शिक्षण की प्रकृति – Nature of Teaching

Shikshan Ki Prakriti

शिक्षण की प्रकृति (Nature of Teaching)

शिक्षण की अवधारणा तथा अर्थ के सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा गया, उसे ध्यान में रखते हुए शिक्षण की प्रकृति (Nature) के सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि:-

1. शिक्षण एक कला (An Art) है तो विज्ञान (Science) भी

यह बात सुनने में थोड़ी अटपटी अवश्य लगती है कि जो कला (Art) है वह विज्ञान (Science) अथवा जो है विज्ञान वह कला कैसे हो सकते हैं? यह बात अटपटी भले ही लगे किन्तु सत्य है। कैसे? इसी को आगे स्पष्ट किया जा रहा है-

कला (Art) में स्थिरता कम तथा परिवर्तनशीलता अधिक होती है। समय के परिवर्तन के साथ-साथ कलाओं के रूप में भी परिवर्तन होता रहता है। इतिहास इस बात का साक्षी है। यदि कला की दृष्टि से शिक्षण पर विचार किया जाये तो हम देखेंगे कि हमारे देखते-देखते ही शिक्षण के क्षेत्र में अब तक कितने परिवर्तन आ गये हैं और आते ही चले जा रहे हैं अब उन बातों को समझना सरल हो गया है जिनकी सीमा केवल कल्पनाओं तक ही सीमित थी। अतः इन परिवर्तनों के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षण एक कला है।

शिक्षण को यदि विज्ञान (Science) की कसौटी पर कसा जाये तो विज्ञान उसी विषय या बात को कहा जाता है, जिसका आधार तर्कसंगत हो तथा नियमों में शाश्वतता। इस दृष्टि से शिक्षण के अपने कुछ सूत्र (Maxims) तथा नियम (Laws) होते हैं, शिक्षण के उन नियमों; यथा – विषयवस्तु की अर्जित जानकारी से सम्बद्धता (Laws of association), अर्जित ज्ञान का अभ्यास (Law of exercise) आदि पहले भी शिक्षण की दृष्टि से टतने ही उपयोगी सिद्ध होते थे जितने आज तथा आगे भी होते रहेंगे।

इस प्रकार शिक्षण के नियमों आदि की अनुपालना एवं अनुसरण के आधार पर शिक्षण को विज्ञान (Science) मानना सर्वथा उचित ही है।

वैसे भी शिक्षण का सम्बन्ध निर्जीवों से न होकर सजीव विद्यार्थियों से होता है, जिनकी बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताएँ, आयु तथा परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग होती हैं।

इस प्रकार सफल शिक्षण वही है जिसमें शिक्षक कक्षा की परिवर्तनशील परिस्थितियों में किसी न किसी प्रकार सम्बन्धित विषयवस्तु को अपने विद्यार्थियों को आत्मसात् कराने में सफल हो जाये। अतः कहा जा सकता है कि ‘शिक्षण’ कला है तो विज्ञान भी

2. शिक्षण शिक्षक एवं शिक्षार्थी के बीच की कड़ी है

शिक्षण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए यही निष्कर्ष निकाला गया कि शिक्षण शिक्षार्थी तथा शिक्षक के मध्य होने वाली अन्तःक्रिया है। अन्त:क्रिया सदैव दो व्यक्तियों (प्रमुखतः) अथवा दो व्यक्ति समूहों (अपवाद स्वरूप) के मध्य ही होती है। कक्षा में शिक्षक तथा शिक्षार्थी या शिक्षार्थियों के मध्य ही यह अन्त:क्रिया होती है।

शिक्षक विषयवस्तु को समझाने हेतु यदि कोई चित्र दिखाता है अथवा उदाहरण देता है अथवा कुछ कहता है तो विद्यार्थी उसे ध्यानपूर्वक सुनते हैं। यदि किसी कारण से कोई बात उनकी समझ में नहीं आती तो वे उसे शिक्षक से पूछ सकते हैं।

विषयवस्तु सम्बन्धी अपनी शंकाओं का समाधान पूछने का उनका अधिकार है तो उन शंकाओं का समाधान करना शिक्षक का कर्तव्य है। शिक्षक द्वारा अपने कर्त्तव्य का पूरी तरह निर्वाह ही सफलतम शिक्षण है तो सफलतम शिक्षण का सम्बन्ध है अधिकतम अधिगम से।

