रासो काव्य (चारणी साहित्य): अर्थ, प्रमुख ग्रन्थ, विशेषताएँ और इतिहास

Raso Kavya or Charani Sahitya

रासो काव्य (Raso Kavya) जिसे चारणी साहित्य या वीर काव्य या देशीभाषा काव्य और रासो साहित्य (Raso Sahitya) भी कहा जाता है, की रचना हिन्दी साहित्य के इतिहास के आरंभिक काल ‘आदिकाल‘ में हुई थी, जिसका काल 8 वीं शताब्दी से माना जाता है। अधिकांश रासो काव्य 10वीं शताब्दी के बाद ही रचा गया है।  चारणी या रासो साहित्य मूलत: सामन्ती व्यवस्था, प्रकृति और संस्कार से उपजा हुआ साहित्य है जिसका मुख्य स्वर वीरगाथात्मकता का रहा है। रासो काव्य के अधिकांश रचनाकार हिन्दू राजपूत राजाओं के सानिध्य में रहने वाले चारण या भाट थे।

रासो काव्य / चारणी साहित्य / वीर काव्य / देशीभाषा काव्य का इतिहास

हिन्दी साहित्य के आरम्भिक काल में प्राप्त ग्रन्थों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि “आदिकाल” के अधिकांश ग्रन्थों में ‘रासो‘ शब्द नाम के अन्त में जुडा हुआ है, जो ‘काव्य‘ शब्द का पर्यायवाची है। ‘रासो’ शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है।

प्रथम फ्रेंच इतिहासकार “गार्सा द तासी” ने इस शब्द की व्युत्पत्ति ‘राजसूय यज्ञ’ से मानी है। आ. रामचन्द्र शुक्ल इस शब्द की व्युत्पत्ति ‘रसायण’ से मानते है। उनका कहना है कि- ‘कुछ लोग इस शब्द का सम्बन्ध ‘रहस्य’ से जोडते है। पर ‘बीसलदेव रासो’ में काव्य के अर्थ में ‘रसायण’ शब्द बार-बार आया है। अतः हमारी समझ में इसी ‘रसायण’ शब्द से होते होते ‘रासो’ हो गया है।

डॉ. मोतीलाल मेनरिया ने इस शब्द का सम्बन्ध ‘रहस्य’ से माना है। श्री नरोत्तम स्वामी इस शब्द की व्युत्पत्ति ‘रसिक’ से मानते है। प्राचीन राजस्थानी में ‘रसिक’ का अर्थ- कथा-काव्य माना जाता था। यही शब्द क्रमश: ‘रासउ’, और ‘रासो’ हो गया। यह मत हमें सत्य के काफी नजदीक पहुँचा देता है। प्रधान रुप से कथा-ग्रन्थों के लिए ही ‘रासा’, ‘रासक’, ’रासो’ शब्द का प्रयोग होता आया है।

कुछ विद्वान इस शब्द का सम्बन्ध ‘रास‘ या ‘रासक‘ से जोडते हुए इसका अर्थ-ध्वनि, क्रीडा, विलास, नृत्य, गर्जन और श्रृन्खला आदि देते है।

आ. हजारीप्रसाद द्विवेदी रासक को एक शब्द भी मानते हैं और काव्य-भेद भी। उनके अनुसार जो काव्य रासक छन्द में लिखे जाते थे, वे ही हिन्दी में ‘रासो’ कहलाने लगे।

ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल की कविता के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के छन्दों का प्रयोग हुआ करता था। ये काव्य चरित्रप्रधान है। इन चरित्रों को काव्य में बाँधने के लिए ही इस छन्द का प्रयोग होता रहा है।

वस्तुतः रासो काव्य मूलतः रासक छन्द का समुच्चय है। अपभ्रंश में उनतीस मात्रा का एक रासा या रास छन्द प्रचालित था। ऐसे अनेक छन्दों के गान की परम्परा कदाचित लोकगीतों में रही होगी। एकरसता न रहे, इसलिए बीच बीच में दूसरे छन्द जोडने और गाने की प्रथा भी उस समय से चली होगी। ‘ सन्देशरासक‘ इसका सुन्दर नमूना है।

पहले रासो काव्य छन्द में लिखे गये। कालान्तर में इनमें बदलाव आया होगा जिनके फलस्वरुप गेय मुक्तक छन्दों का उपभोग किया जाने लगा। ‘बीसलदेव रासो‘ एक ऐसा ही प्रेम प्रधान काव्य है जिसमें रासकेतर छन्द का प्रयोग हुआ है।

आगे चलकर काव्य का यह रूप कोमल भावनाओं के अतिरिक्त अन्य भावों की अभिव्यक्ति का वाहक बना। प्रेम भाव के साथ इनमें वीरों की गाथात्मक चेतनाओं को स्थान मिला। इस तरह इस काल के रासो काव्य में एक साथ विरोचित और श्रृंगारोचित भावनाओं के वर्णन सुलभतापूर्वक मिल जाते है।

रासो साहित्य मूलत: सामंती व्यवस्था, प्रकृति और संस्कार से उपजा हुआ साहित्य है, जिसे ‘देशीभाषा काव्य‘ के नाम से भी जाना जाता है। इस साहित्य के रचनाकार हिन्दू राजपूत राजाश्रय में रहनेवाले “चारण या भाट” थे। समाज में उनका स्थान और सम्मान था, क्योंकि उनका जुडाव सीधे राजा से होता था।

