वर दे, वीणावादिनी वर दे – Var de veena vadini var de – प्रार्थना/कविता/गीत/सरस्वती वंदना

वीणा वादिनी वर दे‘ नामक प्रसिद्ध कविता सूर्य कान्त त्रिपाठी निराला जी द्वारा लिखित है। भारत के कई हिन्दी भाषी स्कूलों में इसे प्रार्थना के रूप में स्वीकार किया गया है।

Var de veena vadini var de - Sanskrit praarthana
प्रार्थना/कविता/गीत/सरस्वती वंदना: वर दे, वीणावादिनी वर दे! प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे! वर दे, वीणावादिनी वर दे।

वर दे, वीणावादिनी वर : संस्कृत प्रार्थना

वर दे, वीणावादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!
वर दे, वीणावादिनी वर दे।

काट अंध्-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!
वर दे, वीणावादिनी वर दे।

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मंद रव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे!

वर दे, वीणावादिनी वर दे।

इन्हें भी देखें: हे प्रभो आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए, हे शारदे माँ, हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी, ऐ मालिक तेरे बंदे हम


Praarthana/Var de, veena vadini var de/Sanskrit praarthana

var de, veenaavaadinee var de!
priy svatantr-rav amrt-mantr nav
bhaarat mein bhar de!
var de, veenaavaadinee var de.

kaat andh-ur ke bandhan-star
baha janani, jyotirmay nirjhar
kulush-bhed-tam har prakaash bhar
jagamag jag kar de!
var de, veenaavaadinee var de.

nav gati, nav lay, taal-chhand nav
naval kanth, nav jalad-mandir raav;
nav nabh ke nav vihag-vrnd ko
nav par, nav svar de!

var de, veenaavaadinee var de.

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