ढोला मारू रा दूहा – 11वीं सदी की प्रसिद्ध कहानी

ढोला मारु रा दूहा, 11वीं सदी आदिकाल का प्रसिद्ध लौकिक काव्य है, राजस्थान में आज भी शादी विवाह में ढोला मारु के प्रेम गीत गाए जाते है। पढ़िए इस पेज में ढोला मारू की प्रसिद्ध कहानी।

ढोला मारु रा दूहा, 11वीं सदी आदिकाल का प्रसिद्ध लौकिक काव्य है, जो आज भी राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध शृंगार रस से भरपूर कहानी के रूप में लोगों की जबान पर है। इसमे राजकुमार ढोला और राजकुमारी मारू की प्रेमकथा का वर्णन है। इस कहानी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि ग्यारवीं सदी से इस घटना का नायक ढोला आज भी एक प्रेमी का नायक के रूप में जीवित है और आज भी राजस्थान में पति-पत्नी के सुंदर जोड़े को ढोला मारू की उपमा दी जाती है, राजस्थान में आज भी शादी विवाह में ढोला मारु के प्रेम गीत गाए जाते है।

सोरठियो दूहो भलो, भलि मरवणरी बात।
जोवन छाई धण भली, तारांछाई रात।। ~ कवि कलोल

यही नहीं राजस्थान में आज भी पत्नी अपने पति को प्यार में ढोला कहकर बुलाती है, ढोला एक दूल्हे का एक पर्यायवाची शब्द ही बन गया है। राजस्थान में आज भी लोकगीतों में ढोला मारु के गीत बहुत ही प्रसिद्ध है और आज भी यहां की महिलाएं बहुत ही बड़े चाव से ढोला मारू के गीतों को गाती हैं।

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ढोला मारु रा दूहा – 8वीं सदी की प्रसिद्ध प्रेम कहानी

‘ढोला मारु रा दूहा’ की कहानी इस प्रकार है-

पूंगल देश का राजा अपने यहाँ अकाल पड़ने पर नरवर राज्य आता है। तब नरवर के राजा नल के पुत्र साल्हकुमार यानी ‘ढोला‘ का विवाह बचपन में छोटी सी उम्र (3 वर्ष) में राजस्थान के बीकानेर में स्थित पुंगल में (जांगलू देश) के पवार राजा पिंगल की पुत्री मरवानी यानि ‘मारू‘ (ढाई वर्ष) से हो गया था। उस समय इन दोनों की विवाह तो हो गया लेकिन उनका गौना नहीं हुआ था क्योंकि दोनों की उम्र बहुत कम थी।

उसके बाद ढोला बिना मारू को लेकर अपने प्रदेश नरवर चला गया। वहां पर जैसे-जैसे उसकी उम्र बीती वह पुंगल में हुई उनकी पुरानी शादी भूल गया। क्योंकि जब उसकी शादी हुई थी तब वह छोटी उम्र में था। लेकिन उधर मारू के माता पता को विश्वास था कि नरवर का राजकुमार उनकी पुत्री को लेने जरूर आएगा।

जैसे जसे समय बीतता है ढोला और मारू दोनों जवान हो जाते हैं। लेकिन नरवर के राजकुमार ढोला को अपनी पहली शादी के बारे में कुछ भी याद नहीं था। इसलिए वह अपनी दूसरी शादी रचा लेता है।

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ढोला की दूसरी शादी मालवणी के साथ हो जाती है, जब मालवणी को ढोला की पहली शादी के बारे में पता चलता है, मालवणी को अपनी सौतन मारू और उसकी सुन्दरता का किस्सा मालूम है, तो वह बहुत सतर्क हो जाती है  कि कहीं उसका पति ढोला उसे छोड़ ना दें और अपनी पहली पत्नी को ना लाएं इसलिए वह उस राज्य में बहुत ही सतर्क रहती है कि कोई भी संदेश ढोला तक पहुंचने से पहले उसके पास पहुंचता था।