ये चारण या भाट कलापारखी और कलारचना में निपुण होते थे। ये कुशलता से युध्द करना भी जानते थे और युध्द शुरु होने पर अपनी सेना की अगुवाई विरुदावली गा-गाकर किया करते थे। ये राजाओं, आश्रयदाताओं, वीर पुरुषों तथा सैनिकों के वीरोचित युध्द घटनाओं को केवल बढ़ा चढाकर ही नहीं, उसकी यथार्थपरक स्थितियों एवं सन्दर्भों को भी बारीकी के साथ चित्रित करते थे।

वीरोचित भावनाओं के वर्णन के लिए इन्होंने ‘रासक या रासो छन्द’ का प्रयोग किया था, क्योंकि यह छन्द इस भावना को सम्प्रेषित करने के लिए अनुकूल था। इसलिए इनके द्वारा रचित काव्य को ‘रासो काव्य‘ कहा गया।

रचनाएं: प्रमुख रासो ग्रन्थ

रासो साहित्य या रासो काव्य या चारणी साहित्य या वीर काव्य या देशीभाषा काव्य परम्परा के प्रतिनिधि ग्रन्थ इस प्रकार है-

  1. परमाल रासो
  2. खुमान रासो
  3. हम्मीर रासो
  4. विजयपाल रासो
  5. बीसलदेव रासो
  6. पृथ्वीराज रासो

1. परमाल रासो / आल्हाखण्ड (जगनिक)

रासो काव्य परम्परा की सबसे प्रमुख कृति के रूप में ‘परमाल रासो‘ का नाम लिया जाता है। इसे ‘आल्हाखण्ड‘ भी कहते है । आ. रामचन्द्र शुक्ल ने इसे ‘बैलेड’ तथा डॉ. रामकुमार वर्मा ने इसे ‘वीरगाथा‘ काव्य कहा है। कुछ विद्वान इसे ‘विकसनशील लोक महाकाव्य‘ मानते है। इसकी जनता में अत्यधिक लोकप्रियता को देख डॉ. ग्रियर्सन ने इसे वर्तमान युग का “सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य” माना था। अभी तक इसकी प्रामाणिक प्रति उपलब्ध नहीं हुई है।

परमाल रासो के रचयिता जगनिक है, जो महोबा के नरेश परमर्दि देव वे आश्रित थे। रचनाकार ने इस काव्य में महोबा देश के दो लोक प्रसिध्द वीरों- आल्हा और ऊदल के वीर चरित्र को यथार्थ ढंग से प्रस्तुत किया है। इनके द्वारा किये गये विभिन्न युध्दों का बडी उत्तेजक भाषा में वर्णन इस ग्रन्थ की विशेषता है।

इसमें आल्हा छन्द (वीर छन्द) का प्रयोग हुआ है। इसकी भाषा बैसवाडी है । यह काव्य शिक्षित समाज की अपेक्षा अशिक्षित या अर्द्ध-शिक्षित समाज में ही अधिक लोकप्रिय रहा है। यह सदैव गायकों की परम्परा द्वारा ही विकसित होता रहा है। यह एक गेय-काव्य है। इसकी मूल प्रेरणा वैयक्तिक वीर भावना, स्वाभिमान, दर्द और साहसपूर्ण भावों का वर्णन करने की रही है –

बारह बरिस है कूकुर जिएँ, औ तेरह लै जिएँ सियार ।
बरिस अठारह छत्री जिएँ, आगे जीवन को धिक्कार।।
सदा तरैया न बन फूलै, मारो सदा न सावन होय ।
स्वर्ग मडैया सब काहूँ को, यारो सदा न जीवै कोय।।

2. खुमान रासो (दलपति विजय)

रासो काव्य परम्परा की प्रारम्भिक रचनाओं में ‘खुमानरासो’ का स्थान भी सर्वोपरि है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख शिवसिंह सेंगर की कृति ‘शिवसिंह सरोज’ में मिलता है। इसके रचयिता “दलपति विजय” हैं।

आ. रामचन्द्र शुक्ल इसको नवीं शताब्दी (सन् ८१२ ई.) की रचना मानते हैं। इसमें राजस्थान के चितौड नरेश खुमन (खुम्माण) द्वितीय के युध्दों का सजीव वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ भी प्रामाणिक हस्तलिखित प्रति पूना-संग्रहालय में सुरक्षित है।

खुमान रासो ‘पाँच हजार’ छन्दों का एक विशाल ग्रन्थ हैं। इसमें समकालीन राजाओं के आपसी विवादों के बाद हुए एकता के साथ अब्बासिया वंश आलमामूं खलीफा और खुमाण के साथ हुए युध्द का चित्रण मिलता है। इस कृति का प्रमुख प्रतिपाद्य राजा खुमान का चरित्रान्कन करना है उनके चरित्र के प्रस्थानबिन्दु हैं – एक युध्द और दूसरा प्रेम।

खुमान के प्रेम को दर्शाने के लिए ही कृतिकार ने विवाह, नायिका भेद, षट्ऋतुवर्णन का विस्तृत वर्णन किया है जो रमणीय है। अन्य रासो ग्रन्थों के समान इसमें भी शृंगार और वीर रस, दोनों रस प्रधान रहे हैं। इसमें दोहा, सवैया, कवित्त आदि विविध छन्दों का सुचाख प्रयोग हुआ है।

इसकी भाषा राजस्थानी हिन्दी रही है काव्य सौन्दर्य भाषाशैली की दृष्टिसें यह एक सरल और सफल काव्य माना जाता है। इसकी सरस,सरल भाषा शैली का उदाहरण दृष्टव्य है-

पिउ चितौड न आविऊ, सावण पहली तीज ।
जोवै वाट विरहीणी, खिण खण अणवै खीज ।।
सन्देसो पिउ साहिबा, पाछो फिरिय न देह।
पंछी घाल्या पिंजरें, छूटण रो सन्देह।।

3. हम्मीर रासो (शार्डग:धर)

