शिक्षण के आधारभूत कौशल (Fundamental Skills of Teaching) – शिक्षा शास्त्र

Shikshan Kaushal

शिक्षण कौशल की आवश्यकता (Need of Teaching Skills)

एक योग्य अध्यापक अपने छात्रों को अनेक शिक्षण कौशलों का ज्ञान कराता है। एक छात्राध्यापक के लिये यह आवश्यक हो जाता है कि वह शिक्षण कौशलों को अच्छी प्रकार से समझे जिससे वह एक अच्छा निपुण अध्यापक बन सके।

शिक्षण कौशल को समझने से पूर्व- ‘कौशल‘ शब्द को यदि समझा जाय तो अधिक अच्छा रहेगा। इस शब्द को समझने की दृष्टि से हम उन मूर्तियों, मकानों, चित्रों आदि तथा उन कृतियों आदि का स्मरण करें, जिन्हें देखकर हमारे मुँह से अनायास ही निकल पड़ता है- वाह! कमाल कर दिया! क्या मूर्ति है- मुँह से बोलती है आदि-आदि। धन्य हैं वे शिल्पी जिन्होंने इन्हें बनाया गढ़ा और इतना सुन्दर रूप दिया।

हम सोचने लगते हैं मकान और मूर्तियाँ आदि तो वे भी हैं जो हमें भाती तक नहीं और उन्हीं उपकरणों के द्वारा बनी कृतियाँ ये भी हैं कि हमारे मन से कभी जाती नहीं। बार-बार याद आती हैं। मन को झकझोर जाती हैं। एक सुखद अनुभूति का आभास करा जाती हैं।

शिल्पियों को कभी देखा तक नहीं; फिर भी उनका अनदेखा स्मरण करा जाती हैं; प्रशंसा के गीत गवा जाती हैं। इन गीतों का माध्यम है उनकी अमर कृतियाँ, जिनमें भरी पड़े हैं- उनके कौशल।

कौशल का सम्बन्ध किसी क्षेत्र विशेष से ही हो- ऐसा बिल्कुल नहीं है। कौशलों का सम्बन्ध सभी क्रिया क्षेत्रों से है। जहाँ क्रियाएँ हैं, वहीं कौशल भी। चूँकि शिक्षण भी एक ऐसा ही कार्य है जो किसी एक नहीं अनेकों सम्बन्धित क्रियाओं से जुड़ा है।

कभी पाठ की प्रस्तावना करनी होती है तो कभी उसके क्लिष्ट अंशों को समझाना। इन क्रियाओं के लिये भी कई-कई युक्तियों का आश्रय लेना होता है।

कहीं केवल प्रश्न पूछकर काम चल जाता है तो कहीं चित्र भी बनाने या दिखाने पड़ सकते हैं। पुनः इन क्रियाओं को तो सभी शिक्षक करते ही हैं।

फिर भी, किसी शिक्षक का शिक्षण इतना नीरस होता है कि कुछ सुनने को या देखने तक को मन करता नहीं तो कछ के कथन और सहायक साधनों का प्रदर्शन इतना प्रभावी होता है कि मन उन क्रियाओं को सुनने तथा देखने से हटता तक नहीं। इन्हीं का नाम है- शिक्षण कौशल

ये शिक्षण कौशल केवल कुछ प्रश्न पूछने, उदाहरण देने, दृष्टान्त सुनाने, चित्र दिखाने आदि तक ही सीमित नहीं। कक्षा में उपस्थित विद्यार्थियों को इस प्रकार व्यवस्थित ढंग से बिठाने कि वे सभी शिक्षक द्वारा कहे जाने वाले कथनों, दिखाये जाने वाले सहायक साधनों को सरलता से सुन तथा देख सकें आदि भी शिक्षक के अन्तर्गत आते हैं।

यही नहीं पढ़ाते समय भी उसे अपनी दृष्टि केवल पुस्तक में ही नहीं; अपितु विद्यार्थियों पर भी रखनी ही होती है ताकि अनुशासन भंग न हो तथा उसकी प्रत्येक क्रिया को सुन, देख तथा समझकर छात्र सम्बन्धित पाठ की विषयवस्तु को न केवल समझे ही; अपितु उसे आत्मसात् भी कर सकें।

शिक्षण से सम्बन्धित इन सभी क्रियाओं को ढर्रे-ढर्रे नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि इन सभी क्रियाओं का सम्बन्ध जहाँ एक ओर पढ़ायी जाने वाली विषयवस्तु से होता है, वहीं दूसरी ओर उन सजीव विद्यार्थियों से भी जो- शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भाषायी आदि विभिन्न प्रकार की वैयक्तिक विभिन्नताओं के कारण क्षण-क्षण में बदलते रहते हैं।

अतः शिक्षक का कौशल इसमें है कि वह भी परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को बदलता रहे। इस प्रकार शिक्षण के जो विविधि कौशल हैं उनके सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि शिक्षण कौशल- शिक्षण पूर्व अथवा वास्तविक शिक्षण के समय, शिक्षक द्वारा की जाने वाली वे समस्त क्रियाएँ तथा प्रक्रम हैं जो विषयवस्तु को विद्यार्थियों द्वारा अधिगम की दृष्टि से रुचिकर, सरल तथा बोधगम्य बनाते हैं।

शिक्षण कौशल का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Teaching Skills)

