काव्य (Kavya) – परिभाषा, अंग, भेद, प्रकार, जनक, तत्व और उदाहरण

Kavya Kya Hota Hai

काव्य किसे कहते हैं?

काव्य (Kavya) पद्यात्मक एवं छन्द-बद्ध रचना होती है। चिन्तन की अपेक्षा काव्य में भावनाओं की प्रधानता होती है। इसका साहित्य आनन्द सृजन करता है। और जिसका उद्देश्य सौन्दर्य की अनुभूति द्वारा आनन्द की प्राप्ति होती है। आनुषंगिक रूप से काव्य द्वारा भाषा की भी समृद्धि होती है, परन्तु मूलतः वह आनन्द का साधन है। तर्क, युक्ति एवं चमत्कार आदि का आश्रय न लेकर कवि रसानुभूति का समवेत प्रभाव उत्पन्न करता है।

अतः काव्य में यथार्थ का यथारूप चित्रण नहीं मिलता वरन् यथार्थ को कवि जिस रूप में देखता है तथा जिस रूप में उससे प्रभावित होता है, उसी का चित्रण करता है। कवि का सत्य, सामान्य सत्य से भिन्न प्रतीत होता है। वह इसी प्रभाव को दिखाने के लिए अतिशयोक्ति का सहारा भी लेता है; अत: काव्य में अतिशयोक्ति भी, दोष न होकर अलंकार बन जाती है।

काव्य की परिभाषा

विद्वानों का विचार है कि मानव हृदय अनन्त रूपतामक जगत के नाना रूपों, व्यापारों में भटकता रहता है, लेकिन जब मानव अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता या काव्य कहते हैं।

  • भमाह के अनुसार काव्य की परिभाषा- “शब्दर्शों सहितों काव्यम” अर्थात शब्द और उसके अर्थ के मिश्रण को काव्य कहा गया है।
  • रुद्रट के अनुसार काव्य की परिभाषा- “ननु शब्दर्शों काव्यम” अर्थात अर्थ के लघुसमन्वयन को काव्य कहा गया है।
  • मम्मट के अनुसार काव्य की परिभाषा- “तद्रदोष शब्दर्शों गुणवाल कृति पुन क्वापि” अर्थात दोष रहित गुण सहित और कहीं अलंकार विहीन शब्दों को काव्य कहते हैं।
  • विश्वनाथ के अनुसार काव्य की परिभाषा- “रसात्मक वाक्यम काव्यम” अर्थात रसयुक्त वाक्य को ही काव्य कहा गया है।
  • पंडित जगन्नाथ के अनुसार काव्य की परिभाषा- “रामरणीयार्थ प्रतिपादक शब्दक काव्यम” अर्थात रमणीय शब्दों का अर्थ बताने वाले शब्द काव्य होते हैं।

काव्य में “सत्यं शिवं सुंदरम्” की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ गुण पाए जाते है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।

भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है।

काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वह जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। रसगंगाधर में ‘रमणीय‘ अर्थ के प्रतिपादक शब्द को ‘काव्य‘ कहा है। अर्थ की ‘रमणीयता‘ के अंतर्गत शब्द की रमणीयता (शब्दलंकार) भी समझकर लोग इस लक्षण को स्वीकार करते हैं। परंतु ‘अर्थ’ की ‘रमणीयता’ कई प्रकार की हो सकती है। इससे यह लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं है। साहित्य दर्पणाकार विश्वनाथ का लक्षण ही सबसे ठीक जँचता है। उसके अनुसार ‘रसात्मक वाक्य ही काव्य है‘। रस अर्थात् मनोवेगों का सुखद संचार की काव्य की आत्मा है।

काव्य के जनक

आचार्य मम्मट या मम्मटाचार्य ने “काव्यप्रकाश” में जिन प्राथमिक लेखकों का वर्णन किया हैं उनमें  मयूरभट्ट, वामन, भामह, विश्वनाथ तथा कुंतक आदि आते हैं। इसमें किसी लेखक को काव्य का जनक नहीं बताया गया है। अतः यह निश्चित नहीं है कि काव्य के जनक थे कौन। परंतु इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है।

काव्य के अंग

काव्य के अंग तीन प्रकार के होते हैं- 1. रस, 2. छंद और 3. अलंकार

1. रस– रस का शाब्दिक अर्थ है ‘आनन्द’। अर्थात काव्य को पढ़ने या सुनने से जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहा जाता है। रस को काव्य की आत्मा माना जाता है। प्राचीन भारतीय वर्ष में रस का बहुत महत्वपूर्ण स्थान था। रस-संचार के बिना कोई भी प्रयोजन सफल नहीं किया जा सकता था। रस के कारण कविता के पठन, श्रवण और नाटक के अभिनय से देखने वाले लोगों को आनन्द मिलता है। रस के चार भाव या अंग होते है- अनुभाव, विभाव, संचारीभाव और स्थायीभाव। आधुनिक युग में रस कुल ग्यारह प्रकार कहे गए हैं- श्रृंगार रस, करुण रस, हास्य रस, रौद रस, वीर रस, अदुभत रस, वात्सल्य रस, वीभत्स रस, भयानक रस, शांत रस और भक्ति रस।

2. छंद– छंद शब्द ‘चद्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘आह्लादित करना’, ‘खुश करना’। अतः साहित्य में वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते हैं। छन्द के अंग- मात्रा, यति, गति, तुकऔर गण। छन्द के प्रकार- मात्रिक छंद, वर्णिक छंद, वर्णिक वृत छंद, मुक्त छंद।

3. अलंकार– अलंकार का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘आभूषण’, जिस प्रकार स्त्री की शोभा आभूषण से उसी प्रकार काव्य की शोभा अलंकार से होती है अर्थात जो किसी वस्तु को अलंकृत करे वह अलंकार कहलाता है। अलंकार मुख्यतः 3 प्रकार के होते है- शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार।

काव्य के भेद (प्रकार)

