ऐसा ही होना चाहिये, परन्तु यह तो बताओ कि अकबर ने ऐसे कौन-से अच्छे कार्य किये जिनके कारण वह महान् कहलाया?

शिक्षार्थी– सबसे अच्छा कार्य तो उसने यही किया कि उसने हिन्दू-मुसलमानों में कभी भी भेदभाव नहीं किया। उन्हें राज्य कार्य में उनकी योग्यतानुरूप समान रूप से भागीदार बनाया। उसकी बेगमों में जोधाबाई जोधपुर घराने से और हिन्दू थीं।

शिक्षक– बहुत सही मूल्यांकन किया तुम लोगों ने। और कोई अच्छी बात जो अकबर में तुम्हें पसन्द आयी हो।

शिक्षार्थी– हाँ सर! अकबर की सबसे अच्छी बात हमें यह लगी कि उसने अपनी मन्त्रि-परिषद में राज्य की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ बनाने की दृष्टि से नौ ही मन्त्री रखे, आजकल की तरह सौ और उससे अधिक नहीं। इसके साथ ही वे सभी अपने-अपने क्षेत्र के शिरोमणि थे। उनमें वीरबल जैसे हाजिर जवाब और प्रज्ञावान थे तो तानसेन जैसे सुप्रसिद्ध गायक भी।

शिक्षक (मुस्कराते हुए)- तुमने इतिहास के ही सत्यों को नहीं पहचाना अपितु राजनीति के सम्बन्ध में भी वही सटीक बात कही, लेकिन अध्ययन काल में विद्यार्थी राजनीति से जितना दूर रहे उतना ही अच्छा है।

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