कक्षा में शिक्षक जो कुछ पढ़ाता है या जो कुछ बताता है या जिस प्रकार का व्यवहार करता है उसी को शिक्षण कौशल कहते हैं अर्थात् शिक्षण कौशल समान व्यवहारों का एक समूह है जो शिक्षण प्रक्रिया का निर्माण करते हैं। गणित की भाषा में बात करें तो “शिक्षण कौशल शिक्षक से सम्बन्धित व्यवहारों का समूह है जो वह कक्षा में करता है तथा जिसके द्वारा छात्र के अधिगम में सहायता करता है।

यदि शिक्षक आधारभूत शिक्षण कला में निपुण नहीं है तो वह छात्रों का उचित मार्गदर्शन करने और उनमें वांछित परिवर्तन लाने में सफल नहीं हो सकता। शिक्षक को शिक्षण कला में निपुण होने के लिये शिक्षण क्रिया के समय शिक्षक द्वारा प्रतिपादित व्यवहारों की जानकारी करके उनका अभ्यास करना नितान्त आवश्यक है। शिक्षण प्रक्रिया के समय शिक्षक द्वारा विभिन्न व्यवहारों का सम्पादन होता है। इस तरह के व्यवहारों को शिक्षण कौशल (Teaching skill) कहते हैं।

प्रभावशाली शिक्षण के विभिन्न शिक्षण कौशलों का ज्ञान तथा उसकी पहचान करना एक कुशल शिक्षक के लिये महत्त्वपूर्ण कार्य है। इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने शिक्षण की प्रभावशीलता तथा शिक्षण के लिये विश्लेषण का अध्ययन किया और अपने दृष्टिकोण से शिक्षण कौशल को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित भी किया है:-

  1. मैकिन्टेयर तथा ह्वाइट (Machintyre and White) के अनुसार, “यह सम्बद्ध शिक्षण व्यवहारों का वह स्वरूप होता है जो कक्षा की विशिष्ट अन्तः प्रक्रिया को उत्पन्न करता है जो शैक्षिक उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायक होता है और छात्रों को सीखने में सुगमता प्रदान करता है।
    “Teaching skill is a set of related teaching behaviours which is specified types of classroom interaction situations lend to faciliate the achievement of specified educations objectives.”
  2. बी. के. पासी एवं ललिता (K. Passi and Lalita) के शब्दों में, “शिक्षण कौशल का तात्पर्य सम्बन्धित शिक्षण क्रियाओं तथा व्यवहारों के सम्पादन से है जो छात्रों को सीखने के लिये सुगमता प्रदान करने के उद्देश्य में किये जाते हैं।
    “Teaching skill are a set of related teaching acts or behaviours performed with the intention to faciliate pupils learning.”
  3. एन.एल. गेज (L. Gage) के मतानुसार, “शिक्षण कौशल वह अनुदेशन प्रक्रियाएँ हैं जिन्हें अध्यापक अपनी कक्षा शिक्षण में प्रयोग करता है। यह शिक्षण क्रम की विभिन्न क्रियाओं से सम्बन्धित होता है जिन्हें शिक्षक अपने कक्षा अन्तःक्रिया में लगातार उपयोग करता है।
    “Teaching skill are specific instructional activities and procedure that a teacher may use in the classroom. These are related to the various stages of teaching or in the continuous flow of teacher performance.”

शिक्षण कौशल की विशेषताएँ (Characteristics of Teaching Skills)

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर शिक्षण कौशल की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं:-

  1. शिक्षण कोशल कक्षा शिक्षण व्यवहार की एक इकाई से सम्बन्धित हैं।
  2. शिक्षण कौशल के माध्यम से शिक्षण शैक्षिक विशिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक होते हैं।
  3. शिक्षण कौशल छात्रों को सीखने में सहायता एवं सुगमता प्रदान करते हैं।
  4. शिक्षण कौशल द्वारा कक्षागत अन्तःप्रक्रिया की परिस्थिति पैदा की जाती है।
  5. शिक्षण कौशल शिक्षण क्रियाओं अथवा व्यवहारों से सम्बन्धित होते हैं।
  6. शिक्षण कौशल शिक्षण विधि को प्रभावी तथा सफल बनाते हैं।

विभिन्न शिक्षण कौशलों का एकीकरण (Integration of Various Teaching Skills)

सूक्ष्म शिक्षण को शिक्षक एक जटिल प्रक्रिया मानता है। अतः शिक्षक के लिये यह आवश्यक हो जाता है कि वह पहले एक-एक करके शिक्षण कौशलों का अभ्यास करे। जब विभिन्न कौशलों पर पूर्ण अधिकार हो जाये तो उनका एकीकरण एवं अभ्यास कर शिक्षण प्रक्रिया को वह प्रभावशाली बना सकता है। इस प्रकार एक सफल अध्यापक कौशलों के एकीकरण द्वारा शिक्षण में एक ही सम्बोध को पढ़ाने के लिये एक से अधिक कौशलों का समावेश कर सकता है परन्तु मनोवैज्ञानिक कौशलों के एकीकरण को असम्भव मानते हैं कुछ इसे पूर्णरूपेण सम्भव मानते हैं।

