पारिस्थितिकी (Ecology) – Paristhitiki की परिभाषा, कारक, नियम आदि

पारिस्थितिकी की परिभाषा

पारिस्थितिकी वह विज्ञान है, जिसके अन्तर्गत एक तरफ प्राकृतिक पारिस्थितिक तन्त्र के जैविक एवं अजैविक संघटकों के मध्य तथा दूसरी तरफ विभिन्न जीवों के मध्य अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

पारिस्थितिकी से तात्पर्य/अर्थ

पारिस्थितिकी (Ecology) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम जर्मन प्राणि शास्त्री अर्नस्ट हैक्कल ने 1869 ई. में किया था। उन्होंने दो ग्रीक शब्दों ‘Oikos’ जिसका अर्थ है- आवास या रहने का स्थान तथा ‘logos’ जिसका अर्थ है-‘अध्ययन’, को मिलाकर ‘Ecology’ अर्थात् ‘पारिस्थिति’ शब्द का निर्माण किया था।

अत: शाब्दिक रूप से पारिस्थिति का अर्थ-‘जीवों का उनके निवास के सन्दर्भ में अध्ययन’ है। दूसरे शब्दों में –

वातावरण तथा जीव समुदाय के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं। इसके अन्तर्गत जीवधारियों के वास स्थानों या उन पर पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

पारिस्थितिकीय कारक

जीवधारियों की संरचना एवं कार्यों पर प्रभाव डालने वाला वातावरण का प्रत्येक भाग वातावरणीय अथवा पारिस्थितिकीय कारक कहलाता है।

पारिस्थितिकीय कारकों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. जलवायवीय कारक (Climatic Factor)– इसके अन्तर्गत प्रकाश, तापमान, जल एवं वर्षा, वायु (वायु की गति, वायुमण्डल की गैसें) आदि सम्मिलित हैं।
  2. स्थलाकृति कारक (Topographic Factor)– इसके अन्तगत स्थलाकृति की ऊंचाई, ढलान (Slope) ढलान की दिशा एवं मात्रा, खुलाव (Exposure) आदि सम्मिलित हैं।
  3. मृदीय कारक (Edaphic Factor)– इसके अन्तर्गत खनिज पदार्थ, कार्बनिक पदार्थ, शैवाल (Algae), मृदा जल, मृदा वायु, मृदा जीव, मृदा अभिक्रिया आदि सम्मिलित हैं।
  4. जैविक कारक (Biotic Factor)– इसके अन्तर्गत सूक्ष्मजीव, जीवाणु, कवक, चरने वाले पशु, सहजीविता (Symbiotism), परजीविता (Parasitism), अधिपादपता (Epiphytism), मृतोपजीविता (Saprophytism), कीटभक्षी पौधे आदि सम्मिलित हैं।

पारिस्थितिकी के नियम

पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी की क्रियाशीलता कुछ नियमों पर आधारित होती है। इन नियमों के प्रतिपादक बैरी कोमोनर (Barry Commoner) थे। Paristhitiki Ke Niyam निम्न प्रकार हैं-

