भग्नाशा या कुण्ठा (Frustration) – परिभाषा, अर्थ और कारण

Bhagnasha or Kuntha

भग्नाशा या कुण्ठा (Frustration)

संसार के समस्त प्राणी दिन-रात क्रियाशील रहते हैं। मनुष्य, बौद्धिकता में श्रेष्ठ होते के कारण अधिक चिन्तनशील क्रियाओं को मानता है। उसकी सहज क्रियाओं को छोड़कर अन्य सभी क्रियाएँ प्रेरकों पर आधारित होती हैं।

प्रेरक व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने में संलग्न हो जाता है। वह जब विभिन्न रुकावटों के कारण लक्ष्य प्राप्ति में असफल रहता है तो उसमें भग्नाशा या कुण्ठा का प्रादुर्भाव होता है।

उदाहरण-

एक छात्र पढ़ने में इसलिये विशेष परिश्रम करता है जिससे वह कक्षा में प्रथम स्थान पा सके। जब परीक्षाफल निकलता है तो वह प्रथम स्थान प्राप्त नहीं करता। इसमें अवरोधक-क्रमबद्ध पढ़ने का अभाव, स्तरानुसार प्रश्नोत्तरों का अभाव, पारिवारिक परेशानियाँ एवं रात्रि को बिजली का अभाव आदि हो सकते हैं। इस प्रकार के छात्रों में भग्नाशा उत्पन्न हो जाती है।

भग्नाशा के अर्थ को समझने के लिये विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों की परिभाषा प्रस्तुत हैं-

गुड के अनुसार

भग्नाशा का अर्थ है – किसी इच्छा या आवश्यकता में अवरोधक आ जाने से उत्पन्न संवेगात्मक तनाव।

कोलसनिक के शब्दों में

भग्नाशा उस आवश्यकता की पूर्ति या लक्ष्य की प्राप्ति में विफल होने या अवरुद्ध होने की भावना है, जिसे व्यक्ति महत्त्व देता है।

इस प्रकार से अस्वाभाविकता से टकराव होने पर मानव चिन्तन होने लगता है और यही चिन्ता उसको असफलता की ओर ले जाती है। अतः असफल होना ही, निराश होना या भग्नाशा की दशा को प्राप्त होना होता है।

Bhagnasha

भग्नाशा के कारण

Causes of frustration

विद्वानों ने भग्नाशा उत्पन्न होने के विभिन्न कारण दिये हैं। इनमें से प्रमुख कारण ‘गेट्स’ एवं अन्य के अनुसार निम्न हैं-

1. भौतिक कारण (Physical causes)

व्यक्ति का विकास वंशानुक्रम और पर्यावरण के सहयोग से होता है। पर्यावरण में पाये जाने वाले भौतिक तत्त्व व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति में सहायक भी होते हैं और अकाल, बाद, भूचाल, युद्ध, महामारी आदि व्यक्ति की आवश्यकता एवं लक्ष्य पूर्ति में बाधक सिद्ध होते हैं। इस प्रकार से उसकी उन्नति अवरुद्ध हो जाती है और वह निराश एवं असन्तुष्ट प्राणी बन जाता है।

2. सामाजिक तत्त्व (Social factors)

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में रहकर अपना विकास एवं आवश्यकता की प्राप्ति विभिन्न प्रेरकों के माध्यमों से करता है। उसका समाजीकरण उस समाज के नियमों, मान्यताओं, आदर्शों और परम्पराओं की छाया में किया जाता है।

वह सामाजिक सम्मान एवं विकास के विभिन्न साधन तभी प्राप्त कर पाता है, जब वह समाज के द्वारा बताये गये पथ का अनुगमन करने लगता है। लेकिन वर्तमान समय में एक राष्ट्र अनेक जातियों, धर्मों और संस्कृतियों को संगठन होता है।

अत: जब एक ही देश में रहने वाली विभिन्न जातियों को समान अधिकार प्राप्त नहीं होता तो उनमें भग्नाशा के भाव उत्पन्न हो जाते हैं; जैसे– शूद्र, यहूदी और नीग्रो जाति के लोग समाज में सभी अधिकार अभी तक प्राप्त नहीं कर सके हैं।

3. व्यक्तिगत कमियाँ (Personal defects)

संसार में कोई भी दो व्यक्ति एक समान नहीं होते-चाहे वे जुड़वा ही क्यों न हों ? व्यक्ति शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक आदि आधारों पर अन्य व्यक्तियों से भिन्न होता है। जो व्यक्ति “लंगड़े, बहरे, अन्धे, दुबले-पतले, अत्यधिक मोटे, मन्द बुद्धि वाले, आत्म-विश्वास की कमी वाले, भयभीत होने वाले, स्वभाव की अस्थिरता वाले” आदि होते हैं वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते। इस प्रकार से वे अपनी असफलता का मुख्य कारण व्यक्तिगत कमियों को मान लेते हैं।

4. आर्थिक कारण (Financial causes)

आज के युग में सबसे अधिक मान सम्मान धन का है। जब व्यक्ति धन की कमी के कारण अपनी आवश्यकताओं, लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर पाता तो वह हतोत्साहित होकर मानसिक संघर्षों में उलझ जाता है। ये मानसिक संघर्ष जब तक उसके मस्तिष्क में विचरण करते रहते हैं तब तक वह निराशा का शिकार बना रहता है।

5. विरोधी इच्छाएँ (Negative desires)

संसार का महान् से महान् व्यक्ति अपनी इच्छाओं का शिकार हुआ है। जब व्यक्ति एक ही समय में विरोधी आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता है तो उसमें से किसी एक को त्यागना पड़ता है। इससे उसमें भग्नाशा उत्पन्न हो जाती है; जैसे– कोई व्यक्ति शादी के लिये सुन्दर और सुशील लड़की भी चाहता है और अच्छा दहेज भी। अत: एक चीज को छोड़ना पड़ता है तब उसमें निराशा के भाव उत्पन्न हो जाते हैं।

6. व्यक्ति की नैतिकता (Man’s morality)

प्रत्येक समाज अपने नागरिकों को नैतिकता की शिक्षा देता है। यह नैतिकता कभी-कभी समाज या समुदाय के दायरे से निकलकर मानवीय सम्बन्धों पर आधारित हो जाती है। मुख्य रूप से चोरी न करना, झूठ न बोलना, स्वाध्याय करना, नियमों एवं कानूनों को मानना, अहिंसा का पालन करना और दूसरों की सहायता करना आदि नैतिक आदर्शों की शिक्षा प्रत्येक नागरिक को दी जाती है।

इन आदर्शों में बँधकर जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाता तो उसमें निराशा के भाव उत्पन्न होते हैं। उदाहरणार्थ- एक छात्र कक्षा में पास होने के लिये नकल करना चाहता है, लेकिन नैतिकता का बन्धन उसे ऐसा करने से रोकता है और वह निराश हो जाता है।

7. वर्तमान परिस्थितियाँ एवं दशाएँ (Present conditions and situations)

व्यक्ति के विकास में वर्तमान परिस्थितियाँ एवं दशाएँ भी सहायक होती हैं। इन्हीं को हम साधन भी कहते हैं। जब किसी व्यक्ति के उद्देश्य प्राप्ति में वर्तमान साधनों की कमी पायी जाती है तो वह अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाता और भग्नाशा का शिकार हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर, एक छात्र कक्षा में प्रथम आना चाहता है लेकिन उसके पास अच्छी पस्तकें नहीं हैं। अत: वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता और निराश हो जाता है।

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