Kavya Ke Bhed

विद्वानों ने काव्य के भेद दो प्रकार से माने हैं- पहला “इंद्रिय ग्राह्यता (Senses Acceptance)” के अनुसार, दूसरा “रचना शैली या स्वरूप (Writing Styles or Structure)” के अनुसार काव्य भेद। इंद्रिय ग्राह्यता के आधार पर भी काव्य के दो भेद माने जाते हैं- दृश्य और श्रव्य। तथा रचना शैली या स्वरूप के आधार पर विद्वानों ने काव्य को तीन भागों में वर्गीकरत किया हैं- पद्य, गद्य, और चम्पू (मिश्र) काव्य।

इंद्रिय ग्राह्यता (Senses Acceptance) के आधार पर काव्य को दृश्य और श्रव्य, दो भागों में विभाजित किया गया है, जो सर्वमान्य और प्रसिद्ध है।

  1. श्रव्य-काव्य: श्रव्य-काव्य वह काव्य है, जो कानों से सुना जाता है। श्रव्य-काव्य के दो भेद है- प्रबन्ध-काव्य और मुक्तक-काव्य। प्रबन्ध-काव्य के अन्तर्गत महाकाव्य, खण्डकाव्य तथा आख्यानक गीतियाँ आती हैं। मुक्तक-काव्य के भी दो भेद हैं- पाठ्य-मुक्तक तथा गेय-मुक्तक।
  2. दृश्य-काव्य: दृश्य-काव्य वह है, जो अभिनय के माध्यम से देखा-सुना जाता है, जैसे- नाटक। दृश्य काव्य को पुनः दो भेदों में विभक्त किया जाता है- 1. रूपक तथा 2. उपरूपक। दृश्य काव्य या रूपक के 10 भेद स्वीकारे गए हैं और उपरूपक के 3 भेद बताए गए हैं।

श्रव्य काव्य

श्रव्य-काव्य वह काव्य है, जो कानों से सुना जाता है। या जिस काव्य का रसास्वादन दूसरे से सुनकर या स्वयं पढ़ कर किया जाता है उसे श्रव्य काव्य कहते हैं। जैसे- रामायण और महाभारत

श्रव्य काव्य के भेद

श्रव्य-काव्य के दो प्रकार के भेद हैं – 1. प्रबन्ध-काव्य और 2. मुक्तक-काव्य। प्रबन्ध-काव्य के अन्तर्गत महाकाव्य, खण्डकाव्य तथा आख्यानक गीतियाँ आती हैं। मुक्तक-काव्य के भी दो भेद हैं- पाठ्य-मुक्तक तथा गेय-मुक्तक।

प्रबन्ध काव्य

प्रबन्ध काव्य में कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। कथा का क्रम बीच में कहीं नहीं टूटता और गौण कथाएँ बीच-बीच में सहायक बन कर आती हैं। जैसे- रामचरित मानस।

प्रबन्ध काव्य के भेद– प्रबंध काव्य के तीन भेद होते हैं – 1. महाकाव्य, 2. खण्डकाव्य और 3. आख्यानक गीतियाँ

महाकाव्य

चंदबरदाई कृत “पृथ्वीराज रासो” को हिंदी का प्रथम महाकाव्य कहा जाता है। प्राचीन आचार्यों के अनुसार महाकाव्य के लक्षण इस प्रकार हैं-

  1. महाकाव्य में जीवन का चित्रण व्यापक रूप में होता है।
  2. इसकी कथा इतिहास-प्रसिद्ध होती है।
  3. इसका नायक उदात्त और महान् चरित्र वाला होता है।
  4. इसमें वीर, शृंगार तथा शान्तरस में से कोई एक रस प्रधान तथा शेष रस गौण होते हैं।
  5. महाकाव्य सर्गबद्ध होता है, इसमें कम से कम आठ सर्ग होने चाहिए।
  6. महाकाव्य की कथा में धारावाहिकता तथा हृदय को भाव-विभोर करने वाले मार्मिक प्रसंगों का समावेश भी होना चाहिए।

आधुनिक युग में महाकाव्य के प्राचीन प्रतिमानों में परिवर्तन हुआ है। अब इतिहास के स्थान पर मानव-जीवन की कोई भी घटना, कोई भी समस्या, इसका विषय हो सकती है। महान् पुरुष के स्थान पर समाज का कोई भी व्यक्ति इसका नायक हो सकता है। परन्तु उस पात्र में विशेष क्षमताओं का होना अनिवार्य है। हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध महाकाव्य हैं- ‘पद्मावत‘, ‘रामचरितमानस‘, ‘साकेत‘, ‘प्रियप्रवास‘, ‘कामायनी‘, ‘उर्वशी‘, ‘लोकायतन‘ आदि।

खण्डकाव्य

खण्डकाव्य में नायक के जीवन के व्यापक चित्रण के स्थान पर उसके किसी एक पक्ष, अंश अथवा रूप का चित्रण होता है। लेकिन महाकाव्य का संक्षिप्त रूप अथवा एक सर्ग, खण्डकाव्य नहीं होता है। खण्डकाव्य में अपनी पूर्णता होती है। पूरे खण्डकाव्य में एक ही छन्द का प्रयोग होता है।

‘पंचवटी’, ‘जयद्रथ-वध’, ‘नहुष’, ‘सुदामा-चरित’, ‘पथिक’, ‘गंगावतरण’, ‘हल्दीघाटी’, ‘जय हनुमान’ आदि हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध खण्डकाव्य हैं।

आख्यानक गीतियाँ

महाकाव्य और खण्डकाव्य से भिन्न पद्यबद्ध कहानी का नाम आख्यानक गीति है। इसमें वीरता, साहस, पराक्रम, बलिदान, प्रेम और करुणा आदि से सम्बन्धित प्रेरक घटनाओं का चित्रण होता है। इसकी भाषा सरल, स्पष्ट और रोचक होती है। गीतात्मकता और नाटकीयता इसकी विशेषताएँ हैं। ‘झाँसी की रानी’, ‘रंग में भंग’, “विकट भद’ आदि रचनाएँ आख्यानक गीतियों में आती हैं।

