मन की शक्ति – मन के हारे हार है मन के जीते जीत

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  • मन की शक्ति
  • नर हो न निराश को
  • मानसिक दृढ़ता का महत्व
  • इच्छा शक्ति के चमत्कार
  • साहस जहाँ सिद्धि तहँ होई
  • मन ही सफलता की कुंजी है
MAN KI SHAKTI - MAN KE HARE HAR HAI MAN KE JEETE JEET

निबंध की रूपरेखा

  1. प्रस्तावना
  2. सूक्ति का अर्थ
  3. मन की शक्ति
  4. उत्साह : सफलता की कुंजी
  5. उपसंहार

मन के हारे हार है मन के जीते जीत- मन की शक्ति

प्रस्तावना

मानव को परमात्मा ने जो अनेक विभूतियाँ प्रदान की हैं, उनमें से एक है मन की शक्ति। इसे इच्छा शक्ति, संकल्प शक्ति, मानसिक शक्ति, आदि अनेक नाम दिए गए हैं। अंग्रेजी में इसे ‘Will Power’ कहा गया है। मन की इस शक्ति का गुणगान सर्वत्र मिलता है। संस्कृत की एक उक्ति है:

“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः”

अर्थात् मन ही मनुष्य के बन्धन या मोक्ष का कारण होता है।

सूक्ति का अर्थ

इस सूक्ति में कवि ने यह विचार व्यक्त किया है कि हमें किसी भी स्थिति में मन को पराजित नहीं होने देना चाहिए। भले ही पराजय मिले, किन्तु मन निराशा एवं पराजय का अनुभव न करे अपितु दुगने उत्साह से फल प्राप्ति की ओर उन्मुख हो जाए तो व्यक्ति को अवश्य ही सफलता मिलती है। हार और जीत ‘मन’ पर निर्भर हैं। यदि मन हताश है तो हम पराजित होते हैं और यदि मन निराश नहीं होता तो सफलता हमारे कदम चूमती है, यही इस उक्ति का सार है। यह उक्ति अपने पूर्ण रूप में इस प्रकार से है :

दुख सुख सब कहँ परत है पौरुष तजहु न मीत।
मन के हारे हार है मन के जीते जीत।।

अर्थात् हे मित्र! संसार में दुःख-सुख तो सब को झेलना पड़ता है अतः तुम्हें पौरुष नहीं त्यागना चाहिए। मन के हारने (हताश होने) पर हार होती है और मन के जीतने (हताश न होने) पर जीत होती है।

मन की शक्ति

मन की संकल्प शक्ति के बल पर सब कुछ किया जा सकता है। हारता वही है जिसका मनोबल टूट गया है। श्रीकृष्ण ने पाण्डवों का साथ देकर उनके मनोबल को बढ़ा दिया था इसीलिए वे कौरवों की विशाल सेना को पराजित कर पाने में सफल हुए।

सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान को वापस ले लिया तो नचिकेता ने मृत्यु के रहस्य को जान लिया। शिवाजी ने थोड़ी सी सेना के सहारे औरंगजेब की विशाल सेना के दांत खट्टे कर दिए।

आधुनिक युग में गाँधीजी जैसे दुबले-पतले व्यक्ति ने अपने मनोबल से ही अंग्रेजों को परास्त कर दिया, परिणामतः वे भारत को स्वतन्त्रता देकर अपने देश लौट गए। ये सब उदाहरण मन की
शक्ति के परिचायक हैं।

मन की गति को पवन से भी अधिक माना गया है। इस पर जिसने नियन्त्रण कर लिया वह सम्पूर्ण जगत को अपने वश में कर लेता है। कहा गया है :

मनो यस्य वशे तस्य भवेत् सर्व जगत् वशे।
मनसस्तु वशे योऽस्ति स सर्वजगतो वशे॥

अर्थात् “जिसने मन को अपने वश में कर लिया, उसने सारे जगत को अपने वश में कर लिया, किन्तु जो मनुष्य मन के वश में है, वह मानो सारे जगत के अधीन है।”