  1. पारिस्थितिकी के प्रथम नियम के अनुसार, पारितन्त्र में प्रत्येक जीव एक-दूसरे से सम्बन्धित होती है (Everything is connected to everything)। उनका सम्बन्ध पदार्थ अथवा ऊर्जा के माध्यम से स्थापित होता है। जैसे— मौसम के तापमान में वृद्धि के फलस्वरूप शैवालों की तेजी से वृद्धि होती है। इसके फलस्वरूप तन्त्र में अजैविक पोषकों की आपूर्ति घट जाती है। इससे शैवाल एवं पोषण चक्र में असंतुलन पैदा होता है। इसे सन्तुलित करने हेतु तन्त्र के अन्य प्रक्रम क्रियाशील हो जाते हैं और पुनः पारिस्थितिकीय सन्तुलन कायम हो जाता है।
  2. पारिस्थितिकी के द्वितीय नियम के अनुसार, पारितन्त्र में प्रत्येक वस्तु को कहीं न कहीं जाना है (Everything must go somewhere)। प्रत्येक प्राकृतिक तन्त्र में, यदि किसी एक तन्त्र द्वारा कोई वस्तु निकाल दी जाती है, तो उसी वस्तु को दूसरा तन्त्र अपने भोजन के लिए प्रयोग कर लेता है। जैसे— प्राणी कार्बन डाइ-ऑक्साइड को अपने श्वसन के अपशिष्ट के रूप में त्याग देता है, परन्तु यही कार्बन डाइ-ऑक्साइड हरित पादपों के लिए आवश्यक पोषक बन जाती है।
  3. पारिस्थितिकी के तृतीय नियम के अनुसार माना गया है कि, यहाँ कुछ भी मुफ्त में उपलब्ध नहीं है (There is no such thing as a free lunch)। अत: किसी भी प्रकार का लाभ प्राप्त करने के लिए तन्त्र में कुछ-न-कुछ अवश्य प्रदान करना पड़ता है अर्थात् ऊर्जा की प्राप्ति के लिए ऊर्जा लगानी पड़ती है।
  4. पारिस्थितिकी के चतुर्थ नियम के अनुसार, प्रकृति सर्वोत्तम जानती है (Nature knows best)। इस नियम के अनुसार, पारितन्त्र में मानव द्वारा किया गया कोई भी परिवर्तन उसके अस्तित्व के लिए विनाशकारी साबित होगा।

पारिस्थितिकी में संगठन के स्तर

संगठन या व्यवस्था का तात्पर्य किसी भी तन्त्र, संरचना या स्थिति के लघु घटकों का बड़े घटकों के साथ पदानुक्रमिक विन्यास से है। इसमें प्रत्येक स्तर के घटक एक-दूसरे के साथ समान उद्देश्यों के लिए सामंजस्य एवं सहयोग करते हैं। पारिस्थितिकी में संगठन के स्तरों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है-

जीव या व्यक्ति

जीवित वस्तुएँ जीव (Organism) कहलाती हैं, क्योंकि उनमें वृहत स्तर के संगठन देखे जाते हैं। उन्हें व्यक्ति (Individual) भी कहा जाता है, क्योंकि प्रत्येक जीव का व्यक्तिगत अस्तित्व भी होता है। यह जीव स्वतन्त्र रूप से कार्य करने की क्षमता रखता है और यह पौधा, जन्तु, बैक्टीरिया, कवक आदि कुछ भी हो सकता है। इसका उददेश्य किसी जीव के रूप, कायिकी (Physiology), व्यवहार, गन्तव्य (Destination) एवं अनुकूलन (Adaptation) का अध्ययन करना है।

आवास

आवास (Habitat) एक ऐसा पारिस्थितिकीय या पर्यावरणीय भाग है, जिस पर कोई विशिष्ट वनस्पति या जन्तु प्रजाति निवास करती है। पथ्वी पर चार प्रमुख आवास पाए जात हैं- स्थल, ताजा जल, ज्वारनदमुख (Estuary) तथा महासागर/सागर। आवास में जनसंख्या से तात्पर्य उसमें रहने वाला या पाए जाने वाली जन्तओं व वनस्पतियों की संख्या से है। वर्तमान में मानवीय कारणों के कारण वनस्पति व जन्तुओं के प्राकृतिक आवास का वास होता जा रहा है, जो जैव-विविधता के ह्रास का प्रमुख कारण है। अत: जैव-विविधता व पारिस्थितिकी के संरक्षण हेतु आवास को संरक्षित करना जरूरी है।

जनसंख्या

इसके अन्तर्गत किसी भी क्षेत्र विशेष में पाए जाने वाले पौधों व जन्तओं की प्रजातियों को सम्मिलित किया जाता है; जैसे— किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की संख्या उनकी जनसंख्या (Population) है। जनसंख्या स्तर पर समस्त व्यक्ति आपस में अन्तक्रिया करते हैं।
किन्हीं भी दो समयावधियों के बीच जनसंख्या में होने वाला धनात्मक परिवर्तन जनसंख्या वृद्धि कहलाता है। जनसंख्या में वृद्धि जन्म एवं आप्रवास (Emigration) के कारण होती है, जबकि जनसंख्या में कमी, मृत्यु एवं उत्प्रवास (Emigration) के कारण होती है।