मुक्तक काव्य

मुक्तक-काव्य महाकाव्य और खण्डकाव्य से भिन्न प्रकार का होता है। इसमें एक अनुभूति एक भाव या कल्पना का चित्रण किया जाता है। इसमें महाकाव्य या खण्डकाव्य जैसी धारावाहिता नहीं होती। फिर भी वर्ण्य-विषय अपने में पूर्ण होता है। प्रत्येक छन्द स्वतन्त्र होता है। जैसे कबीर, बिहारी, रहीम के दोहे तथा सूर और मीरा के पद।

मुक्तक काव्य के भेद– मुक्तक-काव्य के भी दो भेद हैं- 1. पाठ्य-मुक्तक तथा 2. गेय-मुक्तक

पाठ्य मुक्तक

इसमें विषय की प्रधानता रहती है। किसी मुक्तक में किसी प्रसंग को लेकर भावानुभ का चित्रण होता है और किसी मुक्तक में किसी विचार अथवा रीति का वर्णन किया जाता है। कबीर, तुलसी, रहीम के भक्ति एवं नीति के दोहे तथा बिहारी, मतिराम, देव आदि की रचनाएँ इसी कोटि में आती हैं।

गेय मुक्तक

इसे गीतिकाव्य या प्रगीति भी कहते हैं। यह अंग्रेजी के लिरिक का समानार्थी है। इसमें भावप्रवणता, आत्माभिव्यक्ति, सौन्दर्यमयी कल्पना, संक्षिप्तता, संगीतात्मकता आदि गुणों की प्रधान होती है।

दृश्य काव्य

जिस काव्य या साहित्य को आँखों से देखकर , प्रत्यक्ष दृश्यों का अवलोकन कर रस भाव की अनुभूति की जाती है, उसे दृश्य काव्य कहा जाता है। इस आधार पर दृश्य काव्य की अवस्थिति मंच और मंचीय होती है ।

दृश्य काव्य के भेद

दृश्य काव्य को दो भेदों में विभक्त किया जाता है- 1. रूपक तथा 2. उपरूपक

रूपक काव्य

रूपक की परिभाषा देते हुए कहा गया है ‘तदूपारोपात तु रूपम्।‘ वस्तु, नेता तथा रस के तारतम्य वैभिन्य और वैविध्य के आधार पर रूपक के निम्न दस भेद भारतीय आचार्यों ने स्वीकार किए हैं- नाटक, प्रकरण, भाषा, प्रहसन, डिम, व्यायोग, समवकार, वीथी, अंक और ईहामृग। रूपक के इन भेदों में से नाटक भी एक है। परन्तु प्रायः नाटक को ही रूपक की संज्ञा भी दी जाती है। नाट्यशास्त्र में भी रूपक के लिए नाटक शब्द प्रयोग हुआ है।

अग्नि पुराण में दृश्य काव्य या रूपक के 28 भेद कहे गए हैं- नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाव, विथी, अंक, त्रोटक, नाटिका, सदृक, शिल्पक, विलासीका, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिक, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशका, काव्य, श्रीनिगदित, नाट्यरूपक, रासक, उल्लाव्यक और प्रेक्षण।

उपरूपक काव्य

अग्नि पुराण में उपरूपक के 18 भेद कहे गए हैं- नाटिका, त्रोटक, गोष्ठी, सदृक, नाट्यरासक, प्रस्थान, उल्लासटय, काव्य, प्रेक्षणा, रासक, संलापक,श्रीगदित, शिंपल, विलासीका, दुर्मल्लिका, परकणिका, हल्लीशा और भणिका।

कुछ विद्वान इसके अंतर्गत गद्य, पद्य और चंपू को इसमें शामिल करते हैं।

शैली के अनुसार काव्य के भेद

शैली या रचना के आधार पर विद्वानों ने काव्य को तीन भागों में अध्ययन की सुविधा के लिए वर्गीकरत किया हैं- पद्य, गद्य, और चम्पू (मिश्र) काव्य।

  1. पद्य काव्य– इसमें किसी कथा का वर्णन काव्य में किया जाता है, जैसे- रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित “गीतांजलि“।
  2. गद्य काव्य– इसमें किसी कथा का वर्णन गद्य में किया जाता है, जैसे जयशंकर की “कमायनी“।
  3. चंपू काव्य (मिश्र काव्य)– इसमें गद्य और पद्य दोनों का समावेश होता है। मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा‘ चंपू काव्य है।

पद्य काव्य

पद्य काव्य साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। अर्थात इसमें किसी कथा का वर्णन काव्य में रस, छंद, अलंकार, के अलावा गति, लय, आदि के साथ होता हैं, जैसे- रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित “गीतांजलि“।

पद्य काव्य के भेद

पद्य काव्य दो प्रकार के होते हैं- प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य।

  1. प्रबंध काव्य को पुनः तीन भागों में विभाजित किया गया है-  महाकाव्य, खण्डकाव्य और आख्यानक गीतियाँ
  2. मुक्तक काव्य के भी दो प्रकार होते हैं- गीति काव्य, और पाठ्य काव्य

इन सब का वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं।

गद्य काव्य

मनुष्य की बोलने या लिखने पढ़ने की छंदरहित साधारण व्यवहार की भाषा को गद्य काव्य कहा जाता है। अर्थात इसमें किसी कथा का वर्णन रस, छंद, अलंकार, के अलावा गति, लय, आदि के साथ नहीं होता हैं, जैसे जयशंकर की “कमायनी“।

चम्पू (मिश्र) काव्य

जिस काव्य गद्य और पद्य दोनों होते हैं उसे चंपू काव्य कहते हैं। अर्थात इसमें में इसमें गद्य काव्य और पद्य काव्य दोनों का समावेश होता है। मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा‘ चंपू काव्य है।

अन्य विद्वानों का वर्गीकरण

आचार्य भामह ने काव्य के स्वरूप भेद का आधार छन्द को बनाया है । उन्होंने वृत्त अथवा छंदबद्ध काव्यों को ‘पद्यकाव्य‘ कहा है और वृत्त मुक्त या छंदमुक्त काव्यों को गद्यकाव्य

