खण्डकाव्य (Khand kavya)

खण्ड काव्य (Khandkavya) में नायक के जीवन के व्यापक चित्रण के स्थान पर उसके किसी एक पक्ष, अंश अथवा रूप का चित्रण होता है। लेकिन महाकाव्य का संक्षिप्त रूप अथवा एक सर्ग, खण्डकाव्य नहीं होता है। खण्डकाव्य में अपने आप में ही पूर्ण होता है। और पूरे खण्डकाव्य में एक ही छन्द का प्रयोग होता है। ‘पंचवटी’, ‘जयद्रथ-वध’, ‘नहुष’, ‘सुदामा-चरित’, ‘पथिक’, ‘गंगावतरण’, ‘हल्दीघाटी’, ‘जय हनुमान’ आदि हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध खण्डकाव्य हैं।

Khand kavya

खण्डकाव्य की परिभाषा

संस्कृत साहित्य में इसकी जो एकमात्र परिभाषा पंडित विश्वनाथ ने साहित्य दर्पण में दी है वह इस प्रकार है-

भाषा विभाषा नियमात् काव्यं सर्गसमुत्थितम्।
एकार्थप्रवणै: पद्यै: संधि-साग्रयवर्जितम्।
खंड काव्यं भवेत् काव्यस्यैक देशानुसारि च।

इस परिभाषा के अनुसार किसी भाषा या उपभाषा में सर्गबद्ध एवं एक कथा का निरूपक ऐसा पद्यात्मक ग्रंथ जिसमें सभी संधियां न हों वह खंडकाव्य है। वह महाकाव्य के केवल एक अंश का ही अनुसरण करता है। तदनुसार हिंदी के कतिपय आचार्य खंडकाव्य ऐसे काव्य को मानते हैं जिसकी रचना तो महाकाव्य के ढंग पर की गई हो पर उसमें समग्र जीवन न ग्रहण कर केवल उसका खंड विशेष ही ग्रहण किया गया हो। अर्थात् खंडकाव्य में एक खंड जीवन इस प्रकार व्यक्त किया जाता है जिससे वह प्रस्तुत रचना के रूप में स्वत: प्रतीत हो।

वस्तुत: खंड काव्य एक ऐसा पद्यबद्ध काव्य है जिसके कथानक में एकात्मक अन्विति हो; कथा में एकांगिता (एकदेशीयता) हो तथा कथाविन्यास क्रम में आरंभ, विकास, चरम सीमा और निश्चित उद्देश्य में परिणति हो और वह आकार में लघु हो। लघुता के मापदंड के रूप में आठ से कम सर्गों के प्रबंधकाव्य को खंडकाव्य माना जाता है।

खंडकाव्य के उदाहरण

  1. मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित खंडकाव्य-  जयद्रथ वध, पंचवटी तथा नहुष,
  2. सियाराम शरण गुप्त द्वारा रचित खंडकाव्य- ‘मौर्य विजय‘,
  3. रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित खंडकाव्य- ‘पथिक‘,
  4. जयशंकर प्रसाद कृत खंडकाव्य- ‘प्रेम-पथिक‘,
  5. निराला कृत खंडकाव्य- ‘तुलसीदास‘ आदि।

आचार्य विश्वनाथ ने खंड काव्य की परिभाषा में किसी ऐसी रचना का उदाहरण नहीं दिया जिसे खंडकाव्य कह सकें। फिर भी कालिदास कृत ‘मेघदूत’ को खंडकाव्य कहा जा सकता है। कुछ विद्वान ‘पृथ्वीराज रासो’ को खंडकाव्य कहते हैं क्योंकि उसमें पृथ्वीराज के समग्र जीवन का चित्रण नहीं है परंतु अपनी उदात्त शैली के कारण हम ‘पृथ्वीराज रासो’ को खंडकाव्य न मानकर महाकाव्य मानते हैं।

खंडकाव्य की व्याख्या

खंडकाव्य शब्द साहित्य जगत में कोई नया नाम नही है। इसकी अजस्त्रधारा संस्कृत काल से ही विद्यमान रही है किन्तु इसका स्वरूप आधुनिक काल में ही अधिक निश्चित हो पाया है। भारतीय साहित्य कोश में खंडकाव्य को इस तरह परिभाषित किया गया है “जीवन के अपार विस्तार को उसके बृहत्तम आयामों में चित्रित करने वाले महदाकार काव्य-रूप महाकाव्य से भिन्न जीवन का एक पक्षीय खंडचित्र प्रस्तुत करनेवाला लघु आकार काव्य का रूप“।

खंडकाव्य को महाकाव्य का खंडित रूप या लघु रूप मानते हुए आचार्य विश्वनाथ ने संस्कृत काव्यशास्त्र में “खंडकाव्य” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया है। उनकी उक्ति है “खंडकाव्य भवेत्काव्यस्यैक देशानुसारिच” अर्थात महाकाव्य के एक देश या अंश का अनुसरण करनेवाला काव्य खंडकाव्य कहलाता है।

आचार्य विश्वनाथ की परिभाषा का संवर्धन करते हुए विश्वनाथ प्रसाद मिश्र लिखते है “महाकाव्य के ही ढंग पर जिस काव्य की रचना होती है पर जिसमें पूर्ण न ग्रहण करके खंड जीवन ही ग्रहण किया जाता है, जिससे वह प्रस्तुत रचना के रूप में स्वत: पूर्ण प्रतीत होता है।

