चंद्रशेखर आज़ाद (Chandra Shekhar Azad) का संक्षिप्त परिचय | |
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पूरा नाम | चंद्रशेखर तिवारी (चंद्रशेखर आज़ाद) |
जन्म तिथि | 23 जुलाई 1906 |
जन्म स्थान | भाबरा, अलीराजपुर (आज़ादनगर), इंदौर, मध्य प्रदेश |
पिता का नाम | सीताराम तिवारी |
माता का नाम | जगरानी देवी |
प्रमुख संगठन | हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA), हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) |
स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश | 1921 में असहयोग आंदोलन से |
प्रसिद्ध घटनाएँ | काकोरी कांड (1925), सांडर्स हत्या (1928), दिल्ली असेंबली बम कांड (1929) |
मुख्य सहयोगी | भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ |
नारा | “हम आज़ाद थे, आज़ाद हैं और आज़ाद ही रहेंगे।” |
मृत्यु तिथि | 27 फरवरी 1931 |
मृत्यु स्थान | एल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) |
मृत्यु का कारण | स्वयं को गोली मारकर बलिदान |
चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन परिचय
चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को भाबरा (अब मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले में) हुआ था। उनका वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी था। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी थीं। उनका बचपन ग्रामीण वातावरण में बीता, लेकिन उनके माता-पिता उन्हें पढ़ा-लिखाकर एक विद्वान बनाना चाहते थे। उन्होंने शिक्षा के लिए बनारस का रुख किया, जहां उनका झुकाव स्वतंत्रता संग्राम की ओर हुआ।
स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश
1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड ने चंद्रशेखर के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति आक्रोश जगा दिया। इस घटना से प्रभावित होकर वे महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन (1921) में शामिल हो गए। आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। जब अदालत में उनका परिचय पूछा गया, तो उन्होंने अपना नाम “आज़ाद”, पिता का नाम “स्वतंत्रता” और निवास स्थान “जेल” बताया। उनकी इस निर्भीक घोषणा ने ब्रिटिश अधिकारियों को स्तब्ध कर दिया और तभी से वे “चंद्रशेखर आज़ाद” के नाम से प्रसिद्ध हो गए। उनका मानना था कि “हम आज़ाद थे, आज़ाद हैं और आज़ाद ही रहेंगे।”
क्रांतिकारी गतिविधियाँ
महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन (1922) वापस लिए जाने के बाद, चंद्रशेखर आज़ाद का झुकाव क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर बढ़ गया। वे रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल हो गए, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था। बाद में संगठन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) कर दिया गया।
प्रमुख क्रांतिकारी घटनाएँ:
- काकोरी कांड (1925) – चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार का खजाना लूटने की योजना में शामिल हुए। यह क्रांति की दिशा में एक बड़ी घटना थी।
- साइमन कमीशन विरोध (1928) – लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद, उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर ब्रिटिश अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या की योजना बनाई।
- दिल्ली असेंबली बम कांड (1929) – भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा असेंबली में बम फेंकने की योजना का समर्थन किया और संगठन के लिए हथियार व धन जुटाने का कार्य किया।
- गुप्त योजनाओं का संचालन – चंद्रशेखर आज़ाद ने संगठन को मजबूत करने के लिए झांसी, कानपुर, बनारस और इलाहाबाद में कई गुप्त ठिकाने बनाए।
काकोरी कांड (1925)
असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद, क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन की आवश्यकता महसूस की गई। इसी उद्देश्य से, HRA के नेताओं ने सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई।
9 अगस्त 1925 को, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेंद्र लाहिड़ी और चंद्रशेखर आज़ाद सहित कई क्रांतिकारियों ने काकोरी ट्रेन डकैती को अंजाम दिया। यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक बड़ी क्रांतिकारी घटना थी। इस घटना के बाद कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें फाँसी दे दी गई, लेकिन आज़ाद बच निकले।
काकोरी कांड ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा दी और युवाओं में देशभक्ति की भावना को प्रज्वलित किया।
भगत सिंह और एचएसआरए
1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए, आज़ाद ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के साथ मिलकर सांडर्स की हत्या की योजना बनाई। उन्होंने पुलिस अधीक्षक जेपी सांडर्स को गोली मारकर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी।