समुदाय

किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों पादपों एवं जन्तओं आदि के समूहन (Assembling) एवं उनके बीच अन्तक्रिया के परिणामस्वरूप समुदाय (Community) का निर्माण होता है। इन समुदायों का नामकरण प्रभावी (Dominant) पादप प्रजाति के आधार पर किया जाता है; जैसे- घासभूमि समुदाय, वन समुदाय आदि में क्रमश: घासों व वृक्षों की प्रधानता होती है, लेकिन अन्य झाड़ियाँ आदि भी पाई जाती हैं।

समुदाय का स्तरीकरण

समुदाय के स्तरीकरण से तात्पर्य उस समुदाय की प्रजातियों की ऊर्ध्वाधर (Vertical) परतों से है। स्तरीकरण अन्तर- जातीय प्रतिस्पर्धा (Inter-Specific Competition) को सीमित करने का प्रायोगिक उपाय है।
विभिन्न समुदायों में भिन्न-भिन्न परतें पाई जाती हैं; जैसे-उष्णकटिबन्धीय वर्षा वनों में सर्वाधिक पाँच परतें तक पाई जाती है, जबकि अन्य में या तो वर्षा या फिर ताप या फिर दोनों की न्यूनता के कारण वनस्पति की परतों में कमी होती जाती है।

Samuday Ka Starikaran

पारितन्त्र

किसी क्षेत्र के जैविक समुदाय एवं उनके अजैविक पर्यावरण को मिलाकर पारिस्थितिकी तन्त्र का निर्माण होता है। पारितन्त्र (Ecosystem) में जैविक समुदाय एवं उनका अजैविक पर्यावरण ऊर्जा प्रवाह एवं पोषकों के प्रवाह के द्वारा आपस में अन्तर्किया करते हैं। पारितन्त्र के सभी घटक एक-दूसर पर अन्तर्निर्भर होते हैं। अत: एक घटक की विलुप्ति या परिवर्तन का प्रभाव समस्त पारितन्त्र पर पड़ता है।

उदविकास एवं प्रजातीयकरण

पारिस्थितिक तन्त्रों एवं उनकी प्रजातियों, अन्तक्रियाओं एवं समुदायों में समय के साथ बदलाव आता है। प्रजातियों में परिवर्तन, प्राकृतिक चयन (Natural Selection) एवं उद्विकास (Evolution) की प्रक्रिया के द्वारा होता है।

प्राकृतिक चयन

प्राकृतिक चयन का वर्णन सर्वप्रथम चार्ल्स डार्विन ने किया था। इस प्रक्रिया में प्रजातियों के कुछ जीनों का चयन दोहराव (Replication) हेतु किया जाता है। ऐसे जीव, जो इन जीनों को धारण करते हैं, वे जनसंख्या में जीवित रहने के लिए अधिक अनुकूल हो जाते हैं और पुनर्जनन द्वारा इन जीनों की मात्रा अधिक होती जाती है। इसे योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest) भी कहा जाता है।

उद्विकास

उद्विकास (Evolution) एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा प्रजाति अपनी आनुवंशिक विशेषताओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्राकृतिक चयन के द्वारा परिवर्तित करती है।

सम-उद्विकास

सम-उद्विकास (Co-evolution) जब दो प्रजातियों में एक साथ उद्विकास के कारण परिवर्तन या बदलाव आता है, उसे सम-उद्विकास (Co-evolution) कहते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वे दोनों प्रजातियां आपस में अन्तक्रिया करती हैं और एक प्रजाति का बदलाव दूसरी प्रजाति को प्रभावित करता है।

प्रजातीयकरण

उद्विकास के परिणामस्वरूप नई प्रजाति का जन्म होना प्रजातीयकरण (Speciation) कहलाता है। यह प्रजाति अपनी पूर्ववर्ती प्रजातियों से अत्यधिक भिन्न होती है और इसी कारण से इसे नई प्रजाति माना जाता है। प्रजातीयकरण तब भी सम्भव हो सकता है, जब किसी जनसंख्या को भौगोलिक सीमाओं द्वारा अलग-अलग कर दिया जाता है।