उधर पुगल की राजकुमारी मारू जवान हो जाती है। और पूंगल के राजा को चिंता सताने लगती है कि उनकी राजकुमारी जवान हो गई है इसलिए राजा पिंगल अपनी पुत्री मारू का गोना करवाने के लिए नरवर के राजकुमार ढोला तक कई संदेश भेजते हैं।

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लेकिन जिस प्रकार राजकुमार ढोला की दूसरी पत्नी प्रत्येक संदेश को पहले अपने पास बुलाती थी इसलिए वह इस सारे संदेशों को वहां से मिटा देती थी और संदेश वाहको को की हत्या कर देती थी।

इसलिए राजकुमार के पास कोई संदेश नही पहुचता था, और राजकुमार तो पहले बचपन में ही शादी को भूल चुके थे लेकिन उनकी दूसरी रानी भली भाति जानती थी और उसे डर भी सता रहा था इसलिए वह कई सारे संदेश वाहकों की हत्या करवा देती है ।

पुंगल के राजा बहुत चिंतित होते हैं उनको समझ में आ गया था कि कुछ गड़बड़ जरूर है क्योंकि सारे संदेश वाहक वापस कोई नहीं आ पा रहा था उधर मारु यौवन अवस्था अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। मारू को एक दिन अपने सपने में अपने प्रीतम ढोला को वह पाती है और अपने ओर ढोला को ना पाकर बहुत वियोग में चली जाती है।

ढोला को ना पाने पर उसकी रुचि न खाने मे रही ना किसी और कार्य में उसकी यह हालत देखकर उसकी मां ने राजा पिंगल से ढोला को फिर से संदेश भेजने को आग्रह किया तो राजा पिंगल ने इस बार पुंगल के राजा नरवर के लिए एक बहुत ही चतुर ढोली को नरवर के लिए भेजता है।

जब चतुर ढोली याचक बंद कर नरवर के लिए रवाना हो रहा था। तभी मारवनी उस ढोली को अपने पास बुला कर मारु राग में कुछ दोहे बना कर देती है और समझाती है कि आपको कैसे जाकर इस दोहो को गाना है और सुनाना है।

ढोली वचन देता है कि यदि मैं जिंदा रहा तो ढोला को लेकर जरूर आऊंगा यदि मर गया तो वहीं रह जाऊंगा चतुर डोली याचक बनकर नरवर के राजमहल में पहुंचता है।

उस शाम को रिमझिम रिमझिम बारिश हो रही थी मौसम बहुत ही सुहाना हो रहा था। वातावरण बहुत शांत था फिर उस ढोली ने मल्हार राग में गाना शुरू किया ।

ढोली के कुछ दोहे इस प्रकार थे-

आखडिया डंबर भई, नयण गमाया रोय ।
क्यूँ साजण परदेस में, रह्या बिंडाणा होय ।।

मारू कहती हे मेरी आखे रो रो कर लाल कर दी हे ओर मेने अपनी आखे गवा दी हे , फिर भी साजन आप परदेश मे पराए हो गए हो

दुज्जण बयण न सांभरी, मना न वीसारेह ।
कूंझां लालबचाह ज्यूँ, खिण खिण चीतारेह ।।

मेरे साजन आप कुछ बुरे लोगो के बातों मे आकर आप अपनी प्यारी मारू को अपने मन से मत निकालो , क्योकि आपकी प्यारी मारू कुरजाँ पक्षी के लाल बच्चो की तरह पल पल आपको याद कर रही हे ओर आंसुओं से भीगा चीर निचोड़ते निचोड़ते उसकी हथेलियों में छाले पड़ गए है ।

जे थूं साहिबा न आवियो, साँवण पहली तीज ।
बीजळ तणे झबूकडै, मूंध मरेसी खीज ।।

यदि आप मेरे साजन ढोला आप सावन महीने की तीज के पहले नही आ गए तो वह बिजली की तरह चमक कर समाप्त हो जाएगी

नमणी, ख़मणी, बहुगुणी, सुकोमळी सुकच्छ ।
गोरी गंगा नीर ज्यूँ मन गरवी तन अच्छ ।।

आपकी प्यारी मारू मे बहुत से गुण हे वह क्षमशील, नम्र व कोमल है उसका तन मन श्रेष्ट हे, गंगा के पानी जेसी गोरी ओर साफ दिल वाली हे