‘हम्मीर रासो’ अभी तक एक स्वतंत्र कृति के रुप में उपलब्ध नहीं हो सका है। अपभ्रंश के ‘प्राकृत पैंगलम्’ नामक एक संग्रह ग्रन्थ में संग्रहीत हम्मीर विषयक 8 छन्दों को देखा गया है।

शुक्लजी ने इसे एक स्वतंत्र ग्रन्थ मान लिया था। प्रचलित धारणा के अनुसार इस कृति के रचयिता शार्डग:धर माने जाते है। परन्तु कुछ पदों में ‘जज्जल भणह’ वाक्यांश देखे गए हैं। पं. राहुल सांकृत्यायन ने इसमें जज्जल नामक किसी कवि की रचना माना है।

आ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का कहना है कि ‘प्राकृत पैंगलम्’ की टीका में भी इन्हें जज्जल की ही उक्ति माना गया है; अतः इसके रचयिता शार्डग:धर न होकर जज्जल है।

इसमें कवि ने हम्मीर देव और अल्लाउद्दीन के युध्द का वर्णन किया गया है। इसका रचनाकाल १३ वीं शती माना जाता है, क्योंकि हम्मीर देव सन् १३०० ई. में अल्लाउद्दीन की चढाई में मारे गये थे। इस कृति का उद्देश्य हम्मीर देव की वीरता का वर्णन करना है।

4. विजयपाल रासो (नल्हसिंह भाट)

मिश्रबन्धुओं ने अपने ग्रन्थ ‘मिश्रबन्धु विनोद’ में इस परम्परा की एक रचना ‘विजयपाल रासो’ का उल्लेख किया है। इसके रचयिता नल्हसिंह भाट माने जाते है। इसका रचनाकाल सन् 1298 ई. माना जाता है।

डॉ. राजनाथ शर्मा के अनुसार इस कृति में विजयपाल सिंह और बंग राजा के युध्द का वर्णन किया गया है। डॉ. राजबली पाण्डेय के अनुसार इस रचना में रचनाकार ने राजा विजयपाल सिंह और बंग राजा के बीच हुए युध्दों को सजीव रूप में चित्रित किया है। इस कृति में केवल 42 छन्द ही उपलब्ध है।

5. बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह)

‘बीसलदेव रासो’ इस काव्य परम्परा की पाँचवी कृति है। इसकी रचना- “बारह से बरोत्तरा मंझारि, जेठ बदी नवमी बुधिवारी” के अनुसार जेष्ठ वदी नवमी, दिन बुधवार सन् 1155 ई. (संवत 1212 ) में हुई थी।

बीसलदेव रासो के रचयिता नरपति नाल्ह माने जाते हैं, जो अजमेर के चौहाण राजा बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) के समकालीन थे। इसमें अजमेर नरेश विग्रहराज, उपनाम बीसलदेव और उनकी पत्नी, राजा भोज की पुत्री राजमती के विवाह, कलह, विरह और मिलन के मार्मिक चित्र अंकित किये गये है।

इस ग्रन्थ की सबसे निराली विशेषता यह है कि यह हिन्दी के अन्य रासों ग्रन्थों के समान वीरता का प्रशस्तिगायन न होकर कोमल प्रेम के मधुर, मार्मिक और संवेदनशील रुप का अमर चित्र है। विप्रलम्भ-शृंगार इसका प्रधान वर्ण्य विषय है। चार खण्डों में विभाजित सवा सौ छन्दों का यह छोटा सा काव्य प्रणय सम्वेदना का द्रवणशील, हृदयग्राही रुप प्रस्तुत करता है।

  1. इसके प्रथम खण्ड में बीसलदेव और मालवा के भोज परमार की कन्या राजमती का विवाह वर्णन,
  2. दूसरे खण्ड में बीसलदेव का रानी से रुढकर उडिसा जाना तथा वहाँ बारह वर्षों तक रहना,
  3. तीसरे खण्ड में राजमती का विरह वर्णन तथा बीसलदेव का उडीसा से लौटना और
  4. चौथे खण्ड में भोज का अपनी पुत्री को अपने घर ले आने की कथा तथा बीसलदेव का उसे पुन: चित्तौड लौटा लाने का प्रसंग वर्णित है।

यह सारी कथा ललित मुक्तकों में कही गई है।

‘सन्देश रासक’ की भाँति बीसलदेव रासो भी मुख्यतः विरह काव्य है। यह ग्रन्थ विरह के स्वाभाविक चित्र, संयोग और विप्रलम्भ श्रन्गार की सफल उद्भावना और साथ ही प्रकृति के रुप चित्रों से परिपूर्ण है। इस ग्रन्थ की सबसे बडी विशेषता यह है कि विविध घटनाओं के वर्णनों के होते हुए भी इस काव्य में इतिवृत्तात्मकता नहीं है । नायिका राजमती का चरित्र बडा ही सजीव तथा विलक्षण बन पड़ा है।

मध्य युग के समूचे हिंदी साहित्य में जबान की इतनी तेज और मन की इतनी खरी नायिका नहीं दीख पडती है। राजा बीसलदेव ने एक दिन राजकीय अभिमान की रौ में कहा कि मेरे समान दूसरा भूपाल नहीं। रानी राजमती से यह मिथ्याभिमान न सहा गया। उसने कहा कि उडीसा का राजा तुमसे धनी है। जिस प्रकार तुम्हारे राज्य में नमक निकलता है, उसी तरह उसके घर में हीरे की खानों से हीरा निकलता है। राजा इस पर जल-भून गया और रुट गया तथा रानी के लाख अनुनय-विनय करने पर भी उडिसा निकल गया। राजमती जबान की तेज है तो क्या हुआ, आखिर है तो नारी ही । विरह से उसका हृदय वीदीर्ण हो जाता है, उसे अपने स्त्री-जीवन पर रोना आता है। महेश (परमेश्वर) को उलाहना देती हुई वह कहती है कि-