विलुप्ति

विलुप्ति (Extinction) से तात्पर्य किसी प्रजाति के विनष्ट होने से है। ऐसा प्राय: जलवायविक या पर्यावरणीय बदलावों और जैविक प्रतिस्पर्धा (Biological Competition) के कारण होता है। विलुप्ति की घटना तभी होती है, जब कोई प्रजाति अपने आस-पास के बदलावों से समन्वय नहीं बैठा पाती। कभी-कभी भूकम्प, ज्वालामुखी, सूनामी आदि अचानक आने वाले परिवर्तनों के कारण प्रजातियों का अचानक विलुप्तिकरण हो जाता है, कभी-कभी ये मन्द गति से भी हो सकता है।

अंतर्क्रिया

प्रजातियों के मध्य होने वाली अन्तर्क्रियाओं (Interaction) को कई रूपों में वर्गीकृत किया जाता है (जैसे – अन्तर-प्रजातीय अन्तक्रियाएँ, अन्तरा-प्रजातीय अन्तर्क्रियाएँ, अन्तरा-प्रजातीय प्रतिस्पर्धी), जो निम्नलिखित हैं-

अन्तर-प्रजातीय अन्तक्रियाएँ

अन्तर-प्रजातीय अन्तक्रियाएँ एक ऐसी अंतर्क्रियाएँ हैं जो विभिन्न प्रजातियों के जीवों के मध्य होती हैं। ये अंतर्क्रियाएँ सकारात्मक, उदासीन एवं नकारात्मक तीनों प्रकार की हो सकती हैं।

1. सकारात्मक अन्तर-प्रजातीय अंतर्क्रियाएँ

समुदाय के मध्य कुछ पारस्परिक क्रियाएँ सदस्यों की सहयोगिता का परिणाम हैं, जहाँ पारस्परिक क्रिया करने वाली दोनों जातियाँ या कोई एक जाति लाभान्वित होती है। ये पर्यावरणीय उतार-चढ़ाव के प्रति अनुकूलन (Adaptation) स्थापित करने में सहायता करती हैं।

परस्पर लाभ प्रदान करने वाली क्रियाएँ निम्न प्रकार की होती हैं-

  1. सहभोजिता (Commensalism) – सहभोजिता दो जातियों के बीच ऐसा सम्बन्ध है, जिसमें एक जाति लाभान्वित होती है, जबकि दूसरी जाति को सामान्य स्थिति में न तो लाभ होता है न ही हानि।
  2. अधिपादप (Epiphytes) – (जैसे-मॉस, फर्न, आर्किड, मनी प्लाण्ड), जोकि वृक्षों पर वृद्धि करते हैं तथा भली भाँति प्रकार से लाभ उठाते हैं, परन्तु सामान्यतया ये वृक्षों को कोई हानि नहीं पहुँचाते, सहभोजिता के उदाहरण हैं।
  3. सहोपकारिता (Mutualant) – इस समुदाय में दो जातियों का सहयोग है, जिसमें दोनों सहोपकारी लाभान्वित होते हैं। यह परस्पर क्रियात्मक साहचर्य है न कि केवल साथ रहना। सहोपकारिता अविकल्पी या विकल्पी हो सकती है। इसके उदाहरण नाइट्रोजन यौगिकीकरण करने वाले बैक्टीरिया (राइजोबियम) तथा समुद्री एनीमोन, लाइकेन, कवकमूल, साइकस की कोरेलाएड जड़ तथा हर्मिट केकड़े हैं।

2. नकारात्मक अन्तर-प्रजातीय अन्तर्क्रियाएँ

इस प्रकार की अन्तक्रियाओं में किसी एक प्रजाति को लाभ तथा दूसरी प्रजाति को हानि प्राप्त होती है; जैसे-परभक्षण, परजीविता। इसका संक्षिप्त विवरण निम्न है-