यही कारण है कि इस क्षेत्र में अनेक अनुसन्धान किये जा रहे हैं। अनुसन्धानों से यह स्पष्ट हो गया है कि शिक्षण कौशलों का प्रयोग विषय के साथ-साथ परिस्थितिजन्य है। अतः कौशलों के प्रयोग में एकीकरण तथा पृथक्ता दोनों ही शिक्षण के अनुसार मान्य हैं।

  1. डॉ. वी. के. पासी (1976) के अनुसार, “शिक्षण कौशल, छात्रों के सीखने के लिये सुगमता प्रदान करने के विचार से सम्पन्न किये गये सम्बन्धित शिक्षण व्यवहारों का समूह है।”
  2. डॉ. कुलश्रेष्ठ (1993) के अनुसार, “शिक्षण कौशल शिक्षक के हाथ में वह शस्त्र है जिसका प्रयोग करके शिक्षक अपने कक्षा शिक्षण को प्रभावशाली तथा सक्रिय बनाता है तथा कक्षा की अन्तःक्रिया में सुधार लाने का प्रयास करता है।”
  3. क्लार्क (1970) के अनुसार, “शिक्षण उन क्रियाओं पर आधारित है जो छात्र व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिये नियोजित एवं क्रियान्वित की जायें।”
  4. एन. एल. गेगे (1968) के अनुसार, “शिक्षण कौशल वह विशिष्ट अनुदेशन प्रक्रिया है जिसे अध्यापक अपने कक्षा शिक्षण में प्रयोग करता है। यह शिक्षण क्रम की विभिन्न क्रियाओं से सम्बन्धित होता है जिन्हें शिक्षक अपनी कक्षा अन्तःक्रिया में लगातार उपयोग करता है।”
  5. मेक इण्टेयर तथा व्हाइट (1965) के अनुसार, “शिक्षण कौशल शिक्षण व्यवहारों से सम्बन्धित वह स्वरूप है जो कक्षा की अन्तःक्रिया द्वारा उन विशिष्ट परिस्थितियों को जन्म देता है जो शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होती है और छात्रों को सीखने में सुगमता प्रदान करती है।”

इन परिभाषाओं को पढ़ने के पश्चात् हम कह सकते हैं कि शिक्षण अनेक शाब्दिक एवं अशाब्दिक क्रियाओं पर आधारित है। जैसे प्रश्न पूछना, सुनना, छात्रों के उत्तर स्वीकारना, मुस्कराना, सिर हिलाना, गतिशील होना, हाव-भाव दिखाना आदि।

शिक्षण कौशलों का वर्गीकरण (Classification of Teaching Skill)

शिक्षण कौशलों को मोटे रूप से दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है। ये दो वर्ग हैं:-

  1. शिक्षण पूर्व चिन्तन एवं मनन आधारित कौशल।
  2. वास्तविक शिक्षण के समय वैचारिक, भावात्मक तथा क्रियात्मक कौशल।

पुनः इन दोनों प्रकार के कौशलों के अन्तर्गत भी दो-दो प्रकार के कौशल आते हैं।

पहले प्रकार के दो कौशल हैं (i) शिक्षण-पूर्व-शिक्षण-योजना को मूर्त रूप देने से पूर्व तथा (ii) वास्तविक शिक्षण से ठीक पूर्व कक्षा व्यवस्था आदि से सम्बन्धित कौशल

इसी प्रकार दूसरे वर्ग के अन्तर्गत आने वाले दो प्रकार के कौशल हैं (i) शिक्षण सम्बन्धी वास्तविक क्रियाएँ तथा (ii) शिक्षण के साथ-साथ परिवर्तित परिस्थितिजन्य, चिन्तन प्रधान क्रियाएँ

शिक्षण के जिन कौशलों को ऊपर विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत किया गया है- उन सबमें शिक्षक की कल्पना, चिन्तन तथा शारीरिक क्रियाएँ सभी कुछ सन्निहित हैं। यहाँ समझने की बात यह है कि कल्पना मन (Mind) का विषय है तो चिन्तन बुद्धि (Intelligence) तथा सर्जन (Creatin) सदैव क्रियात्मक हुआ करता है; चाहे वह मौखिक रूप में मुख का कार्य हो अथवा दृश्य रूप में हाथों का। कुशलता के अभाव में सृजनशीलता सम्भव ही नहीं।

इस दृष्टि से- शिक्षक को नया कुछ करने हेतु पहले कल्पना करनी होती है; सोचना होता है तथा बात में तदनुसार क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। सोचना पड़ता है कि कहाँ कौन-सा दृष्टान्त, लोकोक्ति, सूक्ति, मुहावरा, उद्धरण, परिभाषा, चित्र आदि सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध होगा।

इसी चिन्तन के आधार पर उसे शिक्षण पूर्व, शिक्षण की योजना बनानी होती है तो वास्तविक शिक्षण के समय उसका ध्यान भी रखना होता है और यदि वह युक्ति किसी अंश को समझाने हेतु प्रभावी सिद्ध नहीं हो रही है तो वास्तविक शिक्षण के मध्य, वही उस अंश को समझाने हेतु उसके विकल्प पर भी विचार करना होता है।

इस प्रकार अनुदेशन उद्देश्यों (Instructional objectives) के निर्धारण से लेकर पाठ की पुनरावृत्ति तथा बौद्धिक चिन्तन एवं मौखिक तथा दृश्य क्रियाओं का यह क्रम अनवरत रूप से चलता ही रहता है।