आचार्य दण्डी ने पद्यकाव्य और गद्यकाव्य भेदों के अतिरिक्त एक तीसरे प्रकार के काव्य की कल्पना की है जो पद्य और गद्य दोनों के मिश्रण से निर्मित होता है। और ऐसे काव्य को उन्होंने “मिश्र काव्य” का नाम दिया।

आचार्य वामन ने पद्यकाव्य की अपेक्षा गद्य में लिखित काव्य को अधिक महत्त्व दिया और गद्य को ही सच्चे कवि का मानदण्ड माना है। उन्होंने काव्य के तीन भेद बताए – 1. पद्य काव्य 2. गद्य काव्य और 3. मिश्र काव्य।

  1. पद्य काव्य को सर्गबंध, मुक्तक, कुलक, संघातक, कोषादि आदि भेद किए।
  2. गद्य काव्य को कथा, आख्यायिका आदि भेद किये।
  3. चम्पू तथा मिश्रकाव्य के नाटक प्रकरण, भाण आदि भेद किए ।

ध्वनिवादियों ने काव्य के उपर्युक्त भेदों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने ध्वनि तत्व को सर्वस्व माना और उसी को आधार बनाकर उन्होंने काव्य भेद भी किए।

अलंकारवादियों तथा रीतिवादियों ने रचना के बाह्य विधान एवं सौंदर्य पर अधिक बल दिया था , इसलिए उनके भेद निरूपण के उपर्युक्त दृष्टिकोण को महत्त्वहीन नहीं कहा जा सकता, परन्तु ध्वनिवादियों ने बाह्य निरूपण के स्थान पर अन्तःसौंदर्य का महत्त्व दिया। इसलिए ध्वनिवादियों का भेद निरूपक स्वरूप- विधान की दृष्टि से न होकर गुणात्मक है।

ध्वनिवादियों में आचार्य अभिनव गुप्त ही इस परंपरा को भंग करते हैं- उन्होंने ‘ ध्वन्यालोकलोचन ‘ के तृतीय स्रोत में अनेक भेदों की गणना की है जिनमें प्रसिद्ध हैं-

1. मुक्तक काव्य (संस्कृत प्राकृतअपभ्रंश में निबद्ध), 2. सदानितक, 3. विशेषक, 4. कलापक, 5. कुलक एवं पर्यायबन्ध, 6. परिकथा, 7. खण्डकथा, 8. सकल तथा सर्गबंध, 9. अभिनेयार्थ, 10. आख्यायिका, 11. कथा एवं 12. चम्पू।

काव्यप्रकाश में काव्य तीन प्रकार के कहे गए हैं, ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र

  1. ध्वनि वह है जिस, में शब्दों से निकले हुए अर्थ (वाच्य) की अपेक्षा छिपा हुआ अभिप्राय (व्यंग्य) प्रधान हो।
  2. गुणीभूत ब्यंग्य वह है जिसमें गौण हो।
  3. चित्र या अलंकार वह है जिसमें बिना ब्यंग्य के चमत्कार हो।

इन तीनों को क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम भी कहते हैं। काव्यप्रकाश का जोर छिपे हुए भाव पर अधिक जान पड़ता है, रस के उद्रेक पर नहीं।

काव्य के दो और भेद किए गए हैं, महाकाव्य और खंड काव्य

  1. महाकाव्य सर्गबद्ध और उसका नायक कोई देवता, राजा या धीरोदात्त गुंण संपन्न क्षत्रिय होना चाहिए। उसमें शृंगार, वीर या शांत रसों में से कोई रस प्रधान होना चाहिए। बीच बीच में करुणा; हास्य इत्यादि और रस तथा और और लोगों के प्रसंग भी आने चाहिए। कम से कम आठ सर्ग होने चाहिए।
  2. खंड काव्य में संध्या, सूर्य, चंद्र, रात्रि, प्रभात, मृगया, पर्वत, वन, ऋतु, सागर, संयोग, विप्रलम्भ, मुनि, पुर, यज्ञ, रणप्रयाण, विवाह आदि का यथास्थान सन्निवेश होना चाहिए।

कुछ अन्य कवियों ने काव्य दो प्रकार का माना है, दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य वह है जो अभिनय द्वारा दिखलाया जाय, जैसे, नाटक, प्रहसन, आदि। और जो पढ़ने और सुनेन योग्य हो, वह श्रव्य है। श्रव्य काव्य दो प्रकार का होता है, गद्य और पद्य।

  • पद्य काव्य के महाकाव्य और खंडकाव्य दो भेद हैं।
  • गद्य काव्य के भी दो भेद किए गए हैं- कथा और आख्यायिका।
  • चंपू, विरुद और कारंभक तीन प्रकार के काव्य और माने गए है।

काव्य के उदाहरण

1. काव्यमीमांसा से काव्य के एक अंश का उदाहरण-

स्वास्थ्यं प्रतिभाभ्यासो भक्तिर्विद्वत्कथा बहुश्रुतता।
स्मृतिदाढर्यमनिर्वेदश्च मातरोऽष्टौ कवित्वस्य॥

2. श्रव्य काव्य के उदाहरण- रामायण और महाभारत

3. प्रबंध काव्य का उदाहरण- रामचरित मानस

4. महाकाव्य के उदाहरण- पद्मावत, रामचरितमानस, कामायनी, साकेत आदि महाकव्य हैं।

5. खंडकाव्य के उदाहरण- पंचवटी, सुदामा चरित्र, हल्दीघाटी, पथिक, मेघदूतम, ऋतु संहार आदि खंडकाव्य हैं।

6. मुक्तक काव्य के उदाहरण- विभिन्न कवियों के दोहे। जैसे- रहीम, सूरदास, कबीर के दोहे।

7. चंपू काव्य के उदाहरण- साहित्य देवता (माखनलाल चतुर्वेदी), विश्वधर्म (श्री वियोगी हरि), “साधना” और “प्रवाल” (श्री राय कृष्ण दास)।

