सरस्वती पत्रिका – संपादक और संपादन काल

सरस्वती हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध पत्रकाओं में सबसे उत्तम पत्रिका थी। इस पत्रिका का प्रकाशन जनवरी, 1900 ई० में प्रारम्भ हुआ था। सरस्वती के प्रथम संपादक के रूप में “जगन्नाथदास रत्नाकर” कहे जाते हैं। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती पत्रिका के सबसे प्रभावी संपादक थे।

शुरुआती समय में सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन झाँसी में होता था और फिर किसी कारणवश इसका प्रकाशन कानपुर से होने लगा। प्रकाशन के समय 32 पृष्ठ की इस पत्रिका का मूल्य मात्र ‘4 आना‘ था। 1905 ई. में ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा‘ का नाम मुखपृष्ठ से हट गया।

Sarswati Patrika
Sarswati Patrika

प्रमुख संपादक

सरस्वती पत्रिका के प्रमुख संपादकों में श्यामसुन्दर दास के बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा उनके पश्चात् पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, देवी दत्त शुक्ल, श्रीनाथ सिंह, और श्रीनारायण चतुर्वेदी सम्पादक हुए। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादक बनना एक विशिष्ट घटना सिद्ध हुई। सरस्वती के माध्यम से द्विवेदी ने भाषा संस्कार का एक महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

संपादन काल

सरस्वती पत्रिका का संपादन इण्डियन प्रेस, इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) से जनवरी, 1900 ई० में प्रारम्भ हुआ था। 1970 के दशक में इसका प्रकाशन बन्द हो गया। अतः सरस्वती पत्रिका का संपादन काल “1900 ई० से 1980 ई०” के बीच का है।

सरस्वती पत्रिका के संपादक और उनका संपादन काल

क्रम संपादक सम्पादन काल (ई०)
1. जगन्नाथदास रत्नाकर 1900
2. श्यामसुन्दर दास 1901
3. राधाकृष्णदास 1902
4. कार्तिक प्रसाद 1902
5. किशोरी लाल 1902
6. महावीर प्रसाद द्विवेदी 1903 से 1921 तक
7. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी 1921
8. देवीदत्त शुक्ल ठाकुर 1925
9. श्रीनाथ सिंह 1934
10. देवीलाल चतुर्वेदी 1924
11. लल्लीप्रसाद, उमेश चंद्र मिश्र (संयुक्त सम्पादक) 1935
12. श्रीनारायण चतुर्वेदी 1944
13. निशीथ राय 1977 से 1980 तक

रत्नाकर (प्रथम संपादक)

जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ का जन्म- 1866 ई., काशी, उत्तर प्रदेश; में तथा मृत्यु- 22 जून, 1932 ई. में हुई। भारत के प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। उन्हें आधुनिक युग के श्रेष्ठ ब्रजभाषा के कवियों में गिना जाता है। प्राचीन संस्कृति, मध्यकालीन हिन्दी काव्य, उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, हिन्दी, आयुर्वेद, संगीत, ज्योतिष तथा दर्शनशास्त्र इन सभी की अच्छी जानकारी जगन्नाथदास जी को थी। इन्होंने प्रचुर साहित्य सेवा की थी।

श्यामसुन्दर दास

डॉ॰ श्यामसुंदर दास का जन्म काशी में 14 जुलाई 1875 को हुआ था, तथा मृत्यु- 1875 – 1945 ई. में हुई। हिंदी के अनन्य साधक, विद्वान्, आलोचक और शिक्षाविद् थे। हिंदी साहित्य और बौद्धिकता के पथ-प्रदर्शकों में उनका नाम अविस्मरणीय है। हिंदी-क्षेत्र के साहित्यिक-सांस्कृतिक नवजागरण में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने और उनके साथियों ने मिल कर सन् 1893 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की थी ।

राधाकृष्णदास

राधाकृष्णदास का जन्म- 1865, वाराणसी उत्तर प्रदेश; में तथा मृत्यु- 1902 में हुई। “आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह” कहे जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई थे। हिन्दी साहित्य में इन्हें मुख्यत: एक नाटककार के रूप में जाना जाता है।

कार्तिक प्रसाद

कार्तिक प्रसाद खत्री हिन्दी साहित्यकार तथा हिन्दी की प्रसिद्ध ऐतिहासिक पत्रिका सरस्वती के प्रथम सम्पादक-मण्डल के सदस्य थे। सन १८७२ से कोलकाता से प्रकाशित ‘हिन्दी दीप्तिप्रकाश’ के सम्पादक वे ही थे। कार्तिक प्रसाद खत्री हिन्दी के प्रथम मौलिक जीवनी लेखक भी माने जाते हैं। वे बहु भाषाभाषी थे। हिन्दी ‘दीप्ति प्रकाश’, ‘भारत जीवन’ तथा ‘सरस्वती’ के सम्पादन में उन्हें जो ख्याति मिली, उसी से वे लेखक के रूप में पहचान बना पाये।

किशोरी लाल

किशोरीलाल गोस्वामी हिन्दी के उपन्यासकार, नाटककार एवं संपादक थे। इन्होंने 60 से अधिक उपन्यास लिखे हैं। इनमें तारा, चपला, लवंग लता आदि प्रमुख हैं। उनके उपन्यासों में कल्पनातत्त्व को प्रमुखता दी गयी है। गोस्वामी जी अपनी रचनाओं में भारत के गौरव के प्रति भी सचेत थे।