शिक्षण पहले है, अधिगम बाद में। अत: कह सकते हैं कि शिक्षण शिक्षक तथा शिक्षार्थी के पारस्परिक सम्बन्धों के बीच की एक कड़ी है। प्रभावी शिक्षण ही इन सम्बन्धों की सुदृढ़ कड़ी है।

3. अध्यवसाय (Perseverance) अभाव में प्रभावी शिक्षण सम्भव नहीं

किसी भी काम को दृढ़ता तथा उत्साह के साथ करना ही अध्यवसाय (Perseverance) कहलाता है। बिना परिश्रम के किसी भी कार्य का भलीभाँति सम्पन्न होना सम्भव ही नहीं। कार्य सम्पन्नता की दृष्टि से न केवल साहस ही पर्याप्त है अपितु पूर्व तैयारी भी आवश्यक है।

इस दृष्टि से चूँकि शिक्षण भी एक कार्य है। अत: इसे कुशलता एवं सफलतापूर्वक सम्पन्न करने की दृष्टि से शिक्षण की पूर्व तैयारी आवश्यक है। शिक्षण की पूर्व तैयारी की दृष्टि से अध्यवसाय आवश्यक है तो अध्यवसाय की दृष्टि से स्वाध्याय। स्वय अध्ययन करने को ही स्वाध्याय कहते हैं।

स्वाध्याय न केवल विद्यार्थियों के लिये ही आवश्यक है अपितु शिक्षकों के लिये भी आवश्यक है ताकि वे कक्षा में विद्यार्थियों को विषयवस्तु के कठिन अंशों को स्वयं भलीभाँति समझ सकें।

स्पष्ट है कि शिक्षण अध्यवसाय के साथ-साथ स्वाध्याय भी चाहता है। स्वाध्याय के अभाव में प्रभावी शिक्षण सम्भव ही नहीं।

4. शिक्षण शिक्षक का स्वमूल्यांकन है

शास्त्रों में कहा गया है कि हर मनुष्य को सोते समय अपनी दिनभर की क्रियाओं एवं कार्यों का विश्लेषण करना चाहिये कि उसने दिनभर में जो-जो भी कार्य किये वे कितने परहितकारी थे तो कितने पर पीड़ाकारी? उसने कौन-से ऐसे कार्य किये जो उसे नहीं करने चाहिये थे और कौन-से कार्य ऐसे किये जिन्हें करके उसे सच्चा आनन्द मिला? ऐसा विश्लेषण सभी को अपने द्वारा किये गये कार्यों को करने के बाद करना ही चाहिये।

शिक्षक का कार्य है शिक्षण और उसे पढ़ाने के पश्चात् इस बात का विश्लेषण करना ही चाहिये कि उसे पढ़ाने में कितना आनन्द आया और कितना नहीं? कितनी सफलता मिली और कितनी नहीं? यदि आनन्द आया तो उसके क्या कारण रहे? यदि सफलता मिली या नहीं मिली तो उसके क्या कारण रहे? इस आधार पर शिक्षक अपने शिक्षण का स्वमूल्यांकन (Self evaluation) कर सकता है।

5. शिक्षण, विद्यार्थी-व्यवहार में वांछित मोड़ का कर्ता है

विद्यार्थियों के व्यवहार में वांछित मोड़ तब तक नहीं आता जब तक कि उनकी भावनाओं में एक सकारात्मक मोड़ न आये। पहले उनकी भावनाओं को वांछित मोड़ दिया जाये तो उनका व्यवहार स्वतः ही सकारात्मक रूप में परिवर्तित हो जायेगा, परन्तु भावनाओं का परिवर्तन इतना सरल नहीं है, जितना कि सामान्यतया सोचा जाता है।

अबोध बालकों का व्यवहार प्रायः अनुकरण प्रधान होता है। अत: वे जैसा घर, परिवार तथा समाज में देखते हैं, वैसा ही करने लग जाते हैं। अच्छी या बुरी संगति का प्रभाव विद्यार्थियों के व्यवहार पर पड़ता ही है। अत: उनके व्यवहार परिवर्तन के लिये उन्हें वैसे ही वातावरण में रखना आवश्यक है जैसे व्यवहार की हम उनसे अपेक्षा करते हैं।