अतः शिक्षण कौशलों को ऊपर जिन वर्गों में बाँटा गया है- उनमें से भी हर वर्ग के अन्तर्गत कई-कई कौशल आते हैं। शिक्षण-पूर्व वास्तविक शिक्षण से पूर्व व्यवस्था सम्बन्धी तथा वास्तविक शिक्षण के समय बरती जाने वाले ये शिक्षण कौशल अग्र प्रकार हो सकते हैं-

1. शिक्षण पूर्व तैयारी तथा योजना-आलेखन

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित शिक्षण कौशल आते हैं

  1. अनुदेशन उद्देश्यों (Instructional objectives) का निश्चयन।
  2. पाठ योजना (Lesson-plan) का निर्माण तथा लेखन।

2. शिक्षण पूर्व कक्षा व्यवस्था एवं सौहार्द्र स्थापन

इसके अन्तर्गत भी दो प्रकार के कौशल आते हैं-

  1. कक्षा-व्यवस्था (Classroom Management)।
  2. समीपता/आत्मीयता/सौहार्द्र स्थापन (Establishing rapport)।

3. वास्तविक शिक्षण पूर्व विषयोन्मुखता (Orientation)

  1. इसके अन्तर्गत- पाठ-परिचय (Introduction) आता है जिसे सामान्य रूप में पाठ की प्रस्तावना भी कहा जाता है।

4. वास्तविक शिक्षण (Actual teaching) के साथ-साथ

शिक्षक के वास्तविक कौशल इसी भाग में आते हैं क्योंकि यहाँ दोनों प्रकार के-त्वरित चिन्तन (Immediate thinking) तथा क्रियात्मक (Conative) कौशल साथ-साथ चलते हैं। इस भाग में जिनशिक्षण कौशलों से काम लिया जाता है, वे हैं-

  1. प्रश्न कौशल (Questioning skill) ।
  2. शृव्य-शैक्षणिक सहायक साधनों (Audio-teaching aids) का युक्तिसंगत उपयोग।
    1. (7.1) दृष्टान्त (Illustrations) का चयन।
    2. (7.2) उदाहरणों (Examples) की सार्थकता एवं उपयुक्तता।
    3. (7.3) व्याख्या (Explanation) कौशल।
    4. (7.4) आख्यान (Narration) कौशल।
  3. दृश्य शैक्षणिक साधनों (Visual teaching aids) का प्रभावी उपयोग/प्रयोग।
    1. (8.1) प्रतिकृति (Portraits) का प्रदर्शन।
    2. (8.2) चित्र/रेखाचित्र का उपयोग।
    3. (8.3) यन्त्रादि (Machines and apparatus) का उपयोग का औचित्य (Rationali-zation) ।
  4. युक्ति-वैविध्य या विविधता (Variety in the use of devices) ।
  5. उद्दीपन परिवर्तन (Stimulation variation)।
  6. मौन एवं अशाब्दिक क्रियाएँ (Silence and non-verbal cues) ।
  7. पुनर्बलन (Re-inforcement)।
  8. छात्र सहभागिता (Students’ participation) को बढ़ावा देना।
  9. श्यामपट्ट का उपयोग (Use of blackboard)।
    1. (14.1) निदर्शना (Illustrations) की दृष्टि से।
    2. (14.2) पाठ्यांश के सार लेखन (Summary) लेखन की दृष्टि से।
  10. कक्षा-निरीक्षण (Supervision) एवं त्रुटि (Errors) का संशोधन।
  11. पाठ का पुनरावर्तन या मूल्यांकन (Recapitulation)।
  12. गृहकार्य प्रदत्तीकरण (Home-work assignments)।

विभिन्न शिक्षण कौशल (Various Teaching Skills)

स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षण प्रक्रिया के कौशलों के एक समूह के रूप में शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रथम प्रयास किया गया।

कौशलों का चयन करना सूक्ष्म शिक्षण की एक बहुत बड़ी समस्या है। कौशल चुनने के लिये यह जानना आवश्यक हो जाता है कि किन-किन कौशलों से शिक्षण प्रभावशाली हो सकता है।

शिक्षण में अनेक शिक्षण कौशलों का उपयोग अध्यापक करता है। अब प्रश्न उठता है कि ये शिक्षण कौशल कौन-कौन से हैं और इनकी संख्या कितनी है। सर्वप्रथम एलन एवं रायन (1969) ने 14 शिक्षण कौशल बताये; स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय ने 14 व कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में 18 व भारतवर्ष में CASE तथा एम. एस. विश्वविद्यालय बड़ौदा ने 21 शिक्षण कौशलों की सूची तैयार की।

सन् 1976 में डॉ. पासी ने 13 शिक्षण कौशल माने जबकि डॉ. जँगीरा ने सन् 1979 में 20 शिक्षण कौशल माने। डॉ. कुलश्रेष्ठ, डॉ. मिश्रा तथा डॉ. ममगाइन ने 1983 में 15 शिक्षण कौशल बताये।

प्रो. डी. एलन तथा प्रो. के. रायन के अनुसार बताये गये 14 शिक्षण कौशल निम्नलिखित हैं-