अस्त्रीय जनम काई दीघउ महेश
अवर जनम धारइ घना रे नरेश, रानि न सिरजीय रोझडी,
घन सिरजीयधलिय गाई ।

अर्थात स्त्री का जन्म तुमने क्यों दिया? देने के लिये तो तुम्हारे पास और भी अनेक जन्म थे। राजराणी का जन्म न देकर यदि वन खण्ड की काली कोयल भी बनाया होता तो आम और चम्पा की डाली पर तो बैठती, अंगूर और बीजोरी के फल तो खाती।

वास्तव में राजमती का यह कथन वासनाभिभूत मध्ययुगीन पुरुष के स्वार्थ और उसकी अति कामुमतामयी रसीकता की शिकार बनी हुई मध्ययुगीन नारी की आत्मा का करूण क्रन्दन एवं चीत्कार है। राजमती की आत्मा विद्रोहिणी, मन अभिमानी और जबान प्रखर है।

बारह वर्ष के पश्चात् राजा के वापस लौटने पर रानी की कैची जैसी जबान ने फिर बार कर दिया, उसने राजा को ताना मार ही दिया कि – ‘स्वामी घी विणाजे यह नइ जीतियड तेल’। अर्थात् हे स्वामी! तुमने वाणिज्य तो घी का जरुर किया किन्तु स्वयं खाया तेल ही।

राजमती के कहने का तात्पर्य है कि इतनी सुन्दर नारी से विवाह तो किया, किन्तु उसके उपयोग करने का सौभाग्य तुम्हें न मिल सका। अभिव्यक्ति की ताजगी और भावों की तीव्रता के कारण बीसलदेव रासो लोकजीवन के रंग में अधिक रंगा हुआ है। राजमती के वियोग वर्णन के लिए कवि जो बारहमासा दिया है वह अपने ढंग का अकेला है।

6. पृथ्वीराज रासो (चंदवरदाई)

रासो काव्य परम्परा का सर्वश्रेष्ठ एवं प्रतिनिधि ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो है । आ. शुक्लजी ने इसे “हिन्दी का प्रथम महाकाव्य” और इसके रचयिता चंदवरदाई को “हिन्दी का प्रथम कवि” माना है।

चंदवरदाई दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सामंत सलाहकार, मित्र और राज कवि थे। इनके विषय में प्रसिध्द है कि पृथ्वीराज और चंदवरदाई दोनों का जन्म एक ही दिन और मृत्यु भी एक ही दिन हुई थी।

कवि चंदवरदाई के चार पुत्र थे, जिनमें से चतुर्थ पुत्र जल्हण था। जिस समय पृथ्वीराज को मुहम्मद गौरी बन्दी बनाकर गजनी ले गया तो उस समय चन्दवरदाई भी उसके पीछे गए और अपने पुत्र जल्हण को अपनी अधूरी रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ सौंप गए थे। बाद में जल्हण ने इस पूरा किया था। इस सम्बन्ध में यह उक्ति प्रसिध्द है-

पुस्तक जल्हण हाथ दै, चलि गज्जन नृप काज।

पृथ्वीराज रासो के बृहत, मध्यम, लघु और लघुतम चार संस्करण प्रसिध्द है। इन चारों संस्करणों को देखकर पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को लेकर विद्वानों के तीन वर्ग है।

  1. विद्वानों का एक वर्ग पृथ्वीराज रासो को पूर्णतया जाली एवं अप्रामाणिक मानने वालों का है जिसमें डॉ. बूलर, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, मुंशी देवीप्रसाद, आ. रामचन्द्र शुक्ल आदि विद्वान प्रमुख है।
  2. दूसरा वर्ग पृथ्वीराज रासो को प्रामाणिक रचना मानने वाले विद्वानों का है। इस वर्ग में डॉ. श्यामसुन्दरदास, मोहनलाल विष्णुलाल पंडया, मिश्र बन्धु, कर्नल टाड आदि विद्वान आते है।
  3. विद्वानों का तीसरा वर्ग पृथ्वीराज रासो को अर्द्धप्रामाणिक रचना मानने वालों का है। इस वर्ग में आ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी आदि. विद्वान है।

पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता भले ही संदिग्ध हो, परंतु काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से यह बेजोड है। इसे महाभारत के समान विकसनशील महाकाव्य माना जाता है। रस की दृष्टि से इसमें श्रृंगार और वीर रस दोनों का सुन्दर परिपाक हुआ है। ये दोनों रस पृथ्वीराज चौहाण के व्यक्तित्व के दो पहलुओं को उद्घाटित करते है ।

वीर और श्रृंगार रस दोनों रसों की पृष्ठभूमि में नारी है। उसे पाने के लिए युध्द होते है और पा लेने पर जीवन का विलास पक्ष अपनी पूरी रमणीयता के साथ उभरता है। युध्द वर्णन में जहाँ कवि ने शौर्य एवं वीरता के प्रदर्शन में अपनी कलम की शक्ति दिखाई है वहाँ श्रृन्गार रस के सरस वर्णनों में भी अपनी अद्भूत कल्पना-शक्ति का परिचय दिया है।

वीर रस का वर्णन हो अथवा श्रृंगार रस का, कवि ने नैतिकता की सीमा का उल्लंघन नहीं किया है, जिससे दोनों रसों का निर्वाह संतुलित एवं सात्विक हुआ है। शहाबुद्दीन की सेना के साथ हुए पृथ्वीराज के युध्द का वर्णन करते हुए कवि पृथ्वीराज के युध्द- कौशल की विशेषता बताते हुए कहते है-