इस परिभाषा में ‘खंड जीवन‘ शब्द खंडित जीवन का आभास देता है जो कि खंडकाव्य के लिए उपयुक्त नही लगता और साथ ही इन्होंने खंडकाव्य की रचना महाकाव्य के ढंग पर मानी है किन्तु महाकाव्य के तत्व उसी विस्तार और उत्कर्ष के साथ इसमें समाविष्ट नहीं हो सकते।

खंड शब्द को स्पष्ट करते हुए डॉ. शकुंतला दुबे ने लिखा है कि- “खंडकाव्य के खंड शब्द का यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह बिखरा हुआ या किसी महाकाव्य का खंड है प्रत्युत यह खंड शब्द उस अनुभूति के स्वरूप की ओर संकेत करता है जिसमें जीवन अपने सम्पर्ण रूप में प्रभावित न कर आंशिक या खंड रूप में प्रभावित करता है।” खंडकाव्य में समग्र जीवन का ऐसा खंडचित्र होता है जो अपनी महत्ता के कारण कवि को अधिक प्रभावित करता है। इसलिए खंडकाव्य को महाकाव्य में वर्णित समग्र जीवन के एक खंड का चित्र मानना होगा।

भगीरथ मिश्र का कथन है- “प्रबंध काव्य का दूसरा भेद खंडकाव्य या खंड प्रबंध है– प्राय: जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना या दृश्य का मार्मिक उद्घाटन होता है और अन्य प्रसंग संक्षेप में रहते है। इसमें भी कथा संगठन आवश्यक है, सर्गबध्दता नहीं। इसमें भी वस्तु-वर्णन, भाव-वर्णन एवं चरित्र का चित्रण किया जाता है पर कथा विस्तृत नहीं होती।”  यह परिभाषा हमे उचित प्रतीत होती है क्योंकि यह खंडकाव्य संबंधी सभी तत्वों की ओर संकेत करती है।

आचार्य बलदेव उपाध्याय खंडकाव्य के विषय में लिखते है- “वह काव्य जो मात्रा में महाकाव्य से छोटा परंतु गुणों में उससे कदयपि शून्य न हो, खंडकाव्य कहलाता है। महाकाव्य विषय-प्रधान होता है परंतु खंडकाव्य मुख्यतः विषयी–प्रधान होता है, जिसमें कवि कथानक के स्थूल ढाँचे में अपने वैयक्तिक विचारों का प्रसंगानुसार वर्णन करता है।” डॉ. उपाध्याय ने खंडकाव्य के विषय पर अधिक प्रकाश डाला है किन्तु उसके स्वरूप पर कम । उनका यह कथन, महाकाव्य विषय-प्रधान होता है और खंडकाव्य विषयी-प्रधान ठीक प्रतीत नहीं होता क्योंकि कोई भी खंडकाव्य एक ही समय में भाव और विचार दोनों को साथ लेकर ही चल सकता है।

बाबु गुलाबराय खंडकाव्य के विषय में लिखते है कि, “खंडकाव्य में एक ही घटना को मुख्यता दी जाकर उसमें जीवन के किसी एक पहलू की झाँकी सी मिल जाती है।” गुलाबरायजी ने भी खंडकाव्य के स्वरूप को स्पष्ट नहीं किया है।”

डॉ. एस. तंकमणि अम्मा के अनुसार, ” किसी व्यक्ति के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना या किसी व्यक्ति के चरित्र के एक मार्मिक पहलू का विश्लेषण करते हुए और प्रबंध का निर्वाह करते हुए सर्गबध्द या सर्गरहित तथा एक छंदात्मक, बहुछंदात्मक अथवा मुक्त छंदात्मक शैली में जो काव्य रचा जाता है वह खंडकाव्य है।”

डॉ. सरनामसिंह शर्मा अरूण ने खंडकाव्य को इस प्रकार परिभाषित किया है, “काव्य के एक अंश का अनुसरण करनेवाला खण्ड काव्य होता है। उससे जीवन की पूर्णता अभिव्यक्ति नहीं होती । उसकी रचना के लिए कोई एक घटना अथवा सम्वेदना मात्र पर्याप्त होती है।”

हिंदी साहित्यकोशाकार ने भी अधिकतर इन्ही विशेषताओं को दर्शाया है- “खंडकाव्य एक ऐसा पद्यशब्द कथाकाव्य है जिसमें कथानक में इस प्रकार की अन्विति हो कि उसमें अप्रासंगिक कथाएं सामान्यतया अन्तऍक्त न हो सके, कथा में एकांगिता साहित्यदर्पणकार के शब्दों में एकदेशीयता हो तथा कथा-विन्यास क्षेत्र में क्रम, आरंभ-विकास-चरमसीमा और निश्चित उद्देश्य में परिणति हो।”

खंडकाव्यों में कथा की एकांगिता और सर्गबध्दता पर सभी संस्कृत आचार्यो एवं आधुनिक चिंतको ने विशेष बल दिया है।