  1. परभक्षण (Predation) – परभक्षण जातियों के बीच ऐसा सम्बन्ध, जिसमें एक जाति, दूसरी जाति को अपना आहार बना लेती है, परभक्षण (Predation) कहलाता है। इस प्रक्रिया के द्वारा एक समुदाय के अन्दर भक्ष्य-परभक्षी की जनसंख्या स्थायीकृत (Stable) रहती है। शेर और जेब्रा, मुर्गी और केंचुआ इत्यादि इसके उदाहरण हैं।
  2. परजीविता (Parasitism) – परजीविता नामक पारस्परिक क्रिया में, छोटे आकार की परजीवी जाति (Parasite), बड़े आकार की जाति ऊपर निर्भर रहती है, इस जाति से वह भोजन ग्रहण करती है। परजीवी जाति. मेजबान जाति की जनसंख्या वृद्धि को प्रभावित कर सकती है। परजीवी मेजबान के जीवन चक्र को कम करके उसे कमजोर बनाती हैं।

3. उदासीन अन्तर-प्रजातीय अन्तर्क्रियाएँ

इस प्रकार की अन्तर्क्रियाओं में किसी भी प्रजाति को प्रत्यक्ष रूप से न तो कोई लाभ प्राप्त होता है और न ही कोई हानि प्राप्त होती है। लाभ या हानि अप्रत्यक्ष रूप से ही होती है; जैसे—प्रतिस्पर्धा।

  • पतिस्पर्दा: प्रतिस्पर्धा यह वहाँ पाई जाती है, जहाँ दो अलग-अलग प्रजातियों की आवश्यकता एक जैसी होती है और उस आवश्यकता की पूर्ति हेतु वे आपस में प्रतिस्पर्धा करती है, क्योंकि वातावरण में उनकी आवश्यकता की पूर्ति की क्षमता सीमित होती है।

Antar Prajati Antar Kriya

की-स्टोन प्रजातियाँ (Key-stone Species)

वे प्रजातियाँ जो किसी समुदाय में प्रचुरता तथा जीवभार की अल्पता के बावजूद समुदाय अभिलक्षणों पर प्रभाविता को दर्शाती है, की-स्टोन प्रजातियाँ (Keystone Species) कहलाती है। ये जातियां अन्य जातियों की आनुपातिक प्रचुरता को नियन्त्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। केवल कुछ ही जातियाँ, की-स्टोन प्रजातियों की तरह कार्य करती हैं। की-स्टोन प्रजातियाँ सूक्ष्म जलवायु, मृदा की रचना तथा मृदा रसायन एवं खनिजों के स्तर को भी परिवर्तित और प्रभावित करने सक्षम होती हैं। ये प्रजातियाँ पारिस्थितिक तन्त्र में ऊर्जा के प्रवाह, खाद्य श्रृंखला और खनिजों के चक्रण का भी प्रभावित करती है और अपनी परस्पर क्रियाओं से समुदाय की संरचना और जैविक घटकों को परिवर्तित कर सकती हैं।

अन्तरा-प्रजातीय अन्तर्क्रियाएँ

अन्तरा-प्रजातीय अन्तक्रियाएँ (Intra-Specific Interactions) ऐसी अन्तक्रियाएँ हैं, जो एक ही प्रजाति के जीवों के मध्य होती हैं।

  1. सामाजिक प्रभाविता (Social Dominance)– इसके अन्तर्गत जीवों के समाज या समुदाय का स्तरीकरण जीवों के कई समूहों में किया जाता है; जैसे-चीटियों की जनसंख्या को उनकी रैंक या जाति के आधार पर रानी, सैनिक, कामगार आदि समूहों में बाँटा जाता है।
  2. सामाजिक पदसोपान (Social Hierarchy)– यह भी एक स्तरीकरण है, जिसमें किसी एक जीव का अन्य जीवों पर प्रभुत्व (Domination) होता है। जैसे— पोल्ट्री फार्म में मजबूत प्रौढ़ रूस्टर (Stronger Adult Rooster) का अन्य जनसंख्या पर पूर्णत: नियन्त्रण रहता है। इस प्रभुत्वशील रूस्टर को अल्फा मेल (Alpha Male) कहा जाता है।
  3. क्षेत्रीयकरण (Territoriality)– यह जीव/व्यक्ति या जीवों के समूह द्वारा सीमांकित भौतिक क्षेत्र है। इसका सबसे सामान्य उदाहरण कुत्तों द्वारा प्रदर्शित होता है, क्योंकि वे अपने आस-पास के क्षेत्र को मूत्र के उत्सर्जन द्वारा सीमांकित करते हैं जिसकी महक दूसरे कुत्तों द्वारा आसानी से खोजी जा सकती है।