काव्य विषय

मूलतः मानव ही काव्य का विषय है। जब कवि पशु-पक्षी अथवा प्रकृति का वर्णन करता है, तब भी वह मानव-भावनाओं का ही चित्रण करता है। व्यक्ति और समाज के जीवन का कोई भी पक्ष काव्य का विषय बन सकता है। आज के कवि का ध्यान जीवन के सामान्य एवं उपेक्षित पक्ष की ओर भी गया है। उसके विषय महापुरुषों तक ही सीमित नहीं हैं, अपितु वह छिपकली, केंचुआ आदि पर भी काव्य-रचना करने लगा है। काव्य के उन्नत विषय, भाव, विचार, आदर्श-जीवन और उसमें निहित संदेश काव्य को स्थायी, महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावकारी बनाने में अधिक समर्थ होते हैं।

काव्य शब्द-शक्ति

शब्द का अर्थ बोध कराने वाली शक्ति ही शब्द-शक्ति है। शब्द और अर्थ का सम्बन्ध ही शब्द-शक्ति है। शब्द शक्तियाँ तीन हैं- अभिधा, लक्षणा और व्यंजना

  1. अभिधा से मुख्यार्थ का बोध होता है तथा मुख्यार्थ में बाधा होने पर लक्षणा का आश्रय लेना पड़ता है।
  2. लक्ष्यार्थ का बोध कराने वाली शब्द-शक्ति लक्षणा कहलाती है।
  3. व्यंजना शब्द-शक्ति ध्वनि पर आधारित है। इसमें अर्थ ध्वनित होता है।

कवि का अभिप्रेत अर्थ मुख्यार्थ तक ही सीमित नहीं रहता। काव्यानन्द लेने हेतु शब्दों के लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ तक पहुँचना आवश्यक होता है। कवि फूलों को हँसता हुआ और मुख को मुरझाया हुआ कहना पसन्द करते हैं, जबकि सामान्यतः हँसना मनुष्य के लिए प्रयुक्त होता है और मुरझाना फूल के लिए परन्तु मुख्यार्थ जाने बिना हम लक्ष्यार्थ तथा व्यंग्यार्थ तक नहीं पहँच सकते। कवि बड़ी सावधानी से शब्द-चयन करता है। कविता के शब्दों का आग्रह जिधर सहज रूप में बढ़े, पाठक अथवा श्रोता को उधर ही अभिमुख होना चाहिए।

काव्य भाषा

काव्य-भाषा सामान्य भाषा से अलग होती है। उसमें रागात्मकता, प्रतीकात्मकता, लाक्षणिकता नादात्मकता आदि तत्व होते हैं। वह सामान्य भाषा की तुलना में विचलित और अटपटी, सुसंस्कृत और परिमार्जित, स्वच्छंद और लचीली तथा जीवंत और प्रभावी होती है। अनुभूति को प्रेषणीय बनाने के लिए कवि भाषा के नए प्रयोग भी करता है। कवि के लिए नितांत आवश्यक तत्व हैं-प्रेषणीयता। इस उद्देश्य के लिए वह सामान्य भाषा से काव्य-भाषा को विचलित कर देता है। शब्द के स्तर पर उपलब्ध अनेक विकल्पो में से वह ऐसे विकल्प का चयन करता है, जो उसकी अनुभूति को भली-भाँति व्यक्त करने में समर्थ होता है।

काव्य-भाषा में चित्रोपम एवं बिम्ब-विधायिनी शक्ति भी होती है। सफल कवि वही है, जो दृश्य का इस प्रकार वर्णन करे कि पाठकों की कल्पना के समक्ष उसका चित्र उपस्थित हो जाए। काव्य-भाषा में सुकुमारता, कोमलता और नाद-सौन्दर्य विद्यमान होता है, साथ ही उसमें रसानुकूल वर्ण-योजना भी की जाती है।

काव्य के सौन्दर्य तत्व

काव्य के सौन्दर्य-तत्व मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  1. भाव-सौन्दर्य
  2. विचार-सौन्दर्य
  3. नाद-सौन्दर्य
  4. अप्रस्तुत-योजना का सौन्दर्य

भाव सौन्दर्य

प्रेम, करुणा, क्रोध, हर्ष, उत्साह आदि का विभिन्न परिस्थितियों में मर्मस्पर्शी चित्रण ही भाव-सौन्दर्य है। भाव-सौन्दर्य को ही साहित्य-शास्त्रियों ने रस कहा है। प्राचीन आचार्यों ने रस को काव्य की आत्मा माना है।

शृंगार, वीर, हास्य, करुण, रौद्र, शान्त, भयानक, अद्भुत और वीभत्स, नौ रस कविता में माने जाते हैं। परवर्ती आचार्यों ने वात्सल्य और भक्ति को भी अलग रस माना है। सूर के बाल-वर्णन में वात्सल्य का, गोपी-प्रेम में श्रृंगार का, भूषण की ‘शिवा बावनी’ में वीर रस का चित्रण है। भाव, विभाव और अनुभाव के योग से रस की निष्पत्ति होती है।

विचार सौन्दर्य

विचारों की उच्चता से काव्य में गरिमा आती है। गरिमापूर्ण कविताएँ प्रेरणादायक भी सिद्ध होती हैं। उत्तम विचारों एवं नैतिक मूल्यों के कारण ही कबीर, रहीम, तुलसी और वृन्द के नीतिपरक दोहे और गिरधर की कुण्डलियाँ अमर हैं। इनमें जीवन की व्यावहारिक-शिक्षा, अनुभव तथा प्रेरणा प्राप्त होती है।

आज की कविता में विचार-सौन्दर्य के प्रचुर उदाहरण मिलते हैं। गुप्तजी की कविता में राष्ट्रीयता और देश-प्रेम आदि का विचार-सौन्दर्य है। ‘दिनकर‘ के काव्य में सत्य, अहिंसा एवं अन्य मानवीय मूल्य हैं। ‘प्रसाद‘ की कविता में राष्ट्रीयता, संस्कृति और गौरवपूर्ण ‘अतीत के रूप में वैचारिक सौन्दर्य देखा जा सकता है।