खंडकाव्य के विषय में पाश्चात्य धारणा

पश्चिम में काव्य संबंधी प्रकरण शिथिल है। अत: वहाँ खंडकाव्य जैसी विधा स्थिर नहीं की गई । वहाँ कवि व्यक्तित्व, विषय, शैली आदि की एक मिश्रित दृष्टि से कविता के भेद किये गए है।

यूनानी साहित्य में प्लेटो ने काव्य के तीन भेद दिए –

  1. अनुकरणात्मक काव्य,
  2. प्रकथनात्मक काव्य व
  3. मिश्र काव्य।

अनुकरणात्मक में नाटक, प्रकथनात्मक में आख्यान तथा मिश्र में दोनों के सम्मिलित रूप को स्थान दिया है।

प्लेटो के पश्चात उन्हीं के शिष्य अरस्तू ने काव्य का वर्गीकरण पाँच आधारों पर किया है –

  1. कवि व्यक्तित्व,
  2. विषय,
  3. मिश्र,
  4. अनुकरण रीति,
  5. माध्यम।

1. कवि व्यक्तित्व : कवि व्यक्तित्व के आधार पर दो भेद किए है – वीरकाव्य और व्यंग्य काव्य।

  • वीरकाव्य के अन्तर्गत देवसूक्त, महाकाव्य और त्रासदी को रखा है।
  • व्यंग्य काव्य के अन्तर्गत कामदी, अवगीति को समाहित किया है।

वास्तव में काव्य रचना में केवल कवि व्यक्तित्व एक मात्र कारण नहीं होता अपित उसके लिए प्रतिभा, देशकाल, वातावरण की भी अहम् भूमिका होती है। अत: किसी एक को आधार मानकर किया गया वर्गीकरण युक्ति संगत प्रतीत नहीं होता।

2. विषय : अरस्तू ने विषय के आधार पर काव्य के तीन भेद किए है – उदात्त काव्य, यथार्थ काव्य और क्षुद्र काव्य।

  • उदात्त काव्य में महाकाव्य, त्रासदी और देवसूक्त को रखा है।
  • यथार्थ काव्य में यथार्थ जीवन के चित्रण करनेवाले काव्य को रखा है।
  • क्षुद्र काव्य में कामदी और अवगीति काव्य को रखा है।

विषय के आधार पर अरस्तू ने उदात्त और यथार्थ का पृथक्करण किया है वह उचित नहीं है। यथार्थपरक काव्य में भी उदात्तता हो सकती है। अत: यह वर्गीकरण भी युक्तियुक्त नही है।

3. मिश्र : अरस्तू के काव्य वर्गीकरण का तीसरा आधार मिश्र है। इसमें कवि व्यक्तित्व एवं विषय का मिश्रण दोनों को समाहित किया गया है। काव्य विभाजन का आधार स्पष्ट एवं सुस्थिर होना चाहिए। यह वर्गीकरण भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि मिश्र के आधार से तो वर्गीकरण पूरा न हो सकेगा।

4. अनुकरण-रीति : अरस्तू का काव्य का चौथा आधार अनुकरण-रीति है इसमें समाख्यान काव्य और दृश्य काव्य आते है।

5. माध्यम : अरस्तू का पाँचवा आधार माध्यम है इसमें गद्य और पद्य आते है।

अपनी मौलिक प्रतिभा के बल पर अरस्तू ने अपने समय के साहित्य को देखकर काव्य वर्गीकरण का स्तुत्य प्रयास किया है। इस वर्गीकरण में उनका समस्त समकालीन साहित्य वर्गीकृत हो गया है। साथ ही यह उल्लेखनीय है कि उनका वर्गीकरण भारतीय काव्य वर्गीकरण से कुछ अंशो में मेल भी खाता है। अप्रत्यक्ष रूप में दृश्य, श्रव्य तथा प्रबंध व मुक्तक के संकेत अरस्तू ने काव्य वर्गीकरण में दिए है। वर्गीकरण की उनकी पध्दति में अनुगम पध्दति की कमियाँ होते हुए भी विचार और कल्पना का नितांत अभाव नहीं है।

पाश्चात्य समीक्षक विलियम हेनरी हडसन ने काव्य का वर्गीकरण काफी स्पष्ट एवं तर्कपूर्ण किया है। “उन्होंने काव्य को विषयी–प्रधान और विषय-प्रधान दो वर्गों में विभाजित किया है। विषयीगत काव्य में कवि व्यक्तित्व की प्रधानता पर बल दिया गया।” विषयी प्रधान काव्य को प्रगीत (Lyrics) तथा विषय-प्रधान काव्य को एपिक (Epic) संज्ञा दी।

हडसन ने एपिक के तीन प्रकार बतलाए है – एपिक ऑव ग्रोथ, एपिक ऑव आर्ट तथा मॉक एपिक। हडसन ने एपिक के लघु रूप (Mock epic) की विस्तृत चर्चा की है। इसके लघु रूप के कारण खंडकाव्य से इसकी समानता होती है यद्यपि इसमें समानता कम विषमता अधिक है।

  • मॉक एपिक में अत्यन्त तुच्छ / क्षुद्र विषय का वर्णन व्यंग्यपूर्ण शैली में लाघव के साथ किया जाता है।

किन्तु खंडकाव्य का विषय महान, उदात्त या साधारण तो हो सकता है पर तुच्छ कदापि नहीं होता और नहीं खंडकाव्य में व्यंग्य को महत्त्व दिया जाता है।