क्रांतिकारी योजनाएँ और संघर्ष
चंद्रशेखर आज़ाद ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। उन्होंने इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में गुप्त बैठकें कीं और नए क्रांतिकारियों को प्रशिक्षित किया। वे क्रांति के लिए हथियार जुटाने और धन संग्रह करने में लगे रहे।
बलिदान (27 फरवरी 1931)
27 फरवरी 1931 को एक मुखबिर की सूचना पर ब्रिटिश पुलिस ने एल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में उन्हें घेर लिया। जब तक संभव था, वे दुश्मनों से लड़ते रहे, लेकिन जब उनके पास अंतिम गोली बची, तो उन्होंने खुद को गोली मारकर बलिदान दे दिया, ताकि वे अंग्रेजों के हाथों पकड़े न जा सकें।
चंद्रशेखर आज़ाद की विरासत
- उनकी शहादत के बाद एल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आज़ाद पार्क रख दिया गया।
- उनका जीवन भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा बना।
- स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को अमर बलिदान के रूप में याद किया जाता है।
चंद्रशेखर आज़ाद का विशेष योगदान:
- क्रांतिकारी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को संगठित किया।
- युवाओं में देशभक्ति की भावना को प्रज्वलित किया।
चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य:
- गिरफ्तारी के दौरान अदालत में अपना नाम “आज़ाद”, पिता का नाम “स्वतंत्रता” और निवास स्थान “जेल” बताया।
- अंग्रेजों से घिरने पर आत्मसमर्पण के बजाय खुद को गोली मारकर शहीद हो गए।
- उनके सम्मान में इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क का नाम चंद्रशेखर आज़ाद पार्क रखा गया।
चंद्रशेखर आज़ाद शहीद दिवस (स्मृति दिवस)
चंद्रशेखर आज़ाद शहीद दिवस हर वर्ष 27 फरवरी को मनाया जाता है। इस दिन 1931 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के एल्फ्रेड पार्क में उन्होंने अंग्रेजों से घिर जाने के बाद खुद को गोली मारकर बलिदान दिया था। वे सशस्त्र क्रांति के प्रबल समर्थक थे और भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों के सहयोगी थे। उनके अदम्य साहस और बलिदान को सम्मान देने के लिए एल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आज़ाद पार्क रखा गया। इस दिन देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके देशभक्ति के आदर्शों को याद किया जाता है।
चंद्रशेखर आज़ाद जयंती
चंद्रशेखर आज़ाद जयंती हर वर्ष 23 जुलाई को मनाई जाती है, जो महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद की जन्म तिथि है। उनका जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा (वर्तमान में आज़ादनगर) में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानी थे, जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस अवसर पर, देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण, देशभक्ति गीतों का प्रस्तुतीकरण, और युवाओं के लिए प्रेरणास्पद व्याख्यान शामिल हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य नई पीढ़ी को चंद्रशेखर आज़ाद के आदर्शों और देशभक्ति की भावना से अवगत कराना है।
चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन संघर्ष, साहस और समर्पण का प्रतीक है। उनकी जयंती हमें स्वतंत्रता संग्राम के उन वीर नायकों की याद दिलाती है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आज़ादी दिलाई।
उनकी जयंती पर, हम सभी को उनके आदर्शों का अनुसरण करते हुए देश की एकता, अखंडता और समृद्धि के लिए कार्य करने का संकल्प लेना चाहिए।
चंद्रशेखर आजाद के प्रेरणादायक कोट्स
“अगर आपके लहू में रोष नहीं है, तो ये पानी है जो आपकी रगों में बह रहा है। ऐसी जवानी का क्या फायदा यदि वो मातृभूमि के काम ना आए।” ~ चंद्रशेखर आजाद
“दूसरों को खुद से आगे बढ़ते हुए मत देखो। प्रतिदिन अपने खुद के कीर्तिमान तोड़ो, क्योंकि सफलता आपकी अपने आप से एक लड़ाई है।” ~ चंद्रशेखर आजाद
“दुश्मनों की गोलियों का हम सामना करेंगे, आज़ाद हैं, आज़ाद ही रहेंगे।” ~ चंद्रशेखर आजाद
“मैं अपने संपूर्ण जीवन की अंतिम सांस तक देश के लिए शत्रु से लड़ता रहूंगा।” ~ चंद्रशेखर आजाद
“दूसरों को खुद से आगे बढ़ते हुए मत देखो। प्रतिदिन अपने खुद के कीर्तिमान तोड़ो, क्योंकि सफलता आपकी अपने आप से एक लड़ाई है।” ~ चंद्रशेखर आजाद
“चिंगारी आजादी की सुलगती मेरे जिस्म में हैं। इंकलाब की ज्वालाएं लिपटी मेरे बदन में हैं। मौत जहां जन्नत हो यह बात मेरे वतन में है। कुर्बानी का जज्बा जिंदा मेरे कफन में है।” ~ चंद्रशेखर आजाद
निष्कर्ष
चंद्रशेखर आज़ाद भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन का बलिदान देने वाले महान क्रांतिकारी थे। उनका साहस, देशभक्ति और आत्मसम्मान हमेशा भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा बना रहेगा।