आधुनिक प्रगतिवादी एवं प्रयोगवादी कवि जनसाधारण का चित्रण, शोषितों एवं दीन-हीनों के प्रति सहानुभूति तथा शोषकों के प्रति विरोध आदि प्रगतिवादी विचारों का ही वर्णन करते हैं।

नाद सौन्दर्य

कविता में छन्द नाद-सौन्दर्य की सृष्टि करता है। छन्द में लय, तुक, गति और प्रवाह का समावेश सही है। वर्ण और शब्द के सार्थक और समुचित विन्यास से कविता में नाद-सौन्दर्य और संगीतात्मकता अनायास आ जाती है एवं कविता का सौन्दर्य बढ़ जाता है। यह सौन्दर्य श्रोता और पाठक के हृदय में आकर्षण पैदा करता है। वर्णों की बार-बार आवृत्ति (अनुप्रास), विभिन्न अर्थ वाले एक ही शब्द के बार-बार प्रयोग (यमक) से कविता में नाद-सौन्दर्य का समावेश होता है, जैसे-

खग-कुल कुलकुल सा बोल रहा।
किसलय का अंचल डोल रहा॥

यहाँ पक्षियों के कलरव में नाद-सौन्दर्य देखा जा सकता है। कवि ने शब्दों के माध्यम से नाद-सौन्दर्य के साथ पक्षियों के समुदाय और हिलते हुए पत्तों का चित्र प्रस्तुत किया है। ‘घन घमण्ड नभ गरजत घोरा‘ अथवा ‘कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि‘ में मेघों का गर्जन-तर्जन तथा नूपुर की ध्वनि का सुमधुर स्वर क्रमशः है। इन दोनों ही स्थलों पर नाद-सौन्दर्य ने भाव भी स्पष्ट किया है और नाद-बिम्ब को साकार कर भाव को गरिमा भी प्रदान की है।

बिहारी के निम्नलिखित दोहे में वायु रूपी कुंजर की चाल का वर्णन है। भ्रमरों की ध्वनि में हाथी के घण्टे की ध्वनि भी सुनाई पड़ती है। कवि की शब्द-योजना में एक चित्र-सा साकार हो उठा है।

रनित भंग घण्टावली झरित दान मधु नीर।
मंद-मंद आवतु चल्यो, कुंजर कुंज समीर॥

इसी प्रकार ‘घनन घनन बज उठी गरज तत्क्षण रणभेरी‘ में मानो रणभेरी प्रत्यक्ष ही बज उठी है। आदि, मध्य अथवा अन्त में तुकान्त शब्दों के प्रयोग से भी नाद-सौन्दर्य उत्पन्न होता है। उदाहरणार्थ-

ढलमल ढलमल चंचल अंचल झलमल झलमल तारा।

इन पंक्तियों में नदी का कल-कल निनाद मुखरित हो उठा है। पदों की आवृत्ति से भी नाद-सौन्दर्य में वृद्धि होती है, जैसे-

हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा।
हमकौं लिख्यौ है कहा, कहन सबै लगीं।

अप्रस्तुत योजना का सौन्दर्य

कवि विभिन्न दृश्यों, रूपों तथा तथ्यों को मर्मस्पर्शी और हृदयग्राही बनाने के लिए अप्रस्तुतों का सहारा लेता है। अप्रस्तुत-योजना में यह आवश्यक है कि उपमेय के लिए जिस उपमान की, प्रकृत के लिए जिस अप्रकृत की और प्रस्तुत के लिए जिस अप्रस्तुत की योजना की जाए, उसमें सादृश्य अवश्य होना चाहिए।

सादृश्य के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि उसमें जिस वस्तु, व्यापार एवं गुण के सदृश जो वस्तु, व्यापार और गुण लाया जाए, वह उसके भाव के अनुकूल हो। इन अप्रस्तुतों के सहयोग से कवि भाव-सौन्दर्य की अनुभूति को सहज एवं सुलभ बनाता है।

कवि कभी रूप-साम्य, कभी धर्म-साम्य और कभी प्रभाव-साम्य के आधार पर दृश्य-बिम्ब उभारकर सौन्दर्य व्यंजित करता है। यथा-

रूप साम्य-

करतल परस्पर शोक से, उनके स्वयं घर्षित हुए,
तब विस्फुटित होते हुए, भुजदण्ड यों दर्शित हुए,
दो पद्म शुण्डों में लिए, दो शुण्ड वाला गज कहीं,
मर्दन करे उनको परस्पर, तो मिले उपमा कहीं।

शुण्ड के समान ही भुजदण्ड भी प्रचण्ड हैं तथा करतल अरुण तथा कोमल हैं, यह प्रभाव आकार-साम्य से ही उत्पन्न हुआ है।

धर्म साम्य-

नवप्रभा परमोज्ज्वलालीक सी गतिमती कुटिला फणिनी समा।
दमकती दुरती धन अंक में विपुल केलि कला खनि दामिनी॥

फणिनी (सर्पिणी) और दामिनी दोनों का धर्म कुटिल गति है। दोनों ही आतंक का प्रभाव उत्पन्न करती हैं।

भाव साम्य-

प्रिय पति, वह मेरा प्राण-प्यारा कहाँ है?
दुःख-जलनिधि डूबी का सहारा कहाँ है?
लख मुख जिसका मैं आज लौं जी सकी हूँ,
वह हृदय हमारा नेत्र-तारा कहाँ है?