गति गयंद, जंघ केळ ग्रभ, केहर जिमी कटि लंक ।
हीर डसण विप्रभ अधर, मरवण भ्रकुटी मयंक ।।

आपकी प्यारी मारू की चाल हाथी जेसी हे ,हीरों जैसे दांत, मूंग सरीखे होठ है ।आपकी मारवणी की सिंहों जैसी कमर है, चंद्रमा जैसी भोएं है ।

आदीता हूँ ऊजलो मारूणी मुख ब्रण ।
झीणां कपड़ा पैरणां, ज्यों झांकीई सोब्रण ।।

आपकी प्यारी मारू का मुंह सूर्य से भी उजला है,ओर झीणे कपड़ों में से मारू शरीर यों चमकता है जेसे मानो स्वर्ण झाँक रहा हो ।

जब गायक ढोली द्वारा गाए गए यह दोहे ढोला सुनता है तो ढोला को बचपन की शादी की याद आ गई और जिस प्रकार दुआ में ढोली मारू का रूप रंग का वर्णन कर रहा था जैसे कोई सामने पुस्तक खोल कर रख दी हो उसे सुनकर ढोला तड़प उठा।

ढोला ने निर्णय लिया कि वह पुंगल जाएगा और मारू लेकर आएगा उस पूरी रात वह ढोली इसी प्रकार गाता रहा।

ढोली के अनुसार राजकुमारी के चेहरे की चमक सूर्य के प्रकाश की तरह है उसका बदन स्वर्ण की तरह है उसके होंठ मूंग की तरह शरीर नरम व कोमल गंगा के पानी की तरह साफ मन और तन श्रेष्ठ है लेकिन उसका साजन तो जैसे उसे भूल ही गया है और उसको लेने भी नहीं आता।

सुबह उठकर राजकुमार ढोला ने उस ढोली को अपने पास बुलाया ढोली ने जब पूरा संदेश सुनाया तो उसे सारी बात समझ में आई और पुरानी शादी के बारे में भी याद आ गई थी। ढोला तड़पता उठा मारू से मिलने के लिए।

आखिरकार राजकुमार ढोला ने अपनी पहली पत्नी मारू को लाने हेतु पुंगल जाने का निश्चय किया और अपनी दूसरी पत्नी मालवनी को बताया । लेकिन उसकी दूसरी पत्नी ने उसे जाने से रोक दिया ढोला के कई बहाने बनाने पर भी मालवणी उसे हर हाल में रोकती रही।

कुछ दिन बीते लेकिन ढोला मारवनी अपनी मारू से मिलने को तड़प रहा था इसलिए एक दिन उसने अपने राज्य में एक रायके ( जो उट का ग्वाला था ) को उससे पास बुलाया ओर कहा कि तुम मुझे कोई एक ऐसा उट दो जो एक ही रात में यहां से पूगल पहुंच जाए ।

तब उस रायके ने कहा राजकुमार ढोला से की मेरी ऊँटो की टोली मे एक ऊंट है , लेकिन वह जब भागता है तो भागता ही जाता है वह अभी नौसिखिया है इसलिए उसे काबू करना थोड़ा मुश्किल होगा यदि आप उसे काबू कर सके तब आपको एक रात में पुंगल जरूर पहुंचा देगा।

राजकुमार ढोला ने कहा में जरूर काबू कर लूंगा इसी बात पर रायके को उसी रात को उस ऊंट को तैयार करने को कहा।

शाम होते ही राजकुमार अपनी पत्नी को बिना बताए उस तेज चलने वाले ऊंट पर सवार होकर पूंगलगढ़ की ओर चल पड़े ऊंट वास्तव में बहुत तेज चल रहा था और उसी रात को वह ऊंट पुंगल पहुंच गया।

dhola maru ra duha - kahani

वियोग में जल रही मारू ढोला के दर्शन पाते ही खुशी से झूम उठे और बहुत खुशी हुये आखिर उसका प्रेम का इंतजार खत्म हो चुका था उसका प्रीतम आज उसे मिल गया था। दोनों खुशी-खुशी पुंगल में कुछ समय बिताते हैं दोनों एक दूसरे में खो जाते हैं उन्हें समय का कुछ पता भी नहीं चलता।