अन्तरा-प्रजातीय प्रतिस्पर्धी

अन्तरा-प्रजातीय प्रतिस्पर्धा (Intra-specific competition) तब पाई जाती है जब किसी जनसंख्या के दो या दो से अधिक जीव अपने आस-पास के पर्यावरण से वैसे तत्त्वों के लिए संघर्ष करते है, जो अन्य जीवों द्वारा भी अपेक्षित होता है।

पारिस्थितिकीय अनुक्रमण

अनुक्रमण (Succession) की अवधारणा सर्वप्रथम वार्मिंग और क्लिमेण्ट्स द्वारा दी गई थी। अनुक्रमण सैकडों या हजारों वर्षों में वानस्पतिक समुदायों की रचना और आकार में आने वाली विभिन्नताओं को व्यक्त करता है। समुदाय और पर्यावरण में पारस्परिक क्रिया के फलस्वरूप जो परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, उससे क्रमश: एक समुदाय दूसरे समुदाय के द्वारा प्रतिस्थापित (Replace) होता रहता है।

लम्बी अवधि के बाद अनुक्रमण की गति मन्द पड़ने लगती है और अन्ततः एक ऐसे समदाय का आगमन होता है, जो वहाँ के भौतिक पर्यावरण के साथ गतिक सन्तुलन (Dynamic Balance) स्थापित करता है और इसके माध्यम से पर्यावरण को परिवर्तित होने से रोक लेता है। इस प्रकार के सन्तुलन को स्थापित करने वाले समुदाय को चरम समुदाय (Climax Community) कहते हैं। इसके पूर्व के सभी बदलते हुए समुदायों को क्रमकी समुदाय (Seral Community) कहा जाता है।

सर्वप्रथम स्थापित समुदाय को नवीन समुदाय (Pioneer Community) कहते हैं। इस प्रकार देखें तो अनुक्रमण नवीन समुदाय से प्रारम्भ होकर क्रमकी समुदायों द्वारा आगे बढ़ते हुए चरम समुदाय पर समाप्त होता है।

अनुक्रमण के क्रम में समुदायों को प्रावस्थाएं, जो एक के बाद दूसरे के द्वारा प्रतिस्थापित होती हैं, उसे क्रमक (Sere) कहते हैं। चरम समुदाय स्थायी होता है तथा जाति रचना में कोई परिवर्तन तब तक नहीं दर्शाता है, जब तक कि पर्यावरणीय स्थिति में कोई बदलाव न आ जाए।

पारिस्थितकीय अनुक्रमण के प्रकार

क्लिमेण्ट्स ने पारिस्थितिकीय अनुक्रम को दो भागों में बाँटा है- (i) प्राथमिक अनुक्रम (ii) द्वितीयक अनुक्रम।

प्राथमिक अनुक्रम

इसके अन्तर्गत उन क्षेत्रों में विभिन्न क्रमको (Sere) में वनस्पति समुदाय के विकास को सम्मिलित करते हैं, जहाँ सर्वप्रथम किसी भी पौधे या प्राणी का जनन एवं विकास नहीं हुआ हो। प्राथमिक अनुक्रम (Primary Succession)निम्न स्थानों व परिस्थितियों में होता है। जैसे- नवीन लावा प्रवाह (Lava Flow) तथा उसक शीतलन द्वारा नवान घरातल का निर्माण, हिममण्डित क्षेत्रों से हिम के पिघल जाने के कारण शैलों के अनावरण वाला भाग, झील के जल के सूख जान पर शुष्क झील का तल वाला भाग, सागरीय तली के उन्मज्जन (Emergence) के कारण, नवनिर्मित उन्मज्जित सागरीय द्वीप, नवीन बालुस्कातूप (Sand Dunes) का निर्माण नदी द्वारा नवीन कॉप (Alluvia) के निक्षेपण से निर्मित बाढ़ मैदान, मानव द्वारा खनन कार्य (खनिजों का) के दौरान मलवा के ढेर वाला भाग आदि।