पाश्चात्य काव्य वर्गीकरण में खडकाव्य जैसी कोई काव्य विधा स्थिर नहीं की गई है फिर भी जिन रचनाओं को वहाँ ‘शॉर्ट एपिक’ या ‘स्टोरी पोयम’ या ‘टेल इन वर्स’ या ‘एपिसोड’ की संज्ञा दी गई है, वह खंडकाव्यों के समीपवर्ती रचनाएँ है।

हिंदी साहित्यकोष के अनुसार, “पाश्चात्य देशों में प्रबंधो (Narratives) के दो रूप महाकाव्य और कथाकाव्य (रोमांस) बहुत पहले ही मान लिए गए थे किन्तु लघु निबंध काव्यों (खंडकाव्य) को वहाँ भिन्न नाम दिया गया, उसे नेरेटिव पोयटी (Narrative Poetry) प्रबंध काव्य ही कहा जाता था, रोमांस कथा काव्य (रोमांस) नहीं।”

अंत में निष्कर्ष यहीं निकाला गया है कि Epic Narrative (आख्यान) नामक पाश्चात्य काव्य ही खंडकाव्य के सबसे अधिक समीपवर्ती विधा है क्योंकि आख्यान काव्य में किसी घटना या विचार शैली का कथात्मक शैली में प्रतिपादन होता है और यहीं गुण इसे किसी स्तर तक खण्डकाव्य के समीप ले जाता है।

  • Epic Narrative में जीवन की किसी एक विशिष्ट घटना का ही वर्णन काव्य में किया जाता है। खंडकाव्य में भी विशिष्ट घटना का वर्णन किया जाता है।
  • Epic Narrative में जटिलता का अभाव रहता है, उसी प्रकार खंडकाव्य में भी अवांतर उपकथाओं का समावेश नहीं रहता।

अत: भारतीय खंडकाव्य विधा और पश्चिम के Epic Narrative में लक्षणों की दृष्टि से पर्याप्त समानता है।

फलत: हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि –

  • खंडकाव्य महाकाव्य में वर्णित किसी एक विशिष्ट घटना या चरित्र को ही अपना आधार बनाकर लिखा जाता है।
  • वास्तव में खंडकाव्य महाकाव्य सदृश्य होता है लेकिन उसमें उपकथानकों से प्राप्त जटिलता नहीं होती। चरित्रों की भीड़ नही होती, रसों की दृष्टि से कोई नियम नही होता और न ही अंगीरस अनिवार्य माना जाता है।
  • खंडकाव्य की शैली युगशैली भी नहीं हो सकती और नहीं उद्देश्य युगबोध हो सकता है। एक ही कर्म की प्राप्ति पर्याप्त मानी जाती है।
  • खंडकाव्य का नायक प्रायः मानवीय जीवन से निकट सम्बन्ध स्थापित करता है। वास्तव में महाकाव्य की अपेक्षा अधिक लघु और संक्षिप्त होने पर भी खंडकाव्य अपने आप में संपूर्ण रचना होती

खंडकाव्य की मूल प्रेरणा

खंडकाव्य की मूल प्रेरणा को स्पष्ट करते हुए डॉ. शकुन्तला दुबे ने लिखा है, “खंडकाव्य की प्रेरणा के मूल में अनुभूति का स्वरूप एक सम्पूर्ण जीवन खंड की प्रभावात्मकता से बनता है। जीवन के मर्मस्पर्शी खंड का बोधमात्र कवि के हृदय में नहीं होता, प्रत्युत उसका समन्वित प्रभाव उसके हृदय पर पड़ता है तब प्रेरणा के बल पर जो रूप खड़ा होता है वह खंडकाव्य कहलाता है।”

खंडकाव्य के रचियता कथा के प्रमुख पात्र के जीवन खंड को विस्तृत रूप देते है तो कही पर संक्षेप में परिधि को छोटा कर अपनी काव्यगत विशेषताओं का परिचय देते है। यही कारण है कि खंडकाव्य का कथानक कही बड़ा होता है तो कही बहुत छोटा किन्तु कथा के इस विस्तार एवं संकोच के तारतम्य से खंडकाव्य की महत्ता नहीं आँकी जाती, क्योंकि जीवन के किसी एक अंग को स्पर्श करनेवाला खंडकाव्य अपनी छोटी सी परिधि में भी अपना महत्त्व सिध्द करता है।

खंडकाव्य काव्य का स्वरूप

महाकाव्य की भाँति खंडकाव्य भी प्रबंध काव्य का ही एक भेद है। ‘खंडकाव्य’ शब्द से खंडित होने की ध्वनि का प्रस्फुटन होता प्रतीत होता है किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि खंडकाव्य महाकाव्य का एक अंग अथवा एक अध्याय है न तो यह खंडित अनुभव का बिखरा रूप है।

खंड शब्दांश से, प्रस्तुत प्रसंग में अभिप्राय आत्मपर्यवसित जीवन खंड के किसी महत्त्वपूर्ण घटना की पूर्ण अनुभूति से है। यह अनुभूति अपने आप में पूर्ण होती है तथा अभिव्यक्त होकर जीवन के संबंधित पक्ष की झलक भर प्रस्तुत कर देती है। जिस प्रकार चावल के एक दाने से यह पता चल जाता है कि पात्र के सारे चावल पक गए है या नहीं, उसी प्रकार खंड काव्य में वर्णित एक घटना जीवन के संबंधित पक्ष को उभार कर चमका देती है।