  1. उद्दीपन परिवर्तन (Stimulus variation)।
  2. पुनर्बलन कौशल (Skill of reinforcement)।
  3. विन्यास प्रेरणा (Set induction)।
  4. समीपता (Closure)।
  5. मौन एवं अशाब्दिक अन्तः प्रक्रिया (Silence and nonverbal clues)
  6. प्रश्न पूछने की गति (Fluency in asking questions) ।
  7. गहन या खोजपूर्ण प्रश्न (Probing questions)।
  8. विकेन्द्रीय प्रश्न (Divergent questions)।
  9. छात्र व्यवहार का ज्ञान (Knowledge of student’s behaviour) ।
  10. दृष्टान्त देना तथा उदाहरणों का प्रयोग (Illustrating and use of examples)।
  11. व्याख्यान (Lecturing) ।
  12. उच्च स्तरीय प्रश्न (Higher order questions)।
  13. नियोजित पुनरावृत्ति (Planned repetition)
  14. सम्प्रेषण पूर्णता (Completeness of communication) |

भारतीय शिक्षाशास्त्री प्रो. वी. के. पासी (1976) ने 13 शिक्षण कौशलों को महत्त्वपूर्ण बताया जो निम्नलिखित हैं-

  1. अनुदेशन उद्देश्यों को लिखना (Writing instructional objectives)।
  2. पाठ की प्रस्तावना (Introduction of a lesson)।
  3. प्रश्नों की प्रवाहशीलता (Fluency in questioning)।
  4. अनुशीलन या खोजक प्रश्न (Probing questions)।
  5. व्याख्या देना (Explaining) ।
  6. उदाहरण के साथ दृष्टान्त देना (Illustrating with examples) ।
  7. उद्दीपन परिवर्तन (Stimulus variation)।
  8. मौन एवं अशाब्दिक संकेत (Silence and non verbal clues)।
  9. पुनर्बलन (Reinforcement)।
  10. छात्रों की सहभागिता बढ़ाना (Increasing student’s participation) ।
  11. श्यामपट्ट का प्रयोग (Using blackboard)।
  12. समापन की प्राप्ति (Achieving closure)।
  13. व्यवहार की पहिचान एवं ध्यान (Recognizing behaviour and attention) I

डॉ. एस. पी. कुलश्रेष्ठ, डा. वी. के. मिश्रा तथा डॉ. आभा ममगाइन ने निम्नलिखित 15 शिक्षण कौशल महत्त्वपूर्ण बताये हैं-

  1. पाठ प्रस्तावना (Introducing lesson) ।
  2. व्यावहारिक उद्देश्य लिखना (Writing behaviour objectives) ।
  3. शिक्षण बिन्दु निकालना (Finding teaching point)।
  4. प्रश्नों की प्रवाहशीलता (Fluency in questioning)।
  5. खोजक प्रश्न (Probing questions) ।
  6. श्यामपट्ट प्रयोग (Using blackboard) ।
  7. पुनर्बलन (Reinforcement)।
  8. व्याख्या करना (Explaining) ।
  9. उद्दीपन परिवर्तन (Stimulus variation)।
  10. सक्रिय शिक्षक कथन (Acting teacher statement)।
  11. मूल्यांकन करना (Using evaluation) ।
  12. वैयक्तिक भिन्नता की अनुरूपता (Caring class individual difference)।
  13. प्रभावशाली सम्प्रेषण (Effective communication) ।
  14. कक्षा प्रबन्ध (Managing class)।
  15. समापन की प्राप्ति (Achieving closure)।

शिक्षण कौशल का विकास (Development of Teaching Skill)

शिक्षण कौशलों के विकास में मुख्य रूप से पाठ प्रस्तावना कौशल, प्रश्न पूछने तथा उत्तर प्राप्त करने का कौशल, शिक्षार्थी सहभागिता कौशल, शिक्षण अधिगम सामग्री के प्रयोग करने का कौशल तथा निष्कर्ष निकालने का कौशल आदि आते हैं। इन कौशलों में पारंगतता प्राप्त करना एक कुशल अध्यापक का कक्षा अध्यापन में प्रमुख दायित्व होता है। इन शिक्षण कौशलों के विकास के लिये उसी अभीष्ट प्रयत्न करने पड़ते हैं।

शिक्षण और सीखने का अभीष्ठ सम्बन्ध है। एक अध्यापक को शिक्षण की प्रभावशीलता के लिये अनेक प्रकार से प्रयास करने पड़ते हैं। नीरस शिक्षण को सक्रियता तथा प्रभावशीलता प्रदान करना शिक्षक का प्रमुख दायित्व होता है।

एक अध्यापक अपने शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिये विभिन्न प्रकार के शिक्षण कौशलो को निम्नलिखित प्रकार से विकसित कर सकता है-

1. पुनर्बलन कौशल (Reinforcement Skill)

पुनर्बलन का अर्थ है शिक्षक का वह व्यवहार जिससे छात्रों को पाठ के विकास में भाग लेने हेतु एवं प्रश्नों का सही उत्तर देने हेतु प्रोत्साहन प्राप्त हो।

अतः पुनर्बलन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रतिक्रिया के तुरन्त बाद किसी उद्दीपक को यदि उपस्थित किया जाये तो वाणी की प्रतिक्रिया शक्ति बढ़ती है। पुनर्बलन शब्द अधिगम के मनोविज्ञान से लिया गया है।

शिक्षक कक्षा में शिक्षण देने के साथ-साथ अनेक क्रियाएँ करता है; जैसे– बालक किसी इच्छित व्यवहार का प्रदर्शन करता है तो शिक्षक उसे शाब्दिक या अशाब्दिक स्वीकृति प्रदान करके पुनर्बलित करता है। इससे बालक की प्रतिक्रिया शक्ति को बढ़ावा मिलता है।