जहाँ तक बड़ों के व्यवहार परिवर्तन की बात है, वे भी किसी के कहने से अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं लाते, अपितु वे जिस बात की भी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करते हैं, पहले उसको समझने का प्रयास करते हैं कि उनके हित में क्या है? जो उनकी अपनी दृष्टि से हितकर हो, उसी व्यवहार को वे अपना लेते हैं भले ही वह व्यवहार दूसरों के लिये अहितकर ही क्यों न हो।

इस दृष्टि से ऐसे गुरु की आवश्यकता होती है जो न केवल अच्छे और बुरे की व्याख्या कर सके अपितु साहित्य और इतिहास के आधार पर ऐसे उदाहरण भी उनके समक्ष प्रस्तुत कर सके कि जिस व्यवहार को वे उचित समझ रहे हैं उसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं तथा जिन-जिन लोगों ने व्यवहार के उस रूप को अपनाया उसका परिणाम क्या हुआ? वर्तमान से भी उदाहरण दिये जायें और यह काम है शिक्षक तथा उसके द्वारा शिक्षण का।

अतः कहा जा सकता है कि जब तक शिक्षण द्वारा जानकारी को समझाकर आत्मसात् नहीं कराया जायेगा, तब तक व्यवहार परिवर्तन सम्भव नहीं।

6. शिक्षण-प्रभाविता की कसौटी – अधिकतम अधिगम

शिक्षक बहुत हैं। शिक्षार्थी यदि करोड़ों की संख्या में हैं तो शिक्षक भी लाखों से कम नहीं, परन्तु प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर यहाँ तक के विश्वविद्यालय स्तर के उन सभी शिक्षकों के विषय में उनके व्यवहार आदि सभी दृष्टियों, विशेषकर शिक्षण की दृष्टि से सभी विद्यार्थियों से निष्पक्ष दृष्टि से उनके शिक्षण तथा पठित अंश को उनके द्वारा भलीभाँति समझाने की दृष्टि से पूछा जाये तो सम्भवतः ऐसे शिक्षकों का प्रतिशत बहुत अधिक नहीं मिलेगा।

इसका स्पष्ट आशय यह है कि कुशल शिक्षक उतने ही प्रतिशत हैं जितने प्रतिशत विद्यार्थी उन्हें शिक्षण की दृष्टि से सराहते हैं। जीवन भर एक आदर्श शिक्षक के रूप में याद रखते हैं। साथ ही उनके शिक्षण की भी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। यही नहीं, इससे भी अधिक उनके द्वारा पढ़ाये गये अधिकतर विद्यार्थी बहुत अच्छे अंकों से परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते हैं। अत: कहा जा सकता है कि प्रभावी शिक्षण की पहचान प्रभावी अधिगम है।

7. सही शिक्षण के अभाव में अवबोध सम्भव नहीं

किसी बात को जानना एक बात है और उसे समझना एक बिल्कुल अलग बात। माना कि किसी भी बात की जानकारी आवश्यक है, परन्तु उस बात को गहराई से समझना, जानकारी की तुलना में कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।

भारतीय चिन्तन के अनुसार ज्ञान वही है जिसे समझकर आत्मसात् कर लिया जाये और यह तभी सम्भव है जब शिक्षक को भी दी जाने वाली जानकारी की समझ (Understanding) हो।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि यदि पाठ्यवस्तु के कुछ अंश ऐसे हैं जो शिक्षक को भी स्पष्ट नहीं हैं तो पहले वह उस विषयवस्तु को स्वयं समझे तत्पश्चात् अपने विद्यार्थियों को समझाये।

8. शिक्षण मनोविज्ञान का व्यावहारिक पक्ष है तो अधिगम व्यवहार परिवर्तन

प्रत्येक कार्य के दो पक्ष होते हैं – सैद्धान्तिक तथा क्रियात्मक। क्रियात्मक पक्ष को ही व्यावहारिक (Practical) अथवा अभ्यासीय पक्ष भी कहा जा सकता है। अमीर खुसरो की एक पहेली है – घोड़ा अड़ा क्यों? पान सड़ा क्यों? रोटी जली क्यों? विद्या भूली क्यों? चारों प्रश्नों का एक ही उत्तर है – “फेरा न था“। उत्तर स्पष्ट है व्याख्या की आवश्यकता नहीं।

