खण्डकाव्य (Khand kavya)

खण्ड काव्य (Khandkavya) में नायक के जीवन के व्यापक चित्रण के स्थान पर उसके किसी एक पक्ष, अंश अथवा रूप का चित्रण होता है। लेकिन महाकाव्य का संक्षिप्त रूप अथवा एक सर्ग, खण्डकाव्य नहीं होता है। खण्डकाव्य में अपने आप में ही पूर्ण होता है। और पूरे खण्डकाव्य में एक ही छन्द का प्रयोग होता है। ‘पंचवटी’, ‘जयद्रथ-वध’, ‘नहुष’, ‘सुदामा-चरित’, ‘पथिक’, ‘गंगावतरण’, ‘हल्दीघाटी’, ‘जय हनुमान’ आदि हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध खण्डकाव्य हैं।

Khand kavya

खण्डकाव्य की परिभाषा

संस्कृत साहित्य में इसकी जो एकमात्र परिभाषा पंडित विश्वनाथ ने साहित्य दर्पण में दी है वह इस प्रकार है-

भाषा विभाषा नियमात् काव्यं सर्गसमुत्थितम्।
एकार्थप्रवणै: पद्यै: संधि-साग्रयवर्जितम्।
खंड काव्यं भवेत् काव्यस्यैक देशानुसारि च।

इस परिभाषा के अनुसार किसी भाषा या उपभाषा में सर्गबद्ध एवं एक कथा का निरूपक ऐसा पद्यात्मक ग्रंथ जिसमें सभी संधियां न हों वह खंडकाव्य है। वह महाकाव्य के केवल एक अंश का ही अनुसरण करता है। तदनुसार हिंदी के कतिपय आचार्य खंडकाव्य ऐसे काव्य को मानते हैं जिसकी रचना तो महाकाव्य के ढंग पर की गई हो पर उसमें समग्र जीवन न ग्रहण कर केवल उसका खंड विशेष ही ग्रहण किया गया हो। अर्थात् खंडकाव्य में एक खंड जीवन इस प्रकार व्यक्त किया जाता है जिससे वह प्रस्तुत रचना के रूप में स्वत: प्रतीत हो।

वस्तुत: खंड काव्य एक ऐसा पद्यबद्ध काव्य है जिसके कथानक में एकात्मक अन्विति हो; कथा में एकांगिता (एकदेशीयता) हो तथा कथाविन्यास क्रम में आरंभ, विकास, चरम सीमा और निश्चित उद्देश्य में परिणति हो और वह आकार में लघु हो। लघुता के मापदंड के रूप में आठ से कम सर्गों के प्रबंधकाव्य को खंडकाव्य माना जाता है।

खंडकाव्य के उदाहरण

  1. मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित खंडकाव्य-  जयद्रथ वध, पंचवटी तथा नहुष,
  2. सियाराम शरण गुप्त द्वारा रचित खंडकाव्य- ‘मौर्य विजय‘,
  3. रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित खंडकाव्य- ‘पथिक‘,
  4. जयशंकर प्रसाद कृत खंडकाव्य- ‘प्रेम-पथिक‘,
  5. निराला कृत खंडकाव्य- ‘तुलसीदास‘ आदि।

आचार्य विश्वनाथ ने खंड काव्य की परिभाषा में किसी ऐसी रचना का उदाहरण नहीं दिया जिसे खंडकाव्य कह सकें। फिर भी कालिदास कृत ‘मेघदूत’ को खंडकाव्य कहा जा सकता है। कुछ विद्वान ‘पृथ्वीराज रासो’ को खंडकाव्य कहते हैं क्योंकि उसमें पृथ्वीराज के समग्र जीवन का चित्रण नहीं है परंतु अपनी उदात्त शैली के कारण हम ‘पृथ्वीराज रासो’ को खंडकाव्य न मानकर महाकाव्य मानते हैं।

खण्डकाव्य का स्वरूप

  • खंडकाव्य में चरित नायक का जीवन सम्पूर्ण रूप में कवि को प्रभावित नहीं करता।
  • इसमें कवि चरित नायक के जीवन की किसी सर्वोत्कृष्ट घटना से प्रभावित होकर जीवन के उस खण्ड विशेष का अपने काव्य में पूर्णतया उद्घाटन करता है।
  • प्रबन्धात्मकता, महाकाव्य एवं खण्डकाव्य दोनों में ही रहती है परंतु खण्ड काव्य के कथासूत्र में जीवन की अनेकरुपता नहीं होती। इसलिए इसका कथानक कहानी की भाँति शीघ्रतापूर्वक अन्त की ओर जाता है।
  • महाकाव्य प्रमुख कथा के साथ अन्य अनेक प्रासंगिक कथायें भी जुड़ी रहती हैं इसलिए इसका कथानक उपन्यास की भाँति धीरे-धीरे फलागम की ओर अग्रसर होता है। जबकि खण्डाकाव्य में केवल एक प्रमुख कथा रहती है, प्रासंगिक कथाओं को इसमें स्थान नहीं मिलने पाता है।

विशेषताएं एवं गुण

  1. खण्डकाव्य में जीवन के जिस भाग का वर्णन किया गया हो वह अपने लक्ष्य में पूर्ण होना चाहिए।
  2. खण्ड काव्य में प्राकृतिक दृश्य आदि का चित्रण देश काल के अनुसार और संक्षिप्त होना चाहिए।
  3. खंडकाव्य में कथावस्तु काल्पनिक होना चाहिए।
  4. इसकी कथावस्तु छोटी होती है, इसमें उपकथाएं, प्रसंग आदि नहीं होने चाहिए।
  5. खंड काव्य में सात या सात से कम सर्ग होंना चाहिए।
  6. खंडकाव्य में कई प्रकार के छंदों का प्रयोग नहीं होता है, या कम होता है।
  7. खंड काव्य में किसी एक रस की ही प्रधानता होती है। अन्य रस प्रधान रस के भागस्वरूप में प्रयुक्त हो सकते हैं।
  8. इसमें विस्तार की स्वतंत्रता नहीं होती है फिर भी आरंभ, मध्य और अंत में पूर्णता होनी चाहिए।

काव्य में “सत्यं शिवं सुंदरम्” की भावना भी निहित होती है।

काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।

भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है।

महाकाव्य में किसी ऐतिहासिक या पौराणिक महापुरुष की संपूर्ण जीवन कथा का आद्योपांत वर्णन होता है। जैसे – पद्मावत, रामचरितमानस, कामायनी, साकेत आदि महाकाव्य हैं।

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