Prathamik Anukram

द्वितीयक अनुक्रम

किसी क्षेत्र में जब प्राथमिक अनुक्रमण से उत्पन्न जैव समुदाय का किन्हीं कारणों से विनाश हो जाता है, तो द्वितीयक अनुक्रमण (Secondary Succession) द्वारा उस क्षेत्र में नवीन जैव समुदाय विकसित होता है। द्वितीयक अनुक्रमण का कारण मानवीय हस्तक्षेपों (जैसे- वनों का काटना या जलाना, झूमिंग कृषि सड़क निर्माण आदि) द्वारा या प्राकृतिक कारकों (जैसे— बाढ़, हरिकेन, सूखा, भूस्खलन, जलवायु परिवर्तन) द्वारा प्राथमिक जैव समुदाय का विनाश होता है।

पारिस्थितिकीय अनुक्रमण के कारक

पारिस्थितिक तन्त्र में वनस्पति समुदाय का विकास निम्न कारकों द्वारा प्रभावित व नियन्त्रित होता है-

  • जलवायु कारक (Climate Factor)– किसी प्रदेश के पादप के लिए उस प्रदेश की वृहद-स्तरीय जलवायु (Macro Climate) का उतना महत्त्व नहीं होता, जितना कि उस
    जलवायु (Micro Climate) का महत्त्व होता है।
  • जैविक कारक (Biotic Factor)– जीवित पौधों का स्थान विशेष पौधों पर पड़ने वाला प्रभाव, मख्य रूप से प्राणी तथा मानव का प्रभाव।
  • भौतिक कारक (Physical Factor)– धरातल का स्वरूप, ऊँचाई, ढाल (Slope) आदि का स्थानीय पादपों पर पड़ने वाला प्रभाव।
  • मृदीय कारक (Soil Factor)– स्थान विशेष की मिट्टियों के पौधों के लिए महत्त्व रखने वाले गुण तथा पोषक तत्त्व (Nutrients), मृदा-गठन (Soil Composition), मृदा संरचना आदि।

अनुक्रमण की प्रक्रिया

क्लिमेण्ट्स (Clements) ने वर्ष 1916 में अनुक्रम की निम्नलिखित प्रक्रियाओं का वर्णन किया है-

न्यूडेशन

नवीन समुदाय के आगमन के लिए खाली स्थान प्रदान करने की प्रक्रिया न्यूडेशन (Nudation) कहलाती है। सामान्यतया पायोनीयर जातियों में वृद्धि दर अधिक होती है, लेकिन उनकी जीवन अवधि कम होती है।

आक्रमण

बाहर से अनेक नई जातियों का अनुक्रमण के क्षेत्रों में अनाधिकृत प्रवेश आक्रमण (Invasion) कहलाता है इस प्रक्रिया में निकट के क्षेत्रों से प्रकीर्णन के विभिन्न माध्यमों से फलों या बीजों की अनेक प्रजातियों का नवीन स्थान पर पहुंचकर अंकुरित होना आस्थापन (Ecesis) कहलाता है।

स्पर्द्धा

जब किसी क्षेत्र में समुदायों का एकत्रीकरण हो जाता है, तब वहाँ स्थान तथा संसाधनों पर दबाव अधिक बढ़ जाता है। इस कारण यहाँ अन्तर्जातीय तथा अन्तर्राजातीय प्रतिस्पर्धा होने लगती है। सफल प्रतियोगी शीघ्र ही वहाँ के पर्यावरण के साथ अनुकूलन स्थापित कर लेते हैं और कुछ समुचित परिवर्तन का प्रयास करते हैं।

प्रतिक्रिया

इस चरण में जैविक तथा अजैविक दोनों घटकों के मध्य प्रतिक्रिया (Reaction) शुरू हो जाती है। पर्यावरण में निरन्तर होने वाला परिवर्तन इसी का प्रतिफल (Result) है।

चरम अवस्था

यह अनुक्रमण की प्रक्रिया की सबसे अन्तिम अर्थात् चरम अवस्था (Climax Stage) होती है, जहाँ जैविक समुदाय पर्यावरण से काफी स्वस्थ सामंजस्य अथवा अनुकूलन स्थापित कर लेते हैं। यह अवस्था पारिस्थितिक सन्तुलन (Ecological Balance) के लिए आवश्यक है।