फिर भी विद्या के सम्बन्ध में इसकी व्याख्या की जाये तो केवल पढ़ने-लिखने को व्याख्या मान लेना ठीक नहीं। विद्याएँ बहुत हैं। विद्या-प्राप्ति के क्षेत्र भी अनेक हैं। ज्योतिर्विद के लिये ‘ज्योतिष-विद्या’ है तो खगोलशास्त्री के लिये ‘खगोल-विद्या’, तान्त्रिक के लिये ‘तन्त्र-विद्या’ है तो मन्त्र सीखने वालों के लिये ‘मन्त्र-विद्या’।

इसी प्रकार शिक्षक के लिये शिक्षण के सिद्धान्तों एवं सूत्रों को पहले जानना फिर समझना तथा अन्त में उसका अभ्यास करना विद्या है तो चिकित्सक के लिये चिकित्साशास्त्र की सैद्धान्तिक जानकारी के साथ-साथ उसका अभ्यास भी। विद्या कोई भी हो, उसे व्यवहार में बदलने, स्मरण रखने तथा उस क्षेत्र में पारंगत (कुशल) बनने की दृष्टि से अभ्यास आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। यदि उसका बार-बार अभ्यास नहीं किया जायेगा तो अर्जित ज्ञान भी विस्मृत हो जाता है।

अत: विद्या में कुशल एवं पारंगत बनने तथा ज्ञान को चिरस्थायी बनाने हेतु अभ्यास आवश्यक है। चूंकि शिक्षण का अभ्यास मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार के अस्तित्व वाले विद्यार्थियों के साथ करना है। इसलिये शिक्षक के लिये मनोविज्ञान को जानना और कक्षा में उन सिद्धान्तों का उपयोग एवं अभ्यास करना आवश्यक है तो विद्यार्थियों की दृष्टि से उनके द्वारा विषयवस्तु के सारतत्त्व को समझना एवं तद्नुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन करना।

9. शिक्षक एवं शिक्षार्थी-दोनों के लिये पाठशाला एक प्रयोगशाला है

अभी ऊपर जिन विद्याओं की बात की गयी, उन सभी में कुशलता की दृष्टि से अभ्यास तो आवश्यक है ही, किन्तु यह अभ्यास कहीं निर्जीव उपकरणों के आधार पर किया जाता है तो कहीं सजीव प्राणियों पर तथा कहीं दोनों पर। चित्र बनाना, वादन आदि कलाओं का अभ्यास निर्जीवों के साथ किया जाता है तो शिक्षण का अभ्यास सजीव विद्यार्थियों के साथ।

पाठशाला भी एक प्रयोगशाला ही है जहाँ आयु, बौद्धिक प्रखरता आदि सभी की दृष्टि से शिक्षण एवं अधिगम का अभ्यास किया जाता है।

शिक्षक यह देखता है कि उसके द्वारा प्रयुक्त कौन-सी शिक्षण युक्ति (Device), कौन-सी विधि (Method), कौन-सा कथन (Narration) आदि अधिक उपयुक्त रहेगा इसका निर्णय शिक्षक अपने शिक्षण के समय कर सकता है।

इसी प्रकार विद्यार्थी भी इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि उनकी कौन-सी मनोदशा उनके द्वारा किसी बात को सीखे जाने में कितनी सहायक सिद्ध होती है। इस दृष्टि से शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों के ही लिये पाठशाला और उसकी विभिन्न कक्षाएँ विद्यार्थियों की आयु, योनि, परिस्थिति, वर्ग आदि को दृष्टिगत रखते हुए अलग- अलग प्रयोग करने का प्रयोगशाला कक्ष है।

10. अधिगम के उद्देश्यों की पूर्ति कुशल शिक्षण द्वारा ही सम्भव है

अधिगम तथा शिक्षण दोनों ही अन्तःसम्बन्धित हैं। एक के अभाव में दूसरे का अस्तित्व ही सम्भव नहीं। इनमें से कौन-सा पहले और कौन-सा बाद में इस बात पर यदि विचार किया जाये तो दोनों ही पहले हैं तो दोनों ही बाद में भी। कैसे? यह दृष्टिकोण पर आधारित है। यदि उद्देश्य निर्धारण की दृष्टि से देखा जाये तो हम देखेंगे कि शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाना है।

अत: अधिगम के जो भी उद्देश्य निर्धारित किये जाते हैं, वे सभी इसी दृष्टि से निर्धारित किये जाते हैं। शिक्षण का उद्देश्य अधिगम के उद्देश्यों को पूरा करना है। इस दृष्टि से अधिगम के उद्देश्यों का निर्धारण पहले है तो शिक्षण उसके बाद।

अब यदि अधिगम के उद्देश्यों को पूरा करने की दृष्टि से देखा जाये तो इस बात का पता तभी लगेगा जब शिक्षक द्वारा सम्बन्धित विषयवस्तु को विद्यार्थियों को समझाने के पश्चात् इस बात का मूल्यांकन किया जायेगा कि अधिगम हेतु पूर्व में निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति हुई अथवा नहीं? यदि हुई तो किस सीमा तक और यदि नहीं हुई तो क्यों?