फिर कुछ दिन बाद दोनों अपने राज्य नरवर जाने के लिए पुंगल के महाराजा से विदा लेते हैं और दोनों ऊंट पर सवार होकर नरवर के लिए निकल पड़ते हैं। बीच में बहुत बड़ा रेगिस्तान पडता था इसलिए दोनों एक स्थान पर आराम करने के लिए ऊंट से उतरे रात का समय था घना अंधेरा होने की वजह से मारू को सांप डस लेता है।

ढोला विचलित हो उठता है मारू दर्द से कहरहा रही थी सांप का जहर उसको धीरे-धीरे चढ़ रहा था ढोला भगवान शिव को पुकारता है और उनसे प्रार्थना करता है मारू की जान की भीख मांगता है.

भगवान शिव जब ढोला की बात सुन लेता है तो और शिव और पार्वती आकर मारू को जान का जीवन दान दे देते हैं। ढोला मारू को दोबारा पाकर बहुत खुश हो गया था उनका प्यार और भी बढ़ गया था।

फिर ढोला और मारू उसी ऊंट पर सवार होकर आगे बढ़ जाते हैं लेकिन अभी भी मुसीबतें खत्म नहीं हुई थी क्योंकि आगे उमर सुमरा षड्यंत्र का जाल बिछा कर बैठा था उमर सुमरा मारू को चाहता था इसलिए उसने षड्यंत्र बनाया कि वह रास्ते में ही राजकुमार ढोला को मार देगा।

उमर सुमरा रास्ते में ही जाजम बिछाकर महफिल सजा कर राजकुमार ढोला की खूबसूरत पत्नी को पाने के लिए षड्यंत्र बना कर बैठा था। जैसे ही ढोला और मारू उसी रास्ते से गुजरते हैं तो उमर सुमरा अमल की मनुहार करके राजकुमार ढोला को रोक लेता है।

फिर राजकुमार ढोला मारू को ऊंट पर ही रहने देता है और खुद उमर सोमरा की महफिल में जाता है और दोनों अमल की मनवार लेते हैं। उधर उनके साथ चल रहा ढोली गा रहा था , ढोली बहुत ही चतुर था उसको उमर सुमरा के षड्यंत्र का आभास हो गया था।

इसलिए ढोली बहाना बनाकर ऊंट के पास में जाता है और मारू को चुपके से बता देता है की उम्र सुमरा ढोला को षड्यंत्र में फंसा कर मारना चाहता है इसलिए हमें यहां से भागना चाहिए।

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मारू रेगिस्तान की राजकुमारी थी इसलिए उन्हें ऊंट के बारे में जानकारियां भी थी इसलिए ऊंट को एडी मारती है और ऊंट को एडी मारती है तो ऊंट वहां से भाग खड़ा होता हे ,तभी ऊंट को भागते देख राजकुमार ढोला ऊंट को रोकने के लिए ऊंट के पीछे भागता है.

तभी राजकुमार ढोला ऊंट के पास पहुंचता है तो राजकुमारी मारू कहती है वह उमर सुमरा तुम्हें षड्यंत्र में मारना चाहता है इसलिए हमें यहां से भागना चाहिए हमें धोखा हो रहा है हमें जल्दी उठ पर चढ़ जाना चाहिए इसके बाद ढोला और मारू ऊंट पर सवार होकर वहां से भाग जाते हैं। और बिना कहीं रुके नरवर पहुंच जाते हैं।

राज्य नरवर पहुंचने पर राजकुमारी का स्वागत सत्कार किया जाता है। ढोला अपनी दूसरी पत्नी की नोकझोंक का समाधान भी करता है और अपनी दोनों पत्नियों के साथ आनंद से रहने लगा।

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