“क्लिमेण्ट्स के अनुसार, चरम अवस्था की स्थापना में जलवायु का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।”

पारिस्थितिकीय अनुकूलन

पारिस्थितिकीय अनुकूलन का तात्पर्य मानव का अपने प्राकृतिक या भौतिक वातावरण के साथ सामंजस्य से है। इस भौतिक वातावरण के अन्तर्गत जैविक एवं अजैविक दोनों ही अवयव शामिल होते हैं। ये अवयव मानव की जीवन शैली, खाद्य, आदतें, वस्त्र, आवास, व्यवसाय आदि पर प्रभाव डालते हैं। मानव अपने चतुर्दिक इन तत्त्वों के साथ समायोजन का तो प्रयास करता ही है, साथ ही वह उन तत्त्वों में संशोधन का भी प्रयास करता है, ताकि वे उसके जीवन की जरूरतों के अनरूप हो सकें। ये संसोधन विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ और अधिक गहन होते जाते हैं। मानव का पारिस्थितिकी के साथ सामंजस्य दो तरीकों से होता है- अनुकलन और संशोधन।

1. अनुकलन (Adaptation)

अनुकलन (Adaptation) का तात्पर्य अपने वातावरण के अनुसार स्वयं को परिवर्तित (Self-Modification) करने से है। इसके दो प्रकार हैं- (क) आन्तरिक अनुकूलन (ख) बाह्य अनुकूलन।
पुनः आन्तरिक अनुकूलन को भी दो वर्गों में बाँटा जाता है – (i) प्राकृतिक (ii) सांस्कृतिक

2. संशोधन (Modification)

संशोधन (Modification) जीवन को सरल बनाने हेतु जब मानव अपने वातावरण को अपनी जरूरत के अनुसार ढाल लेता है, तो यह संशोधन कहलाता है। अत्यधिक गर्म प्रदेशों में वातानुकूल एवं रेफ्रिजरेटरों का प्रयोग संशोधन का ही उदाहरण है।

बायोम

जैवमंडल के पार्थिव हिस्से (Terrestrial Parts) को कई बड़े क्षेत्रों में बांटा जाता है, जिन्हें बायोम (Biome) कहा जाता है। इन क्षेत्रों में बायोम का निर्धारण जलवायु, वनस्पति, वन्यजीव, एवं मिट्टी के प्रकार के आधार पर किया जाता है। दो भिन्न बायोम के मध्य की सीमा का निर्धारण तापमान एवं बर्षा जैसे जलवायवकीय कारकों के आधार पर किया जाता है।

Bayom (Biome) - Paristhitiki

बायोम के लक्षण

बायोम में निम्नलिखित लक्षण विद्यमान होते हैं-

  • प्रत्येक बायोम में पौधे तथा प्राणी साथ-साथ सामंजस्यपूर्ण अवस्था में रहते हैं। ये परस्पर अन्तनिर्भर रहते हैं।
  • बायोम में पौधे तथा प्राणियों के मध्य अंतर्संबंध विद्यमान होता है, जिनके मध्य लगातार क्रिया-प्रतिकृया चलती रहती है।
  • बायोम विशेष में साम्यता दिखाई देती है, जिससे एक बायोम इकाई का स्रजन होता है।
  • दो बायोम के मध्य एक संक्रमण प्रदेश होता है, जिनमें दोनों के लक्षण थोड़ी मात्रा में उपस्थित होते हैं।
  • वनस्पतियाँ किसी बायोम के प्रधान लक्षणों को अभिव्यक्त करती हैं।
  • वनस्पतियों में भिन्नता पर्यावरणीय भिन्नताओं के कारण उद्घाटित होती है, जिससे अलग-अलग बायोम इकाई का स्रजन होता है तथा प्रत्येक बायोम में साम्यता रहती है।

पढ़ें:- दुनियाँ के प्रमुख बायोम और उनकी विशेषताएँ, एवं उनमें पायी जाने वाली प्रमुख वनस्पतियाँ तथा प्रमुख जीव जन्तु।

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