थकि रहे सूर कौतिक गिगन, रगन मगन भई श्रोन धर ।
हदि हरणे वीर जग्गे हुलस, हुरेड रंगि नवरत्त वर।।

अर्थात् पृथ्वीराज चौहान के युध्द, कौशल एवं वीरता को देखकर सूर्य भी स्तंभित होकर ठहर गया। इस युध्द में हुए नरसंहार से सारी धरती रक्त से भर गई। ऐसे युध्द को देखकर वीर योध्दा उल्लास से भर उठे तथा उनके चेहरों पर प्रसन्नता से रक्त लालिमा छा गई।

इच्छिनी, संयोगिता और शशिव्रता के विवाह प्रसंगों में, नायिका के सौन्दर्य- वर्णन में, विवाहोपरान्त प्रथम रति के दृश्यों में शृंगार रस का सरस वर्णन कवि ने किया है। कवि ने इच्छिनी की सौन्दर्य शोभा का, प्रथम समागम की उमंग के साथ ही भय, कंपन आदि का बडा सुन्दर वर्णन किया है। वह सर्वांग में काम की तरंग के रहते हुए भी प्रथम केलि के समय ऐसे काँपती है, जैसे मंद वायु के हलके झकोरे से लता-

हल हलै लता कछु मंद वाय,
नव वधू केलि भय कंप पाय ।
उपमा उर कव्वि कहिय तांम,
जुव्वन तरंग अंगि अंगि काम।।

वीर और श्रृंगार रस के अतिरिक्त अन्य रसों करुण, रौद्र, बीभत्स आदि की भी सम्यक योजना की है। पृथ्वीराज जब शशिव्रता को खींचकर घोडे की पीठ पर बैठा लेता है, तो उस समय प्रतिरोध के कारण पृथ्वीराज में रौद्र, शशिव्रता में करुण, सामन्तों में वीर, सखियों में हास्य, शत्रुओं में वीभत्स और कमधज्ज वीरचन्द में भयानक रस एक साथ दिखाई पडते है।

वस्तु-वर्णन की दृष्टि से भी रासो का सौन्दर्य अतुलनीय है। इसमें नगर, उपवन, वन, सेना, युध्द के वर्णनों के अतिरिक्त ऋतुवर्णन, नख – शिख सौन्दर्य वर्णन भी अति सरस है। पृथ्वीराज रासो में युध्द वर्णन के लिए डिंगल भाषा तथा श्रुन्गार वर्णनों में पिंगल भाषा का प्रयोग हुआ है । रासो काव्य परम्परा में यह एक अद्वितीय काव्य है और आदिकालीन काव्य की प्रवृत्तियों का विवेचन मुख्यत: इस काव्य को आधार बनाकर ही किया जाता है जिससे इसका महत्व स्वतः सिध्द हो जाता है।

रासो साहित्य या रासो काव्य की सामान्य विशेषताएँ

रासो साहित्य मूलत: सामन्ती व्यवस्था, प्रकृति और संस्कार से उपजा हुआ साहित्य है जिसका मुख्य स्वर वीरत्व का रहा है। इस साहित्य के रचनाकार हिन्दू राजपूत राजाश्रय में रहने वाले चारण या भाट थे। समाज में उनका स्थान सम्मान का था, क्योंकि उनका जुडाव सीधे राजा से होता था। ये चारण या भाट कलापारखी और कला – रचना में निपुण हो थे। ये युध्द कला भी जानते थे, जो युध्द होने पर अपनी सेना की अगुवाई विरुदावली गा-गाकर किया करते थे। ये राजाओं, आश्रयदाताओं, वीर पुरुषों तथा सैनिकों के वीरोचित युध्द घटनाओं को केवल बढा-चढाकर ही नहीं, उसकी यथार्थपरक स्थितिओं एवं सन्दर्भों को भी बारीकी के साथ चित्रित करते थे। वीरोचित भावनाओं के वर्णन के लिए इन्होंने “रासक या रासो’” छन्द का प्रयोग किया था, क्योंकि यह छन्द इस भावना को सम्प्रेषित करने के लिए अनुकूल था। इसीलिए इनके द्वारा रचित साहित्य को ‘रासो साहित्य’ कहा गया।

रासो साहित्य या रासो काव्य या चारणी साहित्य या वीर काव्य या देशीभाषा काव्य की सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार है:-

1. संदिग्ध रचनाएँ : इस काल में उपलब्ध होनेवाली प्रायः सभी रासो रचनाएँ ऐतिहासिकता की दृष्टि से संदिग्ध मानी जाती है। इस काल में रचित चार काव्य ग्रन्थ प्राप्त हुए हैं – ‘खुमान रासो’, ‘बिसलदेव रासो ‘पृथ्वीराज रासो’ तथा ‘परमाल रासो’ । भाषा शैली और विषय सामग्री की दृष्टि से इन ग्रन्थों के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि इनमें निरन्तर कई शताब्दियों तक परिवर्तन और परिवर्धन होते रहे हैं। यह परिवर्तन और परिवर्धन इतने प्रचुर मात्रा में हुए हैं कि इनका मूल्य रूप ही दब गया है। यह भी निश्चित नहीं कहा जा सकता कि ये ग्रन्थ आश्रयदाताओं के समय में ही लिखे गये हो ।