वास्तव में खंडकाव्य में जीवन के किसी महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली पक्ष अथवा किसी महत्त्वपूर्ण घटना का ही चित्रण होता है। यह घटना शरीर के किसी एक अंग की भाँति अधूरी नही होती अपित वह स्वयं अपने आप में पूर्ण होती है जैसे कहानी अपने लघु आकार में भी अत्यन्त प्रभावशाली होती है उसी प्रकार खंडकाव्य भी अपनी लघुता में परिपूर्ण होता है।

जहाँ महाकाव्य में नायक का सम्पूर्ण जीवन-चरित्र समग्रता से चित्रित किया जाता है वही खंडकाव्यकार नायक के जीवन के किसी महत्वपूर्ण एवं मार्मिक प्रसंग को उठाकर विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति करता है।

एक ही चरित्र को आधार बनाकर महाकाव्य और खण्डकाव्य दोनों की रचना की जा सकती है उदाहरणार्थ – तुलसीदासकृत ‘रामचरितमानस‘ और नरेश मेहताकृत ‘सशंय की एक रात‘ दोनों ही राम के जीवन से संबंधित काव्य है किन्तु ‘रामचरितमानस’ में राम को सम्पूर्ण जीवन की विशालता एवं उदात्तता के साथ चित्रित करना जहाँ  कवि को अभिष्ट रहा है वही ‘संशय की एक रात’ में सेतूबंध की समस्या उठाकर राम के मानसिक संघर्ष एवं द्वन्द्व के सर्वांगपूर्ण चित्रण को काव्य का विषय बनाया गया है।

इस प्रकार खंडकाव्य जीवन की किसी महत्त्वपूर्ण घटना को अपनाता है “उसमें एक ही मुख्य घटना के प्रचुर विस्तार की समस्त सामग्री संजोयी जाती है। मुख्य घटनाओं की सहायक कुछ गौण घटनाएँ भी खंडकाव्य में हो सकती है, जो मुख्य घटना को उत्कर्ष प्रदान करती हो किन्तु उनका स्वतंत्र अस्तित्व खंडकाव्य में नहीं होता।

खंडकाव्य में एक ही मुख्य मार्मिक संवेदना होती है। खंडकाव्य का वृत्त सुगठित, वस्तुपरक तथा प्रख्यात या काल्पनिक होता है उसका कथानक सस्पष्ट और अनज्झितार्थ संबंध से यक्त होता है। कथाविन्यास में क्रम, आरम्भ, विकास, चरमसीमा और कोई निश्चित उद्देश्य होता है। खंडकाव्यों की उपमा कुछ विद्वानों ने कहानी और एकांकी से दी है।

एक मुख्य मार्मिक संवेदना तीनो काव्य विधाओं में होने पर भी खंडकाव्य, कहानी और एकांकी में पर्यात शैली भेद है। पद्य और गद्य के अन्तर के साथ ही खंडकाव्य का शिल्प विधान भी भिन्न होता है। खंडकाव्य की कथा का क्रमिक विकास होता है। कथा का आरंभ और विकास वर्णनात्मक ढंग से धीरे-धीरे होता है।

खंडकाव्य में एक ही प्रमुख घटना का नियोजन होने के कारण प्रासंगिक कथाओं का समावेश नहीं होता । एक ही मुख्य कथा होती है। किसी प्रासंगिक कथा या प्रसंगो से मुग्ध होकर खंडकाव्यकार उसे खंडकाव्य की कथा के रूप में चुनता है।

केन्द्रबिन्दु किसी एक घटना या पात्र विशेष को लेने के कारण खंडकाव्य में पात्रों की संख्या भी सीमित रहती है। खंडकाव्यकार नायक के चरित्र-चित्रण पर ही पूर्ण प्रकाश डालता है। कवि खंडकाव्य के नायक रूप में देव, काल्पनिक या ऐतिहासिक व्यक्ति, सुर-असुर, धीरोदात्त, धीर-ललित, धीर-प्रशांत, धीरोदात्त में से किसी का भी चयन करता है।

खंडकाव्य में व्यक्ति और समाज के लिए कोई सामयिक या चिरन्तन उपदेश निहित रहता है। नायक को किसी एक फल की प्राप्ति होती है। भाषा और विभाषा दोनों में खंडकाव्य की रचना होती है। खंडकाव्य की रचना एक या अनेक छंदो में छंदोबध्द, गीतात्मक, मुक्तछंदीय अथवा नाटकीय किसी एक प्रणाली में होती है।

इस प्रकार खंडकाव्य ऐसी प्रबंध काव्यात्मक रचना है जिसमें नायक के जीवन की किसी एक घटना, जोकि अपने आप में पूर्ण होती है, उस पर प्रकाश डाला जाता है। कथावस्तु और पात्र प्रख्यात या काल्पनिक होते है। चतुर्फल में से किसी एक फल को प्राप्त कराते हुए नायक के माध्यम से खंडकाव्यकार समाज को नई दिशा प्रदान करता है।