स्किनर का मानना है कि शिक्षक द्वारा छात्र की प्रशंसा करने, उत्तर को स्वीकार करने अथवा सिर हिलाने मात्र से ही पुनर्बलन सम्भव है। यह शिक्षक के व्यवहार पर निर्भर करता है कि वह किस व्यवहार को किस समय व किस प्रकार से पुनर्बलित करता है।

2. उद्दीपन परिवर्तन कौशल (Stimulus Variation Skill)

यदि शिक्षण को प्रभावी तथा अधिगम को अधिकतम बनाना है तो शिक्षक को चाहिये कि वह जिन शब्दों अथवा अशाब्दिक शारीरिक क्रियाओं का उपयोग विद्यार्थियों की पाठ को समझने हेतु जिन भावनाओं एवं क्रियाओं को उद्दीप्त करने हेतु कर रहा है, उनमें यान्त्रिकता या अभ्यस्त शब्दों के अधिकतम प्रयोग से यथासम्भव दूर रहे। उन्हें अपनी आदतन कमजोरी के रूप में विद्यार्थियों के समक्ष न आने दे। प्रसंग एवं परिस्थिति के अनुरूप जहाँ, जो उद्दीपक सर्वाधिक प्रभावी सिद्ध हो उसी का उपयोग करे। इसी का नाम है उद्दीपन परिवर्तन (Stimulus variation)।

यदि विद्यार्थियों की प्रकृति का उनकी आय के अनुरूप अध्ययन किया जाय तो छोटे बच्चों के लिये जब तक उनकी शाब्दिक एवं भाषायी जानकारी बहुत अधिक नहीं होती वहाँ शाब्दिक उद्दीपकों की तुलना में अशाब्दिक उद्दीपक ही अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं। उन्हें प्रेम से पुचकारना, लाड़ जताना आदि भी उद्दीपन का भरपूर काम करते हैं।

सहायक साधन भी विद्यार्थियों की आयु के अनुरूप प्रकृति तथा पढ़ायी जाने वाली विषयवस्तु दोनों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में उद्दीपन का कार्य करते हैं, क्योंकि कहीं किसी पदार्थ अथवा प्राणी का मूर्त रूप प्रभावी सिद्ध होता है तो कहीं उसका प्रतिरूप और कहीं उसका चित्र एवं विषयवस्तु के स्पष्टीकरण से सम्बन्धित तालिकाएँ आदि, इनके द्वारा पाठ को समझने में रुचि उत्पन्न होती और सहायता मिलती है तो रुचि भी एक बहुत प्रभावी उद्दीपक है; क्योंकि दोनों की ही सम्बन्ध अन्ततः मन ही से तो है।

अत: इस दृष्टि से भी शिक्षक को अपनी निजी क्रियाओं के साथ ही साथ ऐसे साधनों का उपयोग करना चाहिये जो उस प्रसंग को समझाने हेतु सर्वाधिक उपयुक्त प्रतीत हो। ऐसा करने से भी स्वत: ही उद्दीपन परिवर्तन भी होगा तथा पाठ की विषयवस्तु भी सरलता से समझ में आ जायेगी। इस दृष्टि से कह सकते हैं कि-

पढ़ायी जाने वाली विषयवस्तु को समझाने हेतु, विद्यार्थियों की मानसिक एकाग्रता तथा बौद्धिक सक्रियता को उद्दीप्त करने की दृष्टि से शिक्षक द्वारा ‘स्व‘ एवं ‘सह‘ दृश्य एवं शृव्य क्रियाओं में प्रसंग एवं परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन करते रहना ही उद्दीपन परिवर्तन है।

3. प्रश्न कौशल (Skill of Questioning)

शिक्षण प्रक्रिया की शुरुआत आदि काल से ही प्रश्न उत्तर के रूप में शुरू हुई थी और आज भी जिज्ञासु छात्र प्रश्न पूछता है तथा शिक्षक उसका उत्तर देता है। शिक्षक छात्र अधिगम की जाँच हेतु अथवा पाठ्यवस्तु के विषय में जिज्ञासा उत्पन्न करने हेतु प्रश्न पूछता है।

प्रश्न पूछना एक आवश्यक शिक्षण कौशल है जिसे शिक्षक को सीखना चाहिये। यूनानी दार्शनिक सुकरात ने भी इस प्रविधि को सफलतापूर्वक अपनाया था। प्रश्नों का संकलन अर्थपूर्ण होना चाहिये। यहाँ पर अर्थपूर्ण प्रश्नों का अर्थ है कि प्रश्नों के पूछने में संरचना, प्रक्रम और उत्पाद तीनों का ध्यान रखा जाना चाहिये।

4. श्यामपट्ट कौशल (Black Board Skill)

श्यामपट्ट शिक्षण शिक्षक का घनिष्ठ मित्र होता है। यह अध्यापक के शिक्षण का अभिन्न अंग होता है। हम किसी ऐसे कक्षा-कक्ष की कल्पना भी नहीं कर सकते जहाँ पर श्यामपट्ट न हो। प्रो. स्टक के अनुसार, “इसे शिक्षक और छात्रों द्वारा प्रयुक्त विद्या समझना चाहिये क्योंकि शिक्षक इसकी सहायता से निर्देशन देता है और छात्र आत्माभिव्यक्ति या व्याख्या करता है।

