संदेह और भ्रांतिमान अलंकार युग्म में अंतर

Sandeh Aur Bhrantiman Alankar Me Antar
संदेह और भ्रांतिमान अलंकार युग्म में अंतर

संदेह और भ्रांतिमान

जहां समानता के कारण अनिश्चय की स्थिति बनी रहती है वहां सन्देह अलंकार होता है। यथा-

कैघों व्योम बीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु
वीर रस वीर तरवारि सी उघारी है।

हनुमान की जलती हुई पूंछ को देखकर ऐसा लगता है था मानो आकाश मार्ग में अनेक धूमकेतु हैं या ऐसा लगता था मानो वीररस रूपी वीर ने अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाली है जो चारों और चमक रही है।

भ्रान्तिमान अलंकार में समानता के कारण एक वस्तु में दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाता है यथा-

नाक का मोती अधर की कान्ति से
बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से।
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है।
सोचता है अन्य शुक यह कौन है?

उर्मिला की नासिका की नथ का मोती अधरों की लालिमा से अनारदाने की भांति लग रहा है। उसे अनार का बीज समझकर यह तोता यह सोच रहा है कि यह नासिका रूपी तोते की चोंच में अनार का दाना है। इसीलिए यह पिंजरे का तोता सोच रहा है कि यह दूसरा तोता कौन सा है।

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