यशोदा की विकलता को व्यक्त करने के लिए कवि ने कृष्ण को दुःख-जलनिधि डूबी का सहारा, प्राण-प्यारा, नेत्र-तारा, हृदय हमारा कहा है।

निम्नलिखित पंक्तियों में सादृश्य से श्रद्धा के सहज सौन्दर्य का चित्रण किया है। मेघों के बीच जैसे बिजली तड़पकर चमक पैदा कर देती है, वैसे ही नीले वस्त्रों से घिरी श्रद्धा का सौन्दर्य देखने वाले के मन पर प्रभाव डालता है-

नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।
खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघ बन बीच गुलाबी रंग॥

इसी प्रकार-

लता भवन ते प्रगट भे, तेहि अवसर दोउ भाइ।
निकसे जनु युग बिमल बिधु, जलद पटल बिलगाइ॥

लता-भवन से प्रकट होते हुए दोनों भाइयों की उत्प्रेक्षा मेघ-पटल से निकलते हुए दो चन्द्रमाओं से की गयी है।

काव्य के गुण

काव्यगुण के गुणों को तीन भागों में विभाजित किया गया है- ओज, माधुर्य, और प्रसाद गुण आदि।

ओज गुण

जिस गुण के कारण काव्य श्रोता पाठ्य के मन में नवीन स्फूर्ति साहस, शौर्य, पराक्रम, उत्साह, वलिदान, नवीन, आदि के भाव प्रकट करता हैं वहां ओज गुण होता हैं इसमें कठिन संयुक्ताक्षर का उपयोग होता हैं। इसमें वीर, रौद्व, भयानक, आदि रसों का समावेश होता हैं। उदाहरणस्वरूपः

संयुक्ताक्षर का उपयोग-

छोड़ देंगे मार्ग तेरा, विहन बाधा सहनकर।
काल अभिनन्दन करेगा, आज तेरा समय सादर।

रसों का समावेश देखिए-

महलों ने दी आर्ग, झोपड़ियों में ज्वाला सलगाई थी।
यह स्वतंत्रता की चिंगारी, अंतर मन में आई थी।

माधुर्य गुण

जिस काव्य को पढ़ने से हृदय में आनंद के भाव उत्पन्न होते है उस काव्य गुण को माधुर्य गुण कहा जाता हैं इसमें सरल एवं छोटी-छोटी शब्दावलियों का उपयोग होता हैं कठिन सयुक्ताक्षर का नहीं इसमें मुख्य रूप से अनुनाशिको वर्णों का उपयोग होता हैं इसमें मुख्य रूप से श्रंगार हास और शांत रसों का समावेश होता हैं। जैसे-

श्रंगार रस-

बसों मेरे नैनन में नन्दलाल,
मोहिनी सूरत सांवरी सूरत,
नैना वने रसाल।

हास रस-

छाया करती रहे सदा, तुझ पर सुहाग की छाछ।
सुख-दुख ग्रीवा के नीचे हो प्रीतम की वाह।।

प्रसाद गुण

वह काव्य गुण जिसमें भावार्थ सरलता या आसानी से प्राप्त होते हैं, और इसमें सरल और सुबोध अक्षरों का उपयोग किया जाता हैं यह गुण लगभग सभी रसों में होता हैं। एक उदाहरण देखिए-

उठो लाल अब आंखे खोलो पानी लाई हूँ।
मुँह धो लो बीती रात कमल दल फुले उनके ऊपर भाँवरें झूले।।

काव्य का प्रयोजन

मम्मट ने काव्य के छः प्रयोजन बताये हैं-

काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥

काव्य, यश और धन के लिये होता है। इससे लोक-व्यवहार की शिक्षा मिलती है। अमंगल दूर हो जाता है। काव्य से परम शान्ति मिलती है और कविता से कान्ता के समान उपदेश ग्रहण करने का अवसर मिलता है।

काव्यप्रकाश

काव्यप्रकाश, आचार्य मम्मट द्वारा रचित है। काव्यप्रकाश “काव्य की परख कैसे की जाय?” इस विषय पर उदाहरण सहित लिखा गया एक विस्तृत एवं अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथ का अध्ययन आज भी विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग में पढ़ने वाले साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। मम्मटाचार्य ने काव्य प्रकाश को 10 भागों में बांटा है जिसको उन्होंने प्रथम उल्लास, द्वितीय उल्लास आदि नाम दिए हैं।

प्रथम उल्लास में मंगलाचरण के बाद कविसृष्टि की विशेषताएँ, अनुबंध, काव्य के प्रयोजन, उपदेश की त्रिविध शैली के विषय में बात करते हुए वे मयूरभट्ट, वामन, भामह तथा कुंतक के प्रयोजनों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करते हैं, कवि तथा पाठक या श्रोता की दृष्टि से काव्य का प्रयोजन के विषय में चर्चा करते हैं तथा भरतमुनि के काव्य प्रयोजन स्पष्ट करते हैं। प्रयोजन के पश्यात प्रथम अध्याय को उन्होंने विभिन्न आचार्यों के काव्य हेतुओं का विश्लेषण किया है, काव्य के लक्षण बताए हैं और आचार्य विश्वनाथ के उदाहरण की आलोचना करते हुए प्रथम अध्याय की समाप्ति की है। इसका नाम उन्होंने रखा है- काव्य-प्रयोजन-कारण-स्वरूप निर्णय।

द्वितीय उल्लास में शब्द क्या है; और उसकी शक्ति क्या है; इस विषय में पूर्ववर्ती आचार्यों के मत का विश्लेषण करते हुए उन्होंने अपनी राय प्रकट की है। उन्होंने शब्द की तीन शक्तियाँ अभिधा, व्यंजना और लक्षणा के विषय में बात की है और व्यंजना को काव्य के लिए सर्वोत्तम गुण सिद्ध किया है। शीर्षक है- शब्दार्थ स्वरूप निर्णय।

तृतीय उल्लास में अर्थ की विशद व्याख्या की गई है। अर्थ क्या है; अर्थ के कितने भेद हो सकते हैं; पूर्ववर्ती आचार्यों ने इस विषय में क्या कहा है; और स्वयं उनका इस विषय में क्या विचार है इसका वर्णन किया गया है। शीर्षक है – अर्थव्यंजकता निर्णय।