खण्डकाव्य के स्वरूप से संबंधित महत्वपूर्ण बिन्दु:-

  • खंडकाव्य में चरित नायक का जीवन सम्पूर्ण रूप में कवि को प्रभावित नहीं करता।
  • इसमें कवि चरित नायक के जीवन की किसी सर्वोत्कृष्ट घटना से प्रभावित होकर जीवन के उस खण्ड विशेष का अपने काव्य में पूर्णतया उद्घाटन करता है।
  • प्रबन्धात्मकता, महाकाव्य एवं खण्डकाव्य दोनों में ही रहती है परंतु खण्ड काव्य के कथासूत्र में जीवन की अनेकरुपता नहीं होती। इसलिए इसका कथानक कहानी की भाँति शीघ्रतापूर्वक अन्त की ओर जाता है।
  • महाकाव्य प्रमुख कथा के साथ अन्य अनेक प्रासंगिक कथायें भी जुड़ी रहती हैं इसलिए इसका कथानक उपन्यास की भाँति धीरे-धीरे फलागम की ओर अग्रसर होता है। जबकि खण्डाकाव्य में केवल एक प्रमुख कथा रहती है, प्रासंगिक कथाओं को इसमें स्थान नहीं मिलने पाता है।

खंडकाव्य के तत्व

खंडकाव्य के स्वरूप को निर्धारित करने वाले मुख्यतः सात तत्व माने जाते है। जो इस प्रकार है:-

  1. कथानक,
  2. पात्र या चरित्र-चित्रण,
  3. संवाद,
  4. रस या भाव व्यंजना,
  5. देशकाल,
  6. उद्देश्य,
  7. शैली।

1. कथानक

खंडकाव्य का समस्त सौन्दर्य एवं प्राणशक्ति उसकी वस्तु-संघटना में निहित है। एक ही घटना को केन्द्र बनाकर अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय कवि को देना होता है। खंडकाव्य की रचना कवि के लिए गागर में सागर भरने का प्रयत्न करना है क्योंकि कथा लघु कलेवर में सीमित होने पर भी अपने आप में पूर्ण, स्पष्ट और प्रबंधवक्रता से युक्त होती है।

इसलिए खंडकाव्यकार अतिलाघव के साथ जीवन के किसी एक पक्ष की झलक अथवा जीवन के पक्ष-विपक्ष की व्याख्या अथवा प्रतीकों या बिंबो के माध्यम से सामयिक जीवन की किसी जटिल समस्या को कथा में श्रृंखलाबध्द करते हए चरम उद्देश्य तक पहुँचता है।

खंडकाव्य की एक तथ्यता उसका प्राण है। लघु कलेवर होने के कारण खंडकाव्य के कथानक में न तो अवान्तर कथाएँ होती है और न ही पात्रों की संख्या अधिक होती है। संधियों की योजना भी आवश्यक नही मानी जाती। वस्तु–वर्णन संक्षिप्त होता है। कथानक ऐतिहासिक प्रख्यात एवं उत्पाद्य में से कोई भी एक हो सकता है। कथा चरम स्थिति पर समाप्त न होकर निश्चित विकास के साथ समाप्त होती है।

2. पात्र और चरित्र-चित्रण

जैसा कि हम पहले ही कह चुके है कि खंडकाव्य के पात्र पुरूष-स्त्री, मानव-दानव, प्रसिध्द या काल्पनिक तथा उदात्त, धीरोदात्त, धीर-प्रशांत या धीरोद्वत में से कोई भी हो सकता है। लघ स्वरूप के कारण पात्रों की संख्या सीमित होती है। सभी पात्र कोई न कोई प्रतीक लिए अपने युग की पृष्ठभूमि का निर्वाह करते हुए सामयिक जनजीवन के किसी वर्ग की अभिव्यंजना करते है। आधुनिक काल में खंडकाव्यों में प्रतीकात्मक उपस्थिति अधिक दिखाई देती है। अधिकतर मिथकीय पात्रों के द्वारा समाज की ज्वलंत समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है जैसे ‘एक कंठ विषपायी’ में बह्मा का युध्द को सामूहिक आत्मघात बतलाना, ‘शंबूक’ में शंबूक द्वारा वर्ण व्यवस्था बदलने का आग्रह करना आदि।

खंडकाव्यकार को पूर्ण स्वतंत्रता रहती है वह किसी भी पात्र का चरित्र-चित्रण करें। पात्रों के चरित्र विकास का अवकाश न होने पर भी रचनाकार अपनी काव्य कला के द्वारा उसके चरित्र संबंधी प्रमुख विशेषता पर प्रकाश डालता ही है। आधुनिक खंडकाव्य में नायक के चरित्र के किसी एक पक्ष को उजागर करने की लालसा कवियों में बराबर रही है। इसलिए कुछ रचनाएँ चरित्र–प्रधान भी बन पड़ी है उदा. मैथिलीशरण गुप्त का ‘प्लासी का युध्द’ और ‘सिध्दराज’ तथा सियारामशरण का ‘मौर्य विजय’।

3. संवाद

कथा को गति देने, उसमें रोचकता और नाटकीयता का समावेश करने हेतु कवि खंडकाव्य में मार्मिक एवं तर्कपूर्ण संवादों की योजना करता है।