शिक्षण के उस सहायक/आवश्यक साधन को जिसका उपयोग शिक्षक द्वारा किसी बात को लिखकर समझाने अथवा पठितांश का सार लिखने तथा लिखाने हेतु किया जाता है। उसे श्यामपट्ट/हरापट्ट/व्हाइटबोर्ड आदि नामों से उसके रंग के आधार पर पुकारा जाता है। यह सर्वाधिक प्राचीन, शिक्षण का सहायक ही नहीं; अपितु आवश्यक साधन है। इसके अभाव में शिक्षक का काम चल ही नहीं सकता।

इन्हें लगभग सभी पाठशालाओं में कमरे की दीवारों पर काले रंग से पुते हुए रूप में सरलता से देखा जा सकता है। ये सामान्यत: आयताकार रूप में तथा कमरे की दीवार की लम्बाई-चौड़ाई, जिस पर श्यामपट्ट बनाना है, का ध्यान रखते हुए बनाया जाता है। इनकीलम्बाई-चौड़ाई प्राय: 4’x6′ के आयताकार रूप में होती है। इनके अतिरिक्त चल श्यामपट्ट भी होते हैं, जिन्हें किसी भी स्थिति में समायोजित किया जा सकता है।

कमरे की दीवारों पर श्यामपट्ट बनवाना स्थान तथा व्यय की बचत दोनों ही दृष्टियों से सुविधाजनक होने के कारण बहु प्रचलित हैं। जैसे आजकल शीशे के भी पट्ट आने लगे हैं जो महँगे भले ही हों एक लम्बी अवधि तक स्थायी रूप में काम में आने वाले होते हैं। इनका रंग सामान्यतः हरा, काला या हल्का आसमानी भी हो सकता है। काठ या शीशे के बने हुए श्याम या हरित या आसमानी पट्ट चल (सुबाह्य-Portable) अथवा नियत (Fixed) दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं।

5. पाठ प्रस्तावना कौशल (Skill of Introducing a Lesson)

प्रस्तावना का अर्थ– प्रस्तावना कक्षा में प्रथम कार्य है। पढ़ाने के लिये अध्यापक की प्रस्तावना अच्छी रही तो पाठ की सफलता सुनिश्चित हो जाती है। कहते भी हैं कि यदि कार्य की अच्छी शुरुआत हो जाती है तो आधा काम बन जाता है।

प्रस्तावना (Introduction)

शिक्षण हेतु– पाठ्यांश के वास्तविक शिक्षण से पूर्व उसकी प्रस्तावना करना आवश्यक है। यह प्रस्तावना है क्या? इसे समझने की दृष्टि से आप कल्पना करें कि आपको किसी अपरिचित व्यक्ति से मिलना आवश्यक है और आपने उसे पहले कभी देखा भी नहीं। ऐसी स्थिति में आप एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करते हैं जो आपका नजदीकी होने के साथ-साथ हितैषी भी है। आप इस व्यक्ति को अपने साथ चलने हेतु निवेदन करते हैं।

वह या तो आपके साथ जाकर आपका परिचय उस व्यक्ति से करा देता है और यदि किसी कारण से वह आपके साथ नहीं जा सकता तो आपका परिचय पत्र में लिखकर आपको दे देता है कि उस पत्र को ले जाकर आप उस व्यक्ति से मिल लें।

यहाँ पर आपका परिचित एवं हितैषी व्यक्ति स्वयं मिलकर अथवा पत्र के माध्यम से आपके विषय में उस अपरिचित व्यक्ति को जो कुछ बताता है, वही आपका परिचय या कार्य कराने से पूर्व की प्रस्तावना या भूमिका (Introduction) है। यह भूमिका, परिचित एवं अपरिचित को परस्पर जोड़ने की एक कड़ी है।

शिक्षण में भी ऐसा ही होता है। जो कुछ पढ़ाया जाना है वह विषयवस्तु की दृष्टि से विद्यार्थियों के लिये अज्ञात (Unknown) है। इस अज्ञात अथवा अनसमझी बात को शिक्षक, अपने विद्यार्थियों को स्वतन्त्र रूप से भी बता सकता है और यह भी कर सकता है कि वह इस बात का पता लगाये कि विद्यार्थी क्या जानते हैं और क्या नहीं? जो कुछ विद्यार्थी जानते और समझते हैं उसी के माध्यम से नयी बात, अर्थात् पढ़ायी जाने वाली विषयवस्तु को उसके साथ जोड़ दिया जाय।

ऐसा करने से न केवल समझायी जाने वाली विषयवस्तु सरलता से उनकी समझ में आ जाती है; अपितु उनकी पूर्व जानकारी के साथ इस प्रकार स्थायी रूप से जुड़ जाती है कि विद्यार्थी उसे प्रायः कम ही भूलते हैं। इस प्रकार विद्यार्थियों द्वारा पूर्वार्जित ज्ञान या जानकारी के माध्यम से नवीन या अनजानी जानकारी को जोड़ना ही पाठ की प्रस्तावना (Introduction) कहलाती है।