महावीर प्रसाद द्विवेदी

महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के (बैसवारा) रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में 15 मई 1864 को हुआ था। इनके पिता का नाम पं॰ रामसहाय दुबे था। ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। धनाभाव के कारण इनकी शिक्षा का क्रम अधिक समय तक न चल सका। इन्हें जी आई पी रेलवे में नौकरी मिल गई। 25 वर्ष की आयु में रेल विभाग अजमेर में 1 वर्ष का प्रवास। नौकरी छोड़कर पिता के पास मुंबई प्रस्थान एवं टेलीग्राफ का काम सीखकर इंडियन मिडलैंड रेलवे में तार बाबू के रूप में नियुक्ति। अपने उच्चाधिकारी से न पटने और स्वाभिमानी स्वभाव के कारण 1904 में झाँसी में रेल विभाग की 200 रुपये मासिक वेतन की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

भाषा को त्रुटिरहित एवं व्याकरण सम्मत बनाने में द्विवेदी जी का योगदान अविस्मरणीय है। द्विवेदी के योगदान को रेखांकित करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि ‘‘यदि द्विवेदी जी न उठ खडे होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण-विरुद्ध और उटपटांग भाषा चारों ओर दिखायी पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती।’’ द्विवेदी जी श्रेष्ठ साहित्यकार होने के साथ-साथ एक यशस्वी सम्पादक थे। उनकी प्रतिभा से तत्कालीन विद्वानों ने बहुत कुछ ग्रहण किया। राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा के गौरव को प्राप्त करने तथा भाषा के परिनिष्ठित रूप निर्धारण में उनका योगदान वंदनीय है।

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

डॉ॰ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म राजनांदगांव के एक छोटे से कस्‍बे खैरागढ़ में 27 मई 1894 में हुआ। उनके पिता पुन्नालाल बख्शी खैरागढ़ के प्रतिष्ठित परिवार से थे,इनके बाबा का नाम ‘श्री उमराव बख्शी’था। उनकी प्राथमिक शिक्षा म.प्र. के प्रथम मुख्‍यमंत्री पं॰ रविशंकर शुक्‍ल जैसे मनीषी गुरूओं के सानिध्‍य में विक्‍टोरिया हाई स्‍कूल, खैरागढ में हुई थी।

डॉ॰ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, जिन्हें ‘मास्टरजी’ के नाम से भी जाना जाता है, हिंदी के निबंधकार थे। वे राजनांदगांव की हिंदी त्रिवेणी की तीन धाराओं में से एक हैं।[क]। राजनांदगांव के त्रिवेणी परिसर में इनके सम्मान में मूर्तियों की स्थापना की गई है।

देवीदत्त शुक्ल ठाकुर

देवी दत्त शुक्ल का जन्म सन् १८८८ ई॰ में बक्सर (उन्नाव) में हुआ। देवीदत्त शुक्ल हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेंगे। सन् १९४६ में दृष्टहीन होते हुए भी इन्होने अपने पच्चीस वर्षों के सम्पादन काल के कृतित्व का वर्णन अपनी आत्मकथा “सम्पादक के पच्चीस वर्ष” में किया, जिसकी पंक्ति-पंक्ति से कर्तव्य निष्ठा और दृढ़ संकल्प के अनेक मर्मस्पर्शी दृष्टांत प्रकाश में आ चुके हैं।

देवीदत्त शुक्ल हिन्दी के साहित्यकार एवं पत्रकार थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद सरस्वती पत्रिका के सम्पादन का गुरुतर भार सन् १९२५ से १९२७ फिर १९२९ – १९४६ तक शुक्ल जी ने ही सँभाला। शुक्ल जी ने २७ वर्षों तक “सरस्वती” का सम्पादन किया।

श्रीनाथ सिंह

श्रीनाथ सिंह (1901-1916) द्विवेदी युग के हिन्दी साहित्यकार हैं। इन्होने “सरस्वती” का भी संपादन किया था। उनका जन्म 1901 ई० में इलाहाबाद जिले के मानपुर ग्राम में हुआ था। इन्होने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया था| हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर अधिवेशन में वे महात्मा गाँधी द्वारा सम्मलेन के प्रबंध मंत्री नियुक्त किये गये, बाद में वे हिंदी साहित्य सम्मलेन के सभापति भी हुए| वे तत्कालीन संयुक्त प्रान्त सरकार(१९४६-४७) द्वारा गठित समाचार पत्र उद्योग जांच समिति के सदस्य भी थे।

श्रीनारायण चतुर्वेदी

श्री नारायण चतुर्वेदी का जन्म उत्तर-प्रदेश के इटावा जनपद में सन् 1895 ई॰ में हुआ माना जाता है तथा श्रीनारायण जी इसी जन्मतिथि के हिसाब से ही भारत सरकार की राजकीय सेवा से सेवानिवृत भी हुये। वे सरस्वती पत्रिका के सम्पादक रहे। उन्होने राष्ट्र को हिन्दीमय बनाने के लिये जनता में भाषा की जीवन्त चेतना को उकसाया। अपनी अमूल्य हिन्दी सेवा द्वारा उन्होने भारतरत्न मदन मोहन मालवीय तथा पुरुषोत्तम दास टंडन की योजनाओं और लक्ष्यों को आगे बढ़ाया।

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