चतुर्थ उल्लास में काव्य के प्रथम भेद ध्वनि काव्य के विषय में बताते हुए रस, रस की निषपत्ति, उसके भाव, अनुभावों का विष्लेषण तथा पूर्ववर्ती आचार्यों के साथ उसका समालोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। रस में व्यंजकता किस प्रकार निर्मित होती है वह श्रोता तक कैसे पहुँचती है तथा ध्वनि से उसका क्या तादात्म्य है यह इस अध्याय में बताया गया है। इस अध्याय में रसवदलंकारों (ऐसे अलंकार जिनसे काव्य में रस की उत्पत्ति होती है) का भी वर्णन है और यह भी बताया गया है कि वे अर्थ व्यंजना में किस प्रकार महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। अध्याय का शीर्षक है-ध्वनि निर्णय।

पंचम उल्लास में काव्य के दूसरे भेद गुणीभूत व्यंग्य काव्य के आठ भेद दिए गए हैं। पूर्ववर्ती आचार्यों के साथ उनकी परिभाषा की विवेचना करते हुए काव्य में व्यंजना शक्ति विषयक अनेक आचार्यों की परिभाषा तथा उदाहरण का खंडन-मंडन करते हुए अपने मत का प्रतिपादन किया है। शीर्षक है ध्वनिगुणीभूतव्यंग्यसंकीर्णभेद निर्णय।

षष्ठ उल्लास में काव्य के तीसरे भेद चित्रकाव्य के दो भेद शब्द चित्र और अर्थ चित्र के विषय में बताते हुए पूर्ववर्ती आचार्यों की परिभाषाओं और उदाहरणों की समालोचना प्रस्तुत की गई है। शीर्ष क है-शब्दार्थचित्र-निरूपण।

सप्तम उल्लास में काव्य के दोषों के विषय में विस्तृत व्याख्या है। श्रुतिकटु आदि १६ दोष गिनाए गए हैं और इनके विषय में विस्तार से चर्चा की गई है। शीर्षक है दोषदर्शन।

अष्टम उल्लास में काव्य के गुण उनके तीन भेद तीनो भैदों की व्याख्या, आचार्य वामन द्वारा बताए गए दस अर्थ गुणों का खंडन तथा गुणानुसारिणी रचना के अपवादों की विवेचना की गई है। शीर्षक है- गुणालंकार भेद निर्णय।

नवम उल्लास में शब्दालंकारों की परिभाषा, उदाहरण, प्रयोग और अपवादों का वर्णन है।

दशम उल्लास में अर्थालंकारों की परिभाषा, उदाहरण, प्रयोग और अपवादों का वर्णन है।

काव्य लेखन (काव्य कैसे लिखें?)

काव्य ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-सम्बन्धों के संकुचित मण्डल से ऊपर उठा कर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरुप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है, इस भूमि पर पहुंचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता। वह अपनी सत्ता को लोक-सत्ता में लीन किये रहता है। उसकी अनुभूति सबकी अनुभूति होती है या हो सकती है। इस अनुभूति-योग के अभ्यास के हमारे मनोविकार का परिष्कार तथा शेष सृष्टि के साथ हमारे रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है।

जिस प्रकार जगत अनेक रूपात्मक है उसी प्रकार हमारा हृदय भी अनेक-भावात्मक है। इस अनेक भावों का व्यायाम और परिष्कार तभी समझा जा सकता है जब कि इन सबका प्रकृत सामंजस्य जगत के भिन्न-भिन्न रूपों, व्यापारों या तथ्यों के साथ हो जाय। इन्हीं भावों के सूत्र से मनुष्य-जाति जगत के साथ तादात्मय का अनुभव चिरकाल से करती चली आई है।

जिन रूपों और व्यापारों से मनुष्य आदिम युगों से ही परिचित है, जिन रूपों और व्यापारों को सामने पा कर वह नरजीवन के आरम्भ से ही लुब्ध और क्षुब्ध होता आ रहा है, उनका हमारे भावों के साथ मूल या सीधा सम्बन्ध है|

अतः काव्य के प्रयोजन के लिए हम उन्हें मूल रूप और मूल व्यापार कह सकते हैं। इस विशाल विश्व के प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष और गूढ़ से गूढ़ तथ्यों को भावों के विषय या आलम्बन बनाने के लिए इन्ही मूल रूपों में और व्यापारों में परिणत करना पड़ता है। जबतक वे इन मूल मार्मिक रूपों में नहीं लाये जाते तब तक उन पर काव्य दृष्टि नहीं पड़ती। वन, पर्वत, नदी, नाले, निर्झर, कछार, पटपर, चट्टान, वृक्ष, लता, झाड़, फूस, शाखा, पशु, पक्षी, आकाश, मेघ, नक्षत्र, समुद्र इत्यादि ऐसे ही चिर-सहचर रूप हैं।

खेत, ढुर्री, हल, झोंपड़े, चौपाये इत्यादि भी कुछ कम पुराने नहीं हैं। इसी प्रकार पानी का बहना, सूखे पत्तों का झड़ना, बिजली का चमकना, घटा का घिरना, नदी का उमड़ना, मेह का बरसाना, कुहरे का छाना, डर से भागना, लोभ से लपकना, छीनना, झपटना, नदी या दलदल से बांह पकड़ कर निकालना, हाथ से खिलाना, आग में झोंकना, गला काटना ऐसे व्यापारों का भी मनुष्य जाति के भावों के साथ अत्यंत प्राचीन साह्चर्य्य है।

ऐसे आदि रूपों और व्यापारों में वंशानुगत वासना की दीर्घ-परंपरा के प्रभाव से, भावों के उद्बोधन की गहरी शक्ति संचित है; अतः इसके द्वारा जैसा रस-परिपाक संभव है वैसा कल-कारखाने, गोदाम, स्टेशन, एंजिन, हवाई जहाज ऐसी वस्तुओं तथा अनाथालय के लिए चेक काटना, सर्वस्वहरण के लिए जाली दस्तावेज़ बनाना, मोटर की चरखी घुमाना या एंजिन में कोयला झोंकना आदि व्यापारों द्वारा नहीं।

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