4. रस या भाव व्यंजना

जीवन के किसी एक ही घटना या प्रसंग से संबंधित होने के कारण खंडकाव्य में एक ही रस का पूर्ण परिपाक होता है। अन्य रस अपनी उपस्थिति का अहसास करवा कर भी मखरित होने का अवसर नहीं खोज पाते। कभी-कभी खंडकाव्य में किसी उदात्त भाव के चरम सौन्दर्य को ही प्रस्तुत किया जाता है वहाँ किसी भी रस का पूर्ण परिपाक नहीं होता। आधुनिक खंडकाव्यों में जो भावबोध, संघर्ष और बेचैनी मिलती है वह भाव-विकास के अन्तर्गत ही आती है।

5. देशकाल

खंडकाव्य में देशकाल का व्यापक चित्रण न होने पर भी कवि अपनी रचना के संकलनत्रय का विशेष ध्यान रखता है । कवि युगबोध अथवा देशकाल को साथ लेकर ही रचना काल में प्रवृत्त हो सकता है इसलिए खंडकाव्य में देशकाल की स्पष्टता की दृष्टि से घटना और पात्रों से संबंधित स्थान और काल का चित्रण अवश्य होता है।

कवि अपने युग की संवेदनाओं से संवेदित होकर ही अभिव्यक्ति की ओर प्रेरित होता है इस अर्थ में काव्य समाज से प्रभावित होता है और उसे प्रभावित करता भी है। खंडकाव्यकार का प्रमुख लक्ष्य अपने युग की विचारधारा का पालन और उसका प्रतिष्ठापन करना होता है इसी रूप में रचना देशकाल सापेक्ष-स्वरूप ग्रहण करती है।

अतः खंडकाव्य की दृष्टि से समाज सापेक्षता अपनी कालातीत पृष्ठभूमि पर सदैव प्रासंगिक रहती है।

6. उद्देश्य

खंडकाव्य में कोई घटना, प्रसंग या समसामयिक समस्या का चित्रण, समस्या का निराकरण, जीवन के किसी विशेष पहलू या समस्या की मौलिक व्याख्या या समस्या पर नवीन दृष्टिकोण से विचार और सामयिक उपदेश इसका चित्रण करना ही कवि का मुख्य उद्देश्य रहता है जैसे युध्द चिंतन को लेकर लिखा गया ‘अंधायुग’ और ‘एक कंठ विषपायी’ आदि । खंडकाव्यों में चतुर्फलो में से किसी एक की प्राप्ति या प्रयास भी मिलता है।

7. शैली

खंडकाव्य पद्यबध्द रचना है उसकी रचना शैली उदात्त और गरिमामय होती है क्योंकि इसमें किसी घटना का पूर्ण मनोयोग से चित्रण किया जाता है, जीवन के किसी मार्मिक पक्ष की झाँकी प्रस्तुत की जाती है और वह पक्ष अपने आप में पूर्ण अनुभूति का आनंद देने वाला होता है।

शैली की दृष्टि से खंडकाव्यों को तीन आधारों पर विभाजित किया जा सकता है:-

Khand kavya Ka Vargikaran
शैली की दृष्टि से खंडकाव्यों को तीन आधारों पर विभाजन

आधुनिक काल में विषयवस्तु के परिवर्तन के साथ शैली के नियमों में भी परिवर्तन हुए है। एक ही छंद में रचना अथवा संगीत में छंद परिवर्तन की सूचना खंडकाव्य के लिए आवश्यक अनुबंध नहीं है। खंडकाव्य का नामाकरण भी महाकाव्य की भाँति मुख्य घटना के आधार पर हो सकता है जैसे ‘तुलसीदास’, ‘नहुष’ अथवा ‘उत्तरा’, ‘रानी दुर्गावती’, ‘द्रौपदी’ अथवा प्रतीकात्मक रूप में एक और पुरूष’।

गुण एवं विशेषताएं

खंडकाव्य के गुण –

  • खण्डकाव्य में जीवन के जिस भाग का वर्णन किया गया हो वह अपने लक्ष्य में पूर्ण होना चाहिए।
  • खण्ड काव्य में प्राकृतिक दृश्य आदि का चित्रण देश काल के अनुसार और संक्षिप्त होना चाहिए।
  • खंडकाव्य में कथावस्तु काल्पनिक होना चाहिए।
  • इसकी कथावस्तु छोटी होती है, इसमें उपकथाएं, प्रसंग आदि नहीं होने चाहिए।
  • खंड काव्य में सात या सात से कम सर्ग होंना चाहिए।
  • खंडकाव्य में कई प्रकार के छंदों का प्रयोग नहीं होता है, या कम होता है।
  • खंड काव्य में किसी एक रस की ही प्रधानता होती है। अन्य रस प्रधान रस के भागस्वरूप में प्रयुक्त हो सकते हैं।
  • इसमें विस्तार की स्वतंत्रता नहीं होती है फिर भी आरंभ, मध्य और अंत में पूर्णता होनी चाहिए।