2. ऐतिहासिकता का अभाव : आदिकालीन रासो रचनाओं में इतिहास प्रसिध्द चरित्र नायकों को लिया गया है किन्तु उनका वर्णन युध्द इतिहास की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इन कवियों द्वारा दिये गए संवत् और तिथियाँ इतिहास से मेल नहीं रखती। इन काव्यों में इतिहास की अपेक्षा कल्पना का बाहुल्य है। इतिहास के विषय को लेकर चलनेवाले कवियों मे जो सावधनता अपेक्षित होती है, वह इन काव्य निर्माताओं में नही । इन कवियों ने इतिहास को अतिशयोक्ति और कल्पना पर नौछाकर कर दिया है। यहाँ तक कि पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज को उन राजाओं का भी विजयी माना गया है जो उनसे कही शताब्दियों पूर्व अथवा पश्चात विद्यमान थे।

3. युध्दों का सजीव वर्णन : युध्दों का सजीव वर्णन इन ग्रन्थों का प्रमुख विषय है और यह वर्णन इतना सजीव बन पड़ा है कि कदाचित संस्कृत साहित्य भी इस दिशा में इन काव्यों की ओड नहीं कर सकता। इन कवियों का युध्द वर्णन अत्यन्त सजीव बन पड़ा है, कारण चारण कवि केवल मसिजीवी ही नहीं था समय आने पर हाथ में तलवार लेकर लढना भी जानता था। दोनों ओर की सेनाओं को लढते समय युध्द में प्रयुक्त आक्रमण की रीतियों का जैसा सजीव चित्रण इस युग के कवियों ने किया है वैसा परिवर्ती कवियों में नहीं दिखाई देता। उनकी वीर रचनावली में शस्त्रों की झनकार स्पष्ट दिखाई पडती है और उनके युध्द वर्णन के सजीव चित्रण वीर हृदय में आज भी वीरता पैदा करते है। यह समय अंतरिक कलहो’ और बाहरी आक्रमणों का समय था, अत: अपने अपने आश्रयदाताओं को युध्द के लिए उत्तेजित करना इस काल के कवि का प्रमुख कर्तव्य – सा बन गया था।

4. युध्दों का मूल कनक, कामिनी और भूमि : वीरगाथा काल का अध्ययन करने के पश्चात् यह बात स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि इस युग में युध्द निरन्तर हुआ करने थे। युध्द के मूल में कनक, कामिनी अथवा भूमि में से कोई एक मुख्य कारण के रूप में कार्य करते हुए दिखाई देती है। अधिकतर नारियाँ ही युध्द का प्रमुख कारण हुआ करती थी। साथ ही साथ वीर गाथा काव्य में कुछ ऐसे भी नरेश थे जो अपना साम्राज्य विस्तार करना चाहते थे। कभी-कभी राजकाज चलाने के लिए धन की आवश्यकता पडती थी। तात्पर्य, युध्द के मूल में यह तीनों चीजें कार्यरत थी । रासो काव्य इसका प्रमाण है।

5. संकुचित राष्ट्रीयता : आदिकालीन राजा स्वयम् शुरवीर पौरुष से परिपूर्ण थे लेकिन उनमें संकुचित राष्ट्रीयता थी। उस समय के राजाओं ने अपने पचास सौ गाँवों को ही राष्ट्र समझ रख था, उनमें व्यापक राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था। अजमेर और दिल्ली के राजाओं को कन्नोज और कलिंग के समृध्द होने अथवा उजाड जाने पर कोई हर्ष या विषाद (दुःख) नहीं होता था। इसका प्रभाव इन चारण कवियों पर भी पड़ा था। इन कवियों ने जीविका प्राप्ति के लिए अपने आश्रयदाताओं की स्तुति मुक्त कंठ से की है। देशद्रोही जयचंद को भी देशप्रेमी कहलाने वाले वीर चारण उस समय थे। तात्पर्य यह है कि यदि उस समय राष्ट्र का अर्थ व्यापक रुप में लिया गया होता, तो निश्चित रुप से हमारे देश का मानचित्र आज कुछ और होता, पर उस समय के राजाओं ने इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। यह हमारे देश का महादुर्भाग्य था।

6. वीर और श्रृन्गार रस : इन रासो ग्रन्थों में वीर तथा श्रृगार रस का अद्भूत सम्मिश्रण है। उस समय युध्द का बाजार चारों ओर गर्म था। वीर रस का जितना सुन्दर परिपाक इस काव्य में मिलता है, उतना हिन्दी साहित्य के किसी भी काल में नही मिलता। उस समय की वीरता का आदर्श निम्न पंक्तियों में स्पष्ट होता है :

बारह बरस लै कुकर जिये और तेरह लै जिये सियार ।
बरस अठारह क्षत्री जिये आगे जीवन को धिक्कार ।।

आदिकालीन युध्दों का एकमात्र कारण नारी लिप्सा है। युध्दों का मूल कारण नारी को कल्पित किया गया है, अतः श्रृन्गार रस का भी इस साहित्य में जमकर सजीव वर्णन हुआ है।

7. नारी के वीर रुप का वर्णन : वीरगाथाकालीन कवियों ने नारी के वीर रुप का चित्रण किया है। उस जमाने में नारियाँ वीर पुरुष को पति अथवा पुत्र के रुप में पाना अपना सौभाग्य समझती थी। अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करते हुए वीरगति को प्राप्त करने वाले अपने पति का समाचार प्राप्त करके (पाकर) राजपूत रमणियाँ प्रसन्नता का अनुभव करती थी। नारी अपने पति को हर रुप से वीर रुप में देखनेके लिये आतुर रहती थी। वह यह नहीं चाहती थी कि उसका पति युध्द भूमि से मुँह मोड कर पराजय को स्वीकार कर के वापस आए। ऐसा होने पर वह खुद को लज्जित समझती थी। वीरगाथाकालीन नारी का वीर रुप निम्न पंक्तियों में स्पष्ट हो जाता है –