गीता में कहा गया है कि शरीर पर इन्द्रियों का नियन्त्रण होता है, इन्द्रियों पर मन का और मन पर बुद्धि का नियन्त्रण रहता है। बुद्धि को नियन्त्रित करता है परमात्मा।

चंचल मन को योग के द्वारा अपने वशीभूत किया जाता है। चित्तवृत्तियाँ चलायमान होती हैं, उन्हें योग के द्वारा नियन्त्रण में लाकर व्यक्ति मन को एकाग्र कर सकता है। पातंजल योगसूत्र में कहा गया है :

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”

कबीर ने इसे अत्यन्त सरल भाषा में इस प्रकार व्यक्त किया है :

मैमंता मन मारि रे, घट ही माहें घेर।
जबहीं चालै पीठि दै, अंकुश दै दै फेर॥

अर्थात् “मदमस्त मन को मारकर शरीर में ही घेरकर रखना चाहिए। जब यह पीठ देकर चले तब इसे अंकुश लगाकर नियन्त्रण में रखो।”

उत्साह : सफलता की कुंजी

जीवन में सफलता उसी को मिलती है जो पराजय से घबराता नहीं और दुगने उत्साह से लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। कामायनी में प्रसाद जी कहते हैं :

पराजय का बढ़ता व्यापार
हँसाता रहे उसे सविलास।

जीवन में मिलने वाली पराजय भी उसे निरन्तर हँसाती रहे तथा वह अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर रहे, तभी ‘मानव’ विजय प्राप्त कर सकेगा। एक बार पराजित होने पर जो हार कर बैठ जाते हैं वे कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। व्यक्ति को आशा एवं उत्साह बनाए रखना चाहिए, क्योंकि आशा और उत्साह ही सफलता की कुंजी है। आशा में कितनी सुधा है, उत्साह में कितना सम्बल है? जीवन में दुःख-सुख का चक्र तो चलता ही रहता है, इसलिए व्यक्ति को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। कवि के इन शब्दों में कितना उत्साह है :

सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो।
तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं।

महापुरुषों ने जो सफलता पाई है वह साधनों से नहीं अपित आत्मबल से प्राप्त की है। काबुल विजय के लिए जाते समय महाराजा जयसिंह को ‘अटक’ नदी ने रोकना चाहा। सेनापति ने कहा कि महाराज अटक अटक रहा है तो जयसिंह बोले :

सबै भूमि गोपाल की यामैं अटक कहाँ।
जाके मन में अटक है सोई अटक रहा।

और यह कहते हुए उन्होंने अपना घोडा उफनती नदी में डाल दिया तथा उनके पीछे-पीछे सारी सेना पार उतर गई।

उपसंहार

महापुरुषों ने, शास्त्रों ने, वेदों ने और पुराणों ने इसी तथ्य पर प्रकाश डाला है कि शरीर की शक्ति से मन की शक्ति बड़ी होती है। व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं माननी चाहिए तथा दृढ़ इच्छा, शक्ति के बल पर निरन्तर अपना लक्ष्य पाने के लिए संघर्षरत रहते हुए प्रयासरत रहना चाहिए। जीवन एक अविरत संग्राम है जिसमे मन को कभी हार नहीं माननी चाहिए। गीता में स्थितप्रज्ञ का लक्षण बताते हुए कहा गया है-

“सुख दुःख समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ॥”

जो व्यक्ति सुख-दुःख में, लाभ-हानि में और जय-पराजय में समान व्यवहार करते हैं वे ही स्थितप्रज्ञ है। ऐसा वही कर सकता है जिसमें मन की शक्ति हो, जिसका मन कभी पराजित न हो। जीवन में सफलता पाने का मूल मन्त्र यही है- इसे हमें याद रखना है।

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