खंडकाव्य की विशेषताएं –

  • खंडकाव्य प्रबंध काव्य का एक भेद है अत: उसमें सुगठित वस्तुविन्यास आवश्यक है। कथा का क्रमिक विकास और प्रबंध वक्रता वांछनीय है। विचार चिन्तन का विकास उन खंडकाव्यों में होता है जिनकी कथा सूक्ष्म और वायवीय होती है। कथा चरमावस्था पर समाप्त न होकर एक निश्चित विकास में उसका अंत होता है।
  • खंडकाव्य में नायक या समाज के जीवन की किसी एक घटना से सम्बध्द सुविन्यास युक्त कथानक होता है। जीवन से संबंधित झाँकी और व्याख्या भी मिल जाती है। घटना का संबंध नायक के व्यक्तिगत जीवन या जनजीवन से होता है जिनका प्रतिनिधित्व नायक करता है। महाकाव्य में अवांतर कथाएं आती है। खंडकाव्य के कथानक में इसके लिए कोई स्थान नहीं होता। विस्तृत वर्णन न होने के कारण कथानक की गति मंद न होकर तीव्र होती है।
  • खंडकाव्य का आकार लघु होने के कारण सर्गो की अनिवार्यता नहीं होती। प्रारंभ से अंत तक एक सर्ग भी हो सकता है और सर्ग बाँटे भी जा सकते है। सर्गबध्दता खंडकाव्य का आवश्यक नियम नहीं है।
  • खंडकाव्य का कथानक विख्यात या काल्पनिक दोनों प्रकार का होता है।
  • खंडकाव्य में एक रस का परिपाक अथवा कई रसों की अपूर्ण योजना अथवा एक भाव का चरम सौन्दर्य या परिपूर्णता होती है। कथा में प्रारंभ से अंत तक एक ही रस पूर्णता के साथ विद्यमान रहता है।
  • खंडकाव्य में एक छंद अद्यांत विद्यमान रहता है और अनेक भी। छंद बध्दता या सर्ग के अंत में छंद परिवर्तन की सूचना आवश्यक नहीं होती।
  • खंडकाव्य का एक सुनिश्चित उद्देश्य होता है जो दूध में नवनीत की भाँति समाया हुआ रहता है। चतुर्फल में से किसी एक की प्राप्ति अभिष्ट होती है। आधुनिक खंडकाव्यों में सामयिक ज्वलन्त समस्या का उद्घाटन ही उद्देश्य रहता है उनका समाधान नहीं बतलाया जाता है।
  • नायक देव, दानव, मानव में से किसी एक वर्ग का होता है नायक तथा अन्य पात्र ख्यात और कल्पित में से किसी भी श्रेणी के हो सकते है । नायिका प्रधान खंडकाव्य भी लिखे गये है।
  • खंडकाव्य आकार मे लघु होने के कारण पात्रों की संख्या सीमित होती है। पात्रों की अनावश्यक भीड़भाड़ नहीं होती है।
  • खंडकाव्य की शैली उदात्त और गरिमामय होती है कथानक में प्रबंधवक्रता अथवा प्रकरण वक्रता की योजना होती है।
  • खंडकाव्य आकार मे लघु होते हुए भी अपने आप में पूर्ण होता है अन्य काव्यरूप का खंड नहीं।
  • खंडकाव्य की रचना सुशिक्षित नगरों की शुध्द भाषा या विभाषा में होती है।
  • नाटकीयता खंडकाव्य के कनाथक का आवश्यक गुण होता है किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं कि वह नाटक या एकांकी का प्रतिरूप है।
  • खंडकाव्य में कथानक या घटना जब अत्यन्त छोटी होती है तब उसे स्वरूप देने के लिए वर्णनात्मकता का समावेश किया जाता है। उदाहणार्थ कालिदास द्वारा रचित ‘मेघदूत’ खंडकाव्य में संदेश भेजने की घटना को वर्णन के द्वारा खंडकाव्य का रूप दिया गया है।

खण्डकाव्य और महाकाव्य में अंतर

क्रम खण्डकाव्य महाकाव्य
1. खण्ड काव्य में जीवन की किसी एक घटना का वर्णन होता है। महाकाव्य में जीवन का समग्र रूप का वर्णन किया जाता है।
2. खण्ड काव्य एक सर्ग में होता है। महाकाव्य में आठ या उससे अधिक वर्ग होते हैं।
3. खण्ड काव्य के लिये यह आवश्यक नहीं है। इसमें अनेक छन्दों का प्रयोग होता है।
4. खण्डकाव्य में श्रृंगार व करुण रस प्रायः प्रधान होता है। इसमें शांत, वीर अथवा श्रृंगार रस में से किसी एक रस की प्रधानता होती है।
5. खण्डकाव्य का उद्देश्य महान होता है। इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
6. प्रमुख खण्ड काव्य ‘पंचवटी’, ‘जयद्रथावध’, ‘सुदामा’ चरित’ आदि। प्रमुख महाकाव्य रामचरित मानस’, ‘साकेत’, ‘ पदमावत’, ‘कामायनी’ आदि ।

काव्य में “सत्यं शिवं सुंदरम्” की भावना भी निहित होती है।

काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।

भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है।

महाकाव्य में किसी ऐतिहासिक या पौराणिक महापुरुष की संपूर्ण जीवन कथा का आद्योपांत वर्णन होता है। जैसे – पद्मावत, रामचरितमानस, कामायनी, साकेत आदि महाकाव्य हैं।

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2 Comments

  1. अमित जी लेख को संसोधित करके, “खंडकाव्य एवं महाकाव्य में अंतर” नामक हेडिंग जोड़ दी गई है

  2. खण्ड काव्य एण्ड महा काव्य में अन्तर बताइए

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