अपभ्रंश – भाषा – तृतीय प्राकृत, विशेषता, वर्गीकरण, काल – इतिहास

अपभ्रंश भाषा (तृतीय प्राकृत)

अपभ्रंश भाषा का समय काल 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता हैं। ‘अप्रभ्रंश’ मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के बीच की कड़ी है। इसीलिए विद्वानों ने ‘अपभ्रंश’ को एक सन्धिकालीन भाषा कहा है।

भर्तृहरि के ‘वाक्यपदीयम्’ के अनुसार सर्वप्रथम व्याडि ने संस्कृत के मानक शब्दों से भिन्न संस्कारच्युत, भ्रष्ट और अशुद्ध शब्दों को ‘अपभ्रंश’ की संज्ञा दी। भर्तृहरि ने लिखा है-

“शब्दसंस्कारहीनो यो गौरिति प्रयुयुक्षते।
तमपभ्रंश मिच्छन्ति विशिष्टार्थ निवेशिनम्॥”

व्याडि की पुस्तक का नाम ‘लक्षश्लोकात्मक-संग्रह‘ था जो दुर्भाग्य-वश अनुपलब्ध है।

‘अपभ्रंश’ शब्द का सर्वप्रथम प्रामाणिक प्रयोग पतंजलि के ‘महाभाष्य‘ में मिलता है। महाभाष्यकार ने ‘अपभ्रंश’ का प्रयोग अपशब्द’ के समानार्थक रूप में किया है-

“भयां सोऽपशब्दाः अल्पीयांसाः शब्दा: इति।
एकैकस्य हि शब्दस्य बहवोऽप्रभंशाः ।।”

अपभ्रंश‘ के सबसे प्राचीन उदाहरण भरतमुनि के ‘नाट्य-शास्त्र‘ में मिलते हैं, जिसमें ‘अपभ्रंश’ को ‘विभ्रष्ट’ कहा गया है।

डॉ. भोलानाथ तिवारी और डॉ. उदयनारायण तिवारी के अनुसार, भाषा के अर्थ में ‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रथम प्रयोग-चण्ड (6वीं शताब्दी) ने अपने ‘प्राक्रत-लक्षण’ ग्रन्थ में किया है। (न लोपोऽभंशेऽधो रेफस्य)।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, ‘अपभ्रंश’ नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन (वि. सं. 650 के पहले) को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है।

भामह ने ‘काव्यालंकार‘ में अपभ्रंश को संस्कृत और प्राकृत के साथ एक काव्योपयोगी भाषा के रूप में वर्णित किया है-

“संस्कृतं प्राकृतं चान्यदपभ्रंश इति त्रिधा।”

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ने अपभ्रंश को ‘ण–ण भाषा‘ कहा है।

आचार्य दण्डी ने ‘काव्यादर्श‘ में समस्त वाङ्मय को संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र, इन चार भागों में विभक्त किया है-

“तदेतद् वाङ्मयं भूयः संस्कृत प्राकृतं तथा।।
अपभ्रंशश्च मिश्रञ्चेत्याहुशर्याश्चतुर्विधम्।।”

आचार्य दण्डी ने ‘काव्यादर्श’ में अपभ्रंश को ‘आभीर‘ भी कहा है-

“आभीरादि गिरथः काव्येष्वपभ्रंशः इति स्मृताः।”

अपभ्रंश को विद्वानों ने विभ्रष्ट, आभीर, अवहंस, अवहट्ट, पटमंजरी, अवहत्थ, औहट, अवहट, आदि नाम से भी पुकारा है।

अपभ्रंश के भेद अथवा प्रकार

विभिन्न विद्वानों ने अपभ्रंश के निम्नलिखित भेद बताए हैं-

विद्वान अपभ्रंश के भेद
नमि साधु (1) उपनागर, (2) आभीर, (3) ग्राम्य ।
मार्कण्डेय (1) नागर, (2) उपनागर, (3) व्राचड।।
याकोबी (1) पूर्वी, (2) पश्चिमी, (3) दक्षिणी, (4) उत्तरी।।
तागरे (1) पूर्वी, (2) पश्चिमी, (3) दक्षिणी।
नामवर सिंह (1) पूर्वी और (2) पश्चिमी ।।

डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी ने अपभ्रंश को भारतीय आर्यभाषा के विकास की एक ‘स्थिति’ माना है। इनके अनुसार 6वीं से 11वीं शती तक प्रत्येक प्राकृत का अपना अपभ्रंश रूप रहा होगा-जैसे मागधी प्राकृत के बाद मागधी अपभ्रंश, अर्धमागधी प्राकृत के बाद अर्धमागधी अपभ्रंश, शौरसेनी प्राकृत के बाद शौरसैनी अपभ्रंश एवं महाराष्ट्री प्राकृत के बाद महाराष्ट्री अपभ्रंश आदि।

अपभ्रंश की ध्वनियों अथवा वर्णों का वर्गीकरण

अपभ्रंश की ध्वनियाँ-डॉ. उदयनारायण तिवारी ने अपभ्रंश की ध्वनियों का वर्गीकरण निम्न ढंग से किया है-

स्वर-(10 स्वर)

  • ह्रस्व- अ, इ, उ, एँ, ओं
  • दीर्घ- आ, ई, ऊ, ए, ओ

व्यंजन-(व्यंजन = 30)

  • कण्ठ्य – क, ख, ग, घ > 4
  • तालव्य – च, छ, ज, झ > 4
  • मूर्धन्य – ट, ठ, ड, ढ, ण > 5
  • दन्त्य – त, थ, द, ध, (न-पूर्वी अप.) > 5
  • ओष्ट्य प, फ, ब, भ, म > 5
  • अन्तस्थ – य, र, ल, व (श-पूर्वी अपभ्रंश) > 5
  • ऊष्म – स, ह  > 2

अपभ्रंश भाषा की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ

  • अपभ्रंश को उकार बहुला भाषा कहा गया है।
  • अपभ्रंश वियोगात्मक हो रही थी अर्थात् अपभ्रंश में विभक्तियों के स्थान पर स्वतन्त्र परसर्गों का प्रयोग होने लगा था।
  • अपभ्रंश में दो वचन (एकवचन और बहुवचन) और दो ही लिंग (पुलिंग और स्त्रीलिंग) मिलते हैं।
  • अवहट्ट अपभ्रंश का ही परवर्ती या परिवर्तित रूप है।
  • डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के बीच की कड़ी को ‘अवहट्ट‘ कहा है।
  • अवहट्ट‘ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग-ज्योतिश्वर ठाकुर ने अपने ‘वर्णरत्नाकर ग्रन्थ में किया है।
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