स्वदेश प्रेम – स्वदेश प्रेम की भावना एवं राष्ट्रीयता, निबंध

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‘स्वदेश प्रेम’ से मिलते जुलते शीर्षक इस प्रकार हैं-

  • देश-प्रेम की भावना
  • स्वदेश प्रेम एवं राष्ट्रीयता
  • करो देश पर प्राण निछावर
  • जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
  • स्वदेशानुराग
SWADESH PREM

निबंध की रूपरेखा

  1. प्रस्तावना
  2. स्वदेश प्रेम का अभिप्राय
  3. देश-प्रेम का क्षेत्र
  4. देश के प्रति कर्तव्य
  5. देश-प्रेम का आदर्श
  6. देशभक्तों की कामना
  7. देशप्रेम की स्वाभाविक भावना
  8. उपसंहार

स्वदेश प्रेम – स्वदेश प्रेम की भावना एवं राष्ट्रीयता

प्रस्तावना

जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रासधार नहीं।
वह ह्रदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश प्रेम का प्यार नहीं॥

उक्त पंक्तियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि प्रत्येक सह्रदय व्यक्ति में स्वदेश व्यक्ति में देश प्रेम की भावना होती है। जिस ह्रदय में अपने देश के प्रति अनुराग नहीं है, वह भावना शून्य, संवेदनाविहीन अर्थात पत्थर के समान है। जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बड़कर माना गया है – ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’

स्वदेश प्रेम का अभिप्राय

देश-प्रेम का तात्पर्य यह है कि जिस देश में हमने जन्म लिया है, उसके प्रति अपने कर्तव्य का पालन करें। हमारे हृदय में देश के लिए त्याग एवं बलिदान की भावना होनी चाहिए। सच्चा देश प्रेमी, इन्हीं भावनाओं से भरा होता है। देश से वह कोई अपेक्षा नहीं रखता, किन्तु आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए अपना तन-मन-धन सब कुछ समर्पित करने के लिए तत्पर रहता है।
कविवर गोपाल शरण सिंह के शब्दों में-

सच्चा प्रेम वही है जिसकी तृप्ति आत्मबल पर हो निर्भर।
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है करो प्रेम पर प्राण न्योछावर।।

देश-प्रेम का क्षेत्र

देश-प्रेम का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार राष्ट्र के तीन तत्व है- भूमि, जन और संस्कृति। हमें इन तीनों से प्रेम होना चाहिए, तभी हम सच्चे देश प्रेमी हैं। जिसे अपने देश का भौगोलिक ज्ञान नहीं, जो यहां की भूमि, पर्वत, नदियों से परिचित नहीं, वह देश प्रेमी नहीं हो सकता।

प्रेम के लिए परिचय आवश्यक है। जब तक हम अपने देश से परिचित नहीं, तब तक देश के प्रति प्रम कोरा ढोंग है। इसी प्रकार अपने देश की जनता से जब तक आत्मीय सम्बन्ध हम नहीं बनाते, उनके प्रति सद्भाव विकसित नहीं करते, उन्हें अपना बांधव नहीं मानते तब तक हमारा देश-प्रेम कोरा दिखावा है।

गांधीजी सच्चे देश प्रेमी थे। वे भारत के जननायक थे। जनता उन्हें अपना नेता मानती थी और वे जनता को अपना आत्मीय समझते थे। इसी प्रकार हमें अपने देश की संस्कृति, अपनी भाषा, अपनी बोली पर गर्व होना चाहिए।

अंग्रेजी मानसिकता वाले वे लोग जो भारत, भारतीय एवं हिन्दी को घृणा की दृष्टि से देखते हैं, वे देश-प्रेम से अछूते हैं। इसीलिए कवि ने कहा है-

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं नर पशु निरा है और म्रतक समान है।