अधिगम का सम्बन्ध चेतन मन या मस्तिष्क से है, परन्तु विद्यार्थी हों या बड़े उनके अचेतन मन में कुछ न कुछ विचार चलते ही रहते हैं। ऐसी स्थिति में अचेतन मन में चल रहे विचारों को बाहर निकालकर उनके स्थान पर उन विचारों को लाना होता है जो पढ़ायी जाने वाली विषयवस्तु से सम्बन्धित होते हैं।

यह परिवर्तन कहने मात्र से नहीं होता; अपितु विद्यार्थियों को कोई न कोई ऐसी बात कहनी पड़ती है जो देखने या सुनने में अच्छी लगे या रोचक हो अथवा जिस पर विचार करने के पश्चात् ही प्रतिक्रिया व्यक्त की जा सके या यदि वह प्रश्न हो तो उसका उत्तर दिया जा सके।

ऐसा करने से मन या मस्तिष्क में नये तथा पहले से चल रहे विचारों में परस्पर द्वन्द्व होता है। इस द्वन्द्व में जो विचार कमजोर होता है वह निकल जाता है तथा नया विचार शक्तिशाली होने के कारण उसका स्थान ग्रहण कर लेता है।

प्रस्तावना का उद्देश्य भी यही है कि विद्यार्थियों के मन एवं मस्तिष्क में चल रहे विचारों को स्थान पर पढ़ाये जाने वाली विषयवस्तु से सम्बन्धित विचारों को स्थापित किया जाय। इस दृष्टि से पाठ की प्रस्तावना सदैव-

  1. विद्यार्थियों की पूर्व जानकारी चित्र आदि पर आधारित।
  2. सुनने की दृष्टि से रोचक तथा
  3. विचार करने की दृष्टि से विचार प्रधान होनी ही चाहिये।

साथ ही पाठ की प्रस्तावना विद्यार्थियों में जिज्ञासा (Curiosity) उत्पन्न करने वाली होनी चाहिये। यह जिज्ञासा किसी एक प्रकार से नहीं अपितु अनेकों प्रकार से की जा सकती है। प्रस्तावना पूर्व ज्ञान पर भी आधारित हो सकती है तो शिक्षण के विभिन्न साधनों का भी उपयोग किया जा सकता है।

6. छात्र सहभागिता कौशल (Student’s Participation Skill)

छात्र सहभागिता क्या है? छात्र सहभागिता को समझने की दृष्टि से यदि प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक के शैक्षणिक परिदृश्य पर दृष्टि डाली जाय तो सभी जगह एक जैसा ही मिलेगा-पूरे कालांश शिक्षक बोलता ही चला जाता है; छात्र मूक श्रोता के रूप में कभी उसकी बात सुनते हैं तो कभी नहीं भी। कभी झपकियाँ लेते हैं तो कभी नींद निकालने से भी नहीं चूकते।

सभी स्तरों पर प्राय: कुछ अपवादों को छोड़कर, शिक्षक को पढ़ाते समय यही चिन्ता सताती रहती है कि कहीं कोई विद्यार्थी कुछ पूछ न ले? विद्यालयी स्तर पर यदि विद्यार्थी कुछ पूछें तो शिक्षक उन्हें शाब्दिक और अशाब्दिक अथवा आंगिक नकारात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) के द्वारा जिसका उल्लेख पुनर्बलन कौशल के अन्तर्गत किया गया- बिठा देता है, तो उच्च कक्षाओं में विद्यार्थी प्रायः इसलिये शिक्षक से कुछ नहीं पूछते कि उनकी शंकाओं के समाधान में प्राय: वही घिसे-पिटे उत्तर सुनने को मिलते हैं जो उनके द्वारा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में हैं। स्वाध्याय एवं चिन्तन पर आधारित उत्तर प्रायः कम ही मिल पाते हैं। शिक्षा का यह हाल प्राय: सभी स्तरों पर है। यह इकतरफाशिक्षण है और उसका छात्र सहभागिता से कोई सम्बन्ध ही नहीं।

प्रभावी शिक्षण तो वह है जो किसी भी स्तर पर विषयवस्तु को समझाने हेतु शिक्षक कम से कम ऐसा बोले, जो छात्रों की दृष्टि से संतुष्टि प्रदायक हो। यदि छात्र कुछ न पूछें तो शिक्षक अपनी ओर से विषयवस्तु के स्पष्टीकरण हेतु छात्रों से ऐसे प्रश्न पूछे जिनका उत्तर वे दे पायें तो अत्योत्तम और यदि न भी दे पायें तो छात्रों में उस प्रश्न का उत्तर जानने की जिज्ञासा (Curiosity) अवश्य उत्पन्न हो जाय ताकि वे उसी प्रश्न के शिक्षक द्वारा दिये गये उत्तर को ध्यानपूर्वक सुनें; मानसिक एवं बौद्धिक-दोनों ही दृष्टियों से सक्रिय रहें। इसी का नाम छात्र सहभागिता है। अत: कह सकते हैं किअध्ययन अध्यापन संस्थितियों में शिक्षक के साथ-साथ शिक्षार्थियों की मानसिक, बौद्धिक तथा क्रियात्मक सक्रियता ही छात्र सहभागिता है।

शिक्षण कौशल से संबंधित पेज

  1. जीवन कौशल आधारित शिक्षण अधिगम (Life Skill Based Teaching Learning)
  2. विद्यालयी गतिविधियाँ एवं जीवन कौशल विकास (School Activities and Life Skill Development)

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