इस दृष्टि से शिक्षण पहले है तो अधिगम का मूल्यांकन बाद में। अत: कहा जा सकता है कि शिक्षण अधिगम के उद्देश्यों के निर्धारण तथा उद्देश्यों की पूर्ति का पता लगाने हेतु किये जाने वाले मूल्यांकन के बीच की एक कड़ी है।

इस दृष्टि से स्पष्ट है कि शिक्षण सदैव विषयवस्तु पर आधारित अधिगम के उद्देश्यों से सम्बद्ध होता है तो मूल्यांकन अधिगम की प्रभाविता का पता लगाने से। इसका अप्रत्यक्ष आशय यह भी है कि किसी शिक्षक का शिक्षण जितनी अधिक कुशलताएँ लिये हुए
होगा, विषयवस्तु पर आधारित अधिगम के उद्देश्यों की पूर्ति भी उतनी ही अधिक होगी। कुशल शिक्षण के अभाव में अधिगम के उद्देश्यों की पूर्ति सम्भव ही नहीं।

निष्कर्ष

शिक्षण की प्रकृति को विस्तार से जिस प्रकार तर्कसंगत ढंग से स्पष्ट किया गया, सार रूप में उसे निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत रखा जा सकता है-

  1. शिक्षण का सम्बन्ध विद्यार्थियों को ज्ञान देने से है तो स्वयं ज्ञान प्राप्त करने अर्थात्स्वाध्याय से भी। अर्थात् शिक्षण शिक्षक तथा शिक्षार्थी दोनों के ज्ञान में वृद्धि करता है।
  2. शिक्षण कला है तो विज्ञान भी।
  3. शैक्षणिक कुशलताएँ, विद्यार्थियों की कुशल ज्ञानवृद्धि मेंही सहायक सिद्ध नहीं होती, अपितु उनके बौद्धिक, सामाजिक आदि सभी प्रकार के विकास में सहायक सिद्ध होती हैं।
  4. विद्यार्थियों के व्यवहार में वांछित मोड़ कुशल शिक्षण के आधारपर ही लाया जा सकता है।
  5. शिक्षण विद्यार्थी तथा शिक्षक के बीच की अन्त:क्रिया है।
  6. शिक्षण एक सोद्देश्य या सप्रयोजन (Purposeful) क्रिया है।
  7. शिक्षण एक उद्देश्य आधारितद्विध्रुवीय (Bi-polar) क्रिया है।
  8. शिक्षण का मापन पूरी तरह भले ही सम्भव न हो, मूल्यांकन (Evaluation) सम्भव है।
  9. शिक्षण में सुधार सम्भव है।
  10. शिक्षक कीअसली पहचान उसका शिक्षण ही है जिसका उद्देश्य है-“विद्यार्थी के व्यवहार में वांछित बदलाव लाना”।

शिक्षण का अर्थ, प्रकृति, विशेषताएँ, सोपान तथा उद्देश्य (Meaning, Nature, Characteristics, Steps and Aims of Teaching):-

  1. शिक्षण (Teaching) – शिक्षण की परिभाषा एवं अर्थ
  2. छात्र, शिक्षक तथा शिक्षण में सम्बन्ध
  3. शिक्षण की प्रकृति
  4. शिक्षण की विशेषताएँ
  5. शिक्षा और शिक्षण में अन्तर
  6. शिक्षण प्रक्रिया – सोपान, द्विध्रुवीय, त्रिध्रुवीय, सफल शिक्षण
  7. शिक्षण प्रक्रिया के सोपान
  8. द्विध्रुवीय अथवा त्रिध्रुवीय शिक्षण
  9. शिक्षण के उद्देश्य – शिक्षण के सामान्य, विशिष्ट उद्देश्यों का वर्गीकरण, निर्धारण और अंतर

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