देश के प्रति कर्तव्य

जिस देश में हम उत्पन्न हुए, पले-बढ़े और जीवनयापन किया उसके प्रति हमारा कर्तव्य बनता है। देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले सैनिक जो सीमा की सुरक्षा करते हैं, केवल
वे ही देशभक्त नहीं हैं अपितु कक्षा में मनोयोग से पढ़ाने वाला वह अध्यापक भी उतना ही देशभक्त है जो भावी पीढ़ी को सद्विचार एवं सद्गुण प्रदान कर रहा है।

व्यापारी मुनाफाखोरी न करके, कालाबाजारी न करके, आयकर एवं बिक्रीकर का सही भुगतान करके देश-प्रेम का परिचय दे सकते हैं। हममें से कितने व्यक्ति ‘टैक्स’ का सही भुगतान करते हैं? सरकार से तो हम अनेक अपेक्षाएँ रखते हैं किन्तु स्वयं देश के लिए क्या करते है? वकील, डॉक्टर, व्यापारी, अध्यापक, इंजीनियर, उद्योगपति यदि सब सही ढंग से अपने ‘करों’ का
भुगतान करें तो देश की गरीबी दूर हो जाएगी।

राजनेता अपना घर भरने में लगे हुए हैं, वोट की खातिर धार्मिक एवं साम्प्रदायिक उन्माद फैलाते हैं, जातिवाद की राजनीति कर रहे हैं और देश के कर्णधार बने हए हैं- ऐसे लोगों से देश हित की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ये सत्ता लोलुप राजनीतिज्ञ देश को जोंक की तरह चूस रहे हैं, अतः इनसे ‘स्वदेश प्रेम’ की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

देश-प्रेम का आदर्श

भारतर्ष में अनेक महापुरुष हुए हैं जिन्होंने हमारे समक्ष देश-प्रेम का आदर्श उपस्थित किया और देश की पताका का सम्मान सुरक्षित रखा। वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, चछत्रसाल बुंदेला, रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, चन्द्रशेखर, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जैसे देशभक्त हमारे आदर्श हैं।

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, तिलक, गोखले, लाला लाजपत राय, सरदार पटेल, इन्दिरा गांधी ने जो रास्ता दिखाया उस पर चलकर ही हम सच्चे देशभक्त बन सकते हैं।
लोकमान्य तिलक ने नारा दिया-

‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’

सुभाषचंद्र बोष ने कहा-

‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादा दूगा।’

देशभक्तों की कामना

देशभक्तों की कामना होती है अपने देश पर प्राण न्याछावर करने की वे देश के लिए जीते है और देश के लिए मर मिटते हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन में देश-प्रेम की प्रेरणा देने वाले कवि
माखन लाल चतुर्वेदी को निम्न पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं, जिनमें एक पृष्प यह अभिलाषा करता है-

मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जाते वीर अनेक।।

देश-प्रम : एक स्वाभाविक भावना

देश-प्रेम की भावना व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से निहित रहती है किन्तु कभी-कभी स्वार्थ, लोभ, लालच आदि के कारण व्यक्ति अपने देश से गद्दारी भी कर जाता है। यह प्रवृत्ति घृणित एवं त्याज्य है। प्रत्येक व्यक्ति अपने देश के प्रति अनुराग रखता है, भले ही वहां की स्थितियां प्रतिकूल ही क्यों ना हों। कहा गया है-

विषुवत रेखा का वासी जो जीता है नित हाँफ-हाँफ कर।
रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर।

सच्चे देशभक्त का बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता। देश पर मर मिटने वाले अमर हो जाते हैं, उनकी चिताओं पर प्रतिवर्ष मेले लगते हैं-

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।

उपसंहार

हमें इन देशभक्तों से प्रेरणा लेकर देश के प्रति त्याग एवं वलिदान का पाठ पढ़ाना है, तभी हम देश के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर सकेंगे। देश प्रेम में दिखावे की जरूरत नहीं है, अपितु इस भाव को हृदय में धारण करने की आवश्यकता है। सच्चा देश-प्रेमी अपने सुख-समृद्धि की नहीं अपितु देश की सुख-समृद्धि की कामना करता है।

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