भल्ला हुआ जूँ मारिया बहिनि हवारा कंतु,
लज्जेजं तु वयांसिअहु जै भग्गा धरू एंतु ।

अर्थ- हे बहिन ! भला हुआ जो मेरा पति युध्द में मारा गया यदि वह भागकर आ जाता तो मुझे अपनी सखियों से लज्जित होना पडता ।

8. आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा : वीरगाथाकालीन चारण या भाट कवियों ने अपने अपने आश्रयदाताओं की मुक्तकंठ से झूठी प्रशंसा की है। इन कवियों ने अपने राजाओं को ब्रह्म, इन्द्र आदि देवताओं भी बढकर शूर तथा वीर बताया है। उस समय सामन्तवाद का बोलबाला था। राजा को सर्वोपरि माना जाता था। उस समय जो छोटे-छोटे राजा थे वे हमेशा साम्राज्य विस्तार के लिए आपस में लढते थे। उनमें केन्द्रिय सत्ता को हाथियाने की एक होड़ सी लगी हुई थी। इन राजाश्रित कवियों ने अपने अपने आश्रयदाताओं की खुलकर प्रशंसा की है, जो वास्तविकता से उत्पन्न अतिशयोक्ति से परिपूर्ण है।

9. जन-जीवन से सम्पर्क नहीं: चारण कवि अपने आश्रयदाताओं की स्तुति में लगे हुए थे, अतः इनकी रचनाओं में राजाओं तथा सामन्तों का जीवन ही उभर कर सामने आया है। इन कवियों ने ‘स्वामिन सुखाय’ काव्य की रचना की है, ‘सामान्य जन सुखाय’ की नहीं। अतः इनकी रचनाओं में सामान्य जन जीवन के घात-प्रतिघातों का अभाव है। राजाओं का गुणगान करना ही इन कवियों का उद्देश्य था । परिणामतः साधारण जनता के प्रति इनका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत हीन ही रहा। उस काल में जन समुदाय की स्थिति साधरण थी। इसका वर्णन करने के लिये आदिकाल के कवियों के पास अवकाश नहीं था । चारण कवियों की विस्तार भरी अभिव्यक्ति में मूलतः राजा, सामन्त, योध्दा और युध्द के वर्ण विषय रहे है, समाज की प्रायः उपेक्षा हुई है।

10. प्रकृति-चित्रण : इस साहित्य में प्रकृति का आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों में चित्रण किया है। नगर, नदी, पर्वत आदि का वस्तुवर्णन भी सुन्दर बन पड़ा है। अधिकतर इन कवियों ने प्रकृति का चित्रण उद्दीपन रुप में ही किया हैं । प्रकृति का स्वतंत्र रूप में चित्रण किये हुए स्थान इन काव्यों में थोडे हो मिलते है। प्रकृति चित्रण की जो उदात्त शैली छायावादी काव्य में मिलती है, वह इस काल के काव्य में नहीं। कहीं कहीं तो इन कवियों ने प्रकृति चित्रण में नाम परिगत शैली को अपनाया है, जहाँ रसोन्द्रेक के स्थान पर निरसता आ गई है।

11. काव्य के दो रूप : आदिकालीन रासो रचनाएँ मुक्तक और प्रबन्ध दोनों रूपों में मिलती हैं। मुक्तक काव्य का प्राचीन उपलब्ध ग्रन्थ ‘बीसलदेव रासो‘ है तथा प्रबन्ध काव्य का प्राचीन उपलब्ध ग्रन्थ जिसे महाकाव्य कहा जाता है ‘पृथ्वीराज रासो‘ है। इन दो काव्य रूपों के अतिरिक्त इस साहित्य में और दूसरा काव्य का कोई रूप नही मिलता है। इनमें काव्य रुपों की विविधता का अभाव है। न तो इस समय दृश्य काव्य लिखा गया और न ही गद्य लिखने का प्रयत्न किसी ने किया। इस समय की कुछ रचनाएँ अप्रामाणिक और कुछ नोटिस मात्र है। ‘जयचन्द प्रकाश‘ तथा ‘जयमयंक जसचंद्रिका‘ इस कोटि के ग्रंथ हैं।

12. रासो ग्रन्थ : आदिकालीन साहित्यिक ग्रन्थों के साथ ‘रासो’ शब्द जुडा हुआ है। जो कि काव्य शब्द का पर्यायवाची है । ‘रासो’ शब्द की व्युत्पत्ति विभिन्न विद्वान अपने-अपने ढंग से अलग अलग मानते हैं। आ. शुक्लजी ‘रासो’ शब्द का सम्बन्ध रहस्य से मानते हैं, लेकिन ‘वीसलदेव रासो’ में इसका अर्थ रसायन का परिचायक है जिसका सम्बन्ध मूल कथानक से है। मूल रुप में रासो शब्द एक छन्द के लिये प्रयुक्त हुआ है, जिसका उपयोग अपभ्रंश साहित्य में हुआ है।

13. छन्दों का विविध मुखी प्रयोग : वीरगाथाकालीन रासो साहित्य में छन्द के क्षेत्र में तो मानों एक क्रान्ति ही हो गयी है। छन्दों का जितना विविधमुखी प्रयोग उस साहित्य में हुआ है उतना उसके पूर्ववर्ती साहित्य में नहीं हुआ। दोहा, त्रोटक, सोरठा, छप्पय, गाथा, सटक, रोला, उल्लाला और कुण्डलियाँ आदि छन्दों का प्रयोग बडी कलात्मकता के साथ किया गया है। ‘पृथ्वीराज रासो’ में छन्दों का परिवर्तन और प्रयोग बहुत अधिक मात्रा में हुआ है, लेकिन कहीं भी मूल कथानक में बाधा उत्पन्न नहीं होती। डॉ.  हजारीप्रसाद द्विवेदी पृथ्वीराज रासो के सम्बन्ध में लिखते हैं- “रासो के छन्द जब बदलते हैं, तो श्रोता के हृदय में प्रसंगानुकूल कम्पन उत्पन्न करते हैं।”

14. अलन्कार : वीरगाथाकालीन चारण कवियों ने अलन्कारों पर विशेष ध्यान नहीं दिया, फिर भी उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलन्कारों का स्थान-स्थान पर सुन्दर प्रयोग देखा जा सकता है। पृथ्वीराज रासो में बहुत सारे अलन्कारों का चित्रण न होते हुए भी कुछ अलन्कारों का प्रयोग सुन्दर रूप में हुआ है, जो सजीव एवं सुन्दर हैं। उत्प्रेक्षा तथा अतिशयोक्ति अलन्कारों का सुन्दर वर्णन देखिये –

मनहु कन्त ससिमान कला सोलह सो बन्हिमा।
बौह वैस सजिता समिप अमृत रस पिन्नीपा।।

इस तरह इस साहित्य में अलन्कारों का प्रयोग चाहे कम संख्या में हुआ है, लेकिन जितने भी अलन्कारों का प्रयोग हुआ है, वह सजीव एवं सुन्दर हैं।

डिंगल और पिंगल भाषा

वीरगाथाकालीन रासो काव्य की एक अन्य उल्लेखनिय विशेषता है डिंगल और पिंगल भाषा का प्रयोग। उस समय की साहित्यिक राजस्थानी भाषा को आज के विद्वान डिंगल नाम से जानते हैं। यह भाषा वीरत्व के स्वर के लिये बहुत उपयुक्त भाषा है। वीरगाथाओं के रचयिता चारण कवि अपनी कविता राजदरबार में ऊँचे स्वर में गाते या पढते थे। डिंगल भाषा उसके उपयुक्त थी। प्रायः इसका प्रयोग युध्द वर्णन के लिए ही हुआ है। पिंगल भाषा का प्रयोग प्रायः विवाह और प्रेम के प्रसंगों के वर्णन के लिए किया जाता था। इस तरह युध्द वर्णन के लिये डिंगल और प्रेम या विवाह वर्णन के लिये पिंगल भाषा का प्रयोग होता था।

FAQs

Q. रासो साहित्य को अन्य किन नामों से जाना जाता है?

रासो साहित्य को या रासो काव्य, चारणी साहित्य, वीर काव्य, देशीभाषा काव्य, देशभाषा काव्य आदि सभी नामों से भी जाना जाता है।

Q. प्रमुख रासो ग्रंथों के नाम लिखिए?

परमाल रासो, खुमान रासो, हम्मीर रासो, विजयपाल रासो, बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो आदि प्रमुख रासो ग्रंथ हैं।

Q. रासो साहित्य या काव्य हिन्दी साहित्य के किस काल का हिस्सा है?

हिन्दी साहित्य का इतिहास का आरंभिक काल ‘आदिकाल‘ ही रासो साहित्य या काव्य का काल है, जिसकी शुरुआत लगभग 8वीं शताब्दी के आसपास हुई थी।

Q. प्रमुख चारणी साहित्य ग्रंथों के नाम लिखो?

चारण साहित्य समय की प्रख्यात रचनाओं में चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो, दलपति कृत खुमाण-रासो, नरपति-नाल्ह कृत बीसलदेव रासो, जगनिक कृत आल्ह खंड आदि मुख्य हैं।

Q. रासो काव्य या चरनी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्ति क्या है?

रासो साहित्य अधिकांशतः वीर रस पर आधारित है, अर्थात इनमें वीर-गाथाओं का वर्णन है। अतः इन काव्यों का मुख्य स्वर वीरगाथात्मकता है। यदा-कदा शृंगार रस भी देखने को मिलता है।

Q. देशभाषा काव्य की 7 रचनाओं के उदाहरण लिखो?

1. परमाल रासो/आल्हखण्ड (आल्हा छंद)- जगनिक ने आल्ह-खण्ड नामक एक काव्य रचा था उसमें इन वीरों की 52 लड़ाइयों की गाथा वर्णित है।

2. खुमान रासो– “दलपतविजय” भारतीय कवि था, जिसे खुमान रासो का रचयिता माना गया है। खुमान रासो नवीं शताब्दी की रचना मानी जाती है। इसमें नवीं शती के चित्तौड़ नरेश खुमाण के युद्धों का चित्रण है।

3. बीसलदेव रासो– “बीसलदेव रासो” पुरानी पश्चमी राजस्थानी की एक सुप्रसिद्ध रचना है। इसके रचनाकार नरपति नाल्ह हैं।

4. पृथ्वीराज रासो– “चंदबरदाई” (1148 ई०- 1192 ई०) हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराजरासो हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है।

5. रणमल्ल छंद– “श्रीधर” ने 1397 ई० में ‘रणमल्ल छंद’ नामक एक काव्य रचा जिसमें राठौर राजा रणमल्ल की उस विजय का वर्णन है जो उसने पाटन के सूबेदार जफर खाँ पर प्राप्त की थी।

6. जयचंद प्रकाश– “भट्ट केदार” ने ‘जयचंदप्रकाश’ नाम का एक महाकाव्य लिखा था जिसमें महाराज जयचंद के प्रताप और पराक्रम का विस्तृत वर्णन था।

7. जयमयंक जस चंद्रिका– “मधुकर कवि” ने ‘जयमयंकजसचंद्रिका’ नाम का एक महाकाव्य लिखा था, जिसमें महाराज जयचंद के प्रताप और पराक